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Saturday, 25 May 2019
Friday, 24 May 2019
विपक्ष और लोकतंत्र का लड़ाका
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| इलेक्शन कमिश्नर अशोक लवासा |
| अवनी लवासा लेह की जिला कलेक्टर और चुनाव अधिकारी |
संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश
Thursday, 26 July 2018
भाजपा - संघ - विपक्ष और लोकसभा चुनाव ------ विजय राजबली माथुर
*ये दोनों लेखक महोदय जनता को दिग्भ्रमित कर रहे हैं वे भाजपा को पुन : सत्तासीन देखना चाहते हैं।
** वास्तविकता तो यह है कि , राहुल कांग्रेस जो इन्दिरा जी के समय 1980 से ही संघ के निकट रही है अपने खुद के दम पर पूर्ण बहुमत लाने की स्थिति में नहीं है इसीलिए पी चिदंबरम ने सुझाव दिया है कि , जहां जो क्षेत्रीय दल प्रभावी है उसे आगे रख कर कांग्रेस उसे समर्थन दे और लोकसभा में भाजपा को बहुमत न मिलने दे। इस दिशा में चर्चायेँ चल भी रही हैं।
***कुछ विद्वान वास्तविकता से आँखें मूँद कर दिवा - स्वप्न लोक में विचरण करते हुये जनता को उल्टे उस्तरे से मूढ़ने का प्रयास कर रहे हैं। परंतु वैसा होगा नहीं और जनता जन - विरोधी मोदी सरकार को आगामी चुनावों में उखाड़ फेंकेगी।
**** विपक्ष को यह देखना होगा कि सिर्फ भाजपा को हराने से देश का भला नहीं हो सकता उनको संघ को परास्त करने हेतु बुद्धि - चातुर्य संजोना होगा तभी देश का भला कर पाएंगे। राहुल कांग्रेस को भी संघ के चंगुल से निकालना विपक्ष का लक्ष्य होना चाहिए।
स्पष्ट रूप से पढ़ने के लिए इमेज पर डबल क्लिक करें (आप उसके बाद भी एक बार और क्लिक द्वारा ज़ूम करके पढ़ सकते हैं )
(आ )::
(ब ) : :
ये दोनों लेखक महोदय जनता को दिग्भ्रमित कर रहे हैं वे भाजपा को पुन : सत्तासीन देखना चाहते हैं। ' (ब )' के लेखक इसलिए चिंतित हैं कि , संघ के कार्यकर्ता मोदी - शाह के नेतृत्व वाली भाजपा से असंतुष्ट हैं। लेकिन उनको उम्मीद है कि उनके पास मोदी को चुनने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।
शायद इनको यह याद नहीं रहा कि, 1980 में इन्दिरा जी व 1985 में राजीव जी की कांग्रेस को संघ ने वोट देकर भारी बहुमत से जिताया और भाजपा को हराया था। इसी प्रकार दिल्ली में AAP को जिताया व BJP को हराया था।
वस्तुतः संघ भाजपा पर नहीं भाजपा संघ पर निर्भर है। जबकि संघ अपना दायरा बढ़ाने के लिए दूसरे दलों में भी घुसपैठ करता जा रहा है। उसका लक्ष्य सत्ता और विपक्ष दोनों को अपनी मुट्ठी में रखना है।
मोदी - शाह ने संघ को ही अपनी मुट्ठी में समेटना चाहा जिस कारण संघ ने अपने कार्यकर्ताओं के जरिये उनको संदेश दिलवा दिया है। यदि भाजपा को बहुमत मिलता है तब इस जोड़ी को हटाया नहीं जा सकेगा इसलिए संघ आगामी लोकसभा चुनावों में भाजपा को शिकस्त दिलवाएगा। विपक्ष को यह भ्रम रहेगा कि ऐसा उनकी एकता से संभव हुआ है जबकि संघ और मजबूत होता जाएगा। पूर्व राष्ट्रपति महोदय को रणनीति के तहत ही नागपुर बुलाया गया था बिलावजह नहीं।
'(आ )' के लेखक की चिंता यह है कि, वह कांग्रेस व विपक्षी दलों को अक्षम समझ रहे हैं। दोनों लेख जनता के मध्य भ्रम फैलाने का काम करने वाले हैं।
वास्तविकता तो यह है कि , राहुल कांग्रेस जो इन्दिरा जी के समय 1980 से ही संघ के निकट रही है अपने खुद के दम पर पूर्ण बहुमत लाने की स्थिति में नहीं है इसीलिए पी चिदंबरम ने सुझाव दिया है कि , जहां जो क्षेत्रीय दल प्रभावी है उसे आगे रख कर कांग्रेस उसे समर्थन दे और लोकसभा में भाजपा को बहुमत न मिलने दे। इस दिशा में चर्चायेँ चल भी रही हैं।
2014 में भाजपा के बहुमत में कांग्रेस से गए सौ से अधिक सांसदों का योगदान था यदि वे वापिस लौट लें तो भाजपा वैसे भी बहुमत नहीं प्राप्त कर सकती है। इस दिशा में भी संजय गांधी का परिवार मददगार हो सकता है । कुछ विद्वान वास्तविकता से आँखें मूँद कर दिवा - स्वप्न लोक में विचरण करते हुये जनता को उल्टे उस्तरे से मूढ़ने का प्रयास कर रहे हैं। परंतु वैसा होगा नहीं और जनता जन - विरोधी मोदी सरकार को आगामी चुनावों में उखाड़ फेंकेगी।
विपक्ष को यह देखना होगा कि सिर्फ भाजपा को हराने से देश का भला नहीं हो सकता उनको संघ को परास्त करने हेतु बुद्धि - चातुर्य संजोना होगा तभी देश का भला कर पाएंगे। राहुल कांग्रेस को भी संघ के चंगुल से निकालना विपक्ष का लक्ष्य होना चाहिए।
संकलन-विजय राजबली माथुर
** वास्तविकता तो यह है कि , राहुल कांग्रेस जो इन्दिरा जी के समय 1980 से ही संघ के निकट रही है अपने खुद के दम पर पूर्ण बहुमत लाने की स्थिति में नहीं है इसीलिए पी चिदंबरम ने सुझाव दिया है कि , जहां जो क्षेत्रीय दल प्रभावी है उसे आगे रख कर कांग्रेस उसे समर्थन दे और लोकसभा में भाजपा को बहुमत न मिलने दे। इस दिशा में चर्चायेँ चल भी रही हैं।
***कुछ विद्वान वास्तविकता से आँखें मूँद कर दिवा - स्वप्न लोक में विचरण करते हुये जनता को उल्टे उस्तरे से मूढ़ने का प्रयास कर रहे हैं। परंतु वैसा होगा नहीं और जनता जन - विरोधी मोदी सरकार को आगामी चुनावों में उखाड़ फेंकेगी।
**** विपक्ष को यह देखना होगा कि सिर्फ भाजपा को हराने से देश का भला नहीं हो सकता उनको संघ को परास्त करने हेतु बुद्धि - चातुर्य संजोना होगा तभी देश का भला कर पाएंगे। राहुल कांग्रेस को भी संघ के चंगुल से निकालना विपक्ष का लक्ष्य होना चाहिए।
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(आ )::
(ब ) : :
ये दोनों लेखक महोदय जनता को दिग्भ्रमित कर रहे हैं वे भाजपा को पुन : सत्तासीन देखना चाहते हैं। ' (ब )' के लेखक इसलिए चिंतित हैं कि , संघ के कार्यकर्ता मोदी - शाह के नेतृत्व वाली भाजपा से असंतुष्ट हैं। लेकिन उनको उम्मीद है कि उनके पास मोदी को चुनने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।
शायद इनको यह याद नहीं रहा कि, 1980 में इन्दिरा जी व 1985 में राजीव जी की कांग्रेस को संघ ने वोट देकर भारी बहुमत से जिताया और भाजपा को हराया था। इसी प्रकार दिल्ली में AAP को जिताया व BJP को हराया था।
वस्तुतः संघ भाजपा पर नहीं भाजपा संघ पर निर्भर है। जबकि संघ अपना दायरा बढ़ाने के लिए दूसरे दलों में भी घुसपैठ करता जा रहा है। उसका लक्ष्य सत्ता और विपक्ष दोनों को अपनी मुट्ठी में रखना है।
मोदी - शाह ने संघ को ही अपनी मुट्ठी में समेटना चाहा जिस कारण संघ ने अपने कार्यकर्ताओं के जरिये उनको संदेश दिलवा दिया है। यदि भाजपा को बहुमत मिलता है तब इस जोड़ी को हटाया नहीं जा सकेगा इसलिए संघ आगामी लोकसभा चुनावों में भाजपा को शिकस्त दिलवाएगा। विपक्ष को यह भ्रम रहेगा कि ऐसा उनकी एकता से संभव हुआ है जबकि संघ और मजबूत होता जाएगा। पूर्व राष्ट्रपति महोदय को रणनीति के तहत ही नागपुर बुलाया गया था बिलावजह नहीं।
'(आ )' के लेखक की चिंता यह है कि, वह कांग्रेस व विपक्षी दलों को अक्षम समझ रहे हैं। दोनों लेख जनता के मध्य भ्रम फैलाने का काम करने वाले हैं।
वास्तविकता तो यह है कि , राहुल कांग्रेस जो इन्दिरा जी के समय 1980 से ही संघ के निकट रही है अपने खुद के दम पर पूर्ण बहुमत लाने की स्थिति में नहीं है इसीलिए पी चिदंबरम ने सुझाव दिया है कि , जहां जो क्षेत्रीय दल प्रभावी है उसे आगे रख कर कांग्रेस उसे समर्थन दे और लोकसभा में भाजपा को बहुमत न मिलने दे। इस दिशा में चर्चायेँ चल भी रही हैं।
2014 में भाजपा के बहुमत में कांग्रेस से गए सौ से अधिक सांसदों का योगदान था यदि वे वापिस लौट लें तो भाजपा वैसे भी बहुमत नहीं प्राप्त कर सकती है। इस दिशा में भी संजय गांधी का परिवार मददगार हो सकता है । कुछ विद्वान वास्तविकता से आँखें मूँद कर दिवा - स्वप्न लोक में विचरण करते हुये जनता को उल्टे उस्तरे से मूढ़ने का प्रयास कर रहे हैं। परंतु वैसा होगा नहीं और जनता जन - विरोधी मोदी सरकार को आगामी चुनावों में उखाड़ फेंकेगी।
विपक्ष को यह देखना होगा कि सिर्फ भाजपा को हराने से देश का भला नहीं हो सकता उनको संघ को परास्त करने हेतु बुद्धि - चातुर्य संजोना होगा तभी देश का भला कर पाएंगे। राहुल कांग्रेस को भी संघ के चंगुल से निकालना विपक्ष का लक्ष्य होना चाहिए।
संकलन-विजय राजबली माथुर
Saturday, 14 October 2017
' चित भी मेरी : पट भी मेरी ' संघी नीति को नहीं समझ कर विपक्ष अपने पैरों पर खुद कुल्हाड़ी चला रहा है ------ विजय राजबली माथुर
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Arvind Raj Swarup Cpi
“ढाई लोगों के वामन अवतार ने ढाई कदम में पूरे भारत को माप अपनी ढाई गज की जो दुनिया बना ली है, उसमें अंबानी, अडानी, बिड़ला, जैन, अग्रवाल, गुप्ता याकि वे धनपति और बड़े मीडिया मालिक जरूर मतलब रखते हैं, जिनकी दुनिया क्रोनी पूंजीवाद से रंगीन है और जो अपने रंगों की हाकिम के कहे अनुसार उठक-बैठक कराते रहते हैं।
“आज का अंधेरा हम सवा सौ करोड़ लोगों की बीमारी की असलियत लिए हुए है। ढाई लोगों के वामन अवतार ने लोकतंत्र को जैसे नचाया है, रौंदा है, मीडिया को गुलाम बना उसकी विश्वसनीयता को जैसे बरबाद किया है - वह कई मायनों में पूरे समाज, सभी संस्थाओं की बरबादी का प्रतिनिधि भी है। तभी तो यह नौबत आई जो सुप्रीम कोर्ट के जजों को कहना पड़ा कि यह न कहा करें कि फलां जज सरकारपरस्त है और फलां नहीं!
“अदालत हो, एनजीओ हो, मीडिया हो, कारोबार हो, भाजपा हो, भाजपा का मार्गदर्शक मंडल हो, संघ परिवार हो या विपक्ष सबका अस्तित्व ढाई लोगों के ढाई कदमों वाले ‘न्यू इंडिया’ के तले बंधक है!
“आडवाणी, जोशी जैसे चेहरे रोते हुए तो मीडिया रेंगता हुआ। आडवाणी ने इमरजेंसी में मीडिया पर कटाक्ष करते हुए कहा था कि इंदिरा गांधी ने झुकने के लिए कहा था मगर आप रेंगने लगे! वहीं आडवाणी आज खुद के, खुद की बनाई पार्टी और संघ परिवार या पूरे देश के रेंगने से भी अधिक बुरी दशा के बावजूद ऊफ तक नहीं निकाल पा रहे हैं।
“सोचें, क्या हाल है! हिंदू और गर्व से कहो हम हिंदू हैं (याद है आडवाणी का वह वक्त), उसका राष्ट्रवाद इतना हिजड़ा होगा यह अपन ने सपने में नहीं सोचा था। और यह मेरा निचोड़ है जो 40 साल से हिंदू की बात करता रहा है! मैं हिंदू राष्ट्रवादी रहा हूं। इसमें मैं ‘नया इंडिया’ का वह ख्याल लिए हुए था कि यदि लोकतंत्र ने लिबरल, सेकुलर नेहरूवादी धारा को मौका दिया है तो हिंदू हित की बात, दक्षिणपंथ, मुसलमान को धर्म के दड़बे से बाहर निकाल उन्हें आधुनिक बनवाने की धारा का भी सत्ता में स्थान बनना चाहिए।
“यह सब सोचते हुए कतई कल्पना नहीं की थी कि इससे नया इंडिया की बजाय मोदी इंडिया बनेगा और कथित हिंदू राष्ट्रवादी सवा सौ करोड़ लोगों की बुद्धि, पेट, स्वाभिमान, स्वतंत्रता, सामाजिक आर्थिक सुरक्षा को तुगलकी, भस्मासुरी प्रयोगशाला से गुलामी, खौफ के उस दौर में फिर हिंदुओं को पहुंचा देगा, जिससे 14 सौ काल की गुलामी के डीएनए जिंदा हो उठें। आडवाणी भी रोते हुए दिखलाई दें।
“आप सोच नहीं सकते हैं कि नरेंद्र मोदी, और उनके प्रधानमंत्री दफ्तर ने साढ़े तीन सालों में मीडिया को मारने, खत्म करने के लिए दिन-रात कैसे-कैसे उपाय किए हैं। एक-एक खबर को मॉनिटर करते हैं। मालिकों को बुला कर हड़काते हैं। धमकियां देते हैं।
“जैसे गली का दादा अपनी दादागिरी, तूती बनवाने के लिए दस तरह की तिकड़में सोचता है, उसी अंदाज में नरेंद्र मोदी और उनके प्रधानमंत्री दफ्तर ने भारत सरकार की विज्ञापन एजेंसी डीएवीपी के जरिए हर अखबार को परेशान किया ताकि खत्म हों या समर्पण हो। सैकड़ों टीवी चैनलों, अखबारों की इम्पैनलिंग बंद करवाई।
“इधर से नहीं तो उधर से और उधर से नहीं तो इधर के दस तरह के प्रपंचों में छोटे-छोटे प्रकाशकों-संपादकों पर यह साबित करने का शिकंजा कसा कि तुम लोग चोर हो। इसलिए तुम लोगों को जीने का अधिकार नहीं और यदि जिंदा रहना है तो बोलो जय हो मोदी! जय हो अमित शाह! जय हो अरूण जेटली!
“और इस बात पर सिर्फ मीडिया के संदर्भ में ही न विचार करें! लोकतंत्र की तमाम संस्थाओं को, लोगों को कथित ‘न्यू इंडिया’ में ऐसे ही हैंडल किया जा रहा है। ढाई लोगों की सत्ता के चश्मे में आडवाणी हों या हरिशंकर व्यास या सिर्दाथ वरदराजन, भाजपा का कोई मुख्यमंत्री या मोहन भागवत तक सब इसलिए एक जैसे हैं कि सभी ‘न्यू इंडिया’ की प्रयोगशाला में महज पात्र हैं, जिन्हें भेड़, चूहे के अलग-अलग परीक्षणों से ‘न्यू इंडिया’ लायक बनाना है। ...”
https://www.facebook.com/arvindrajswarup.cpi/posts/1984164238468371
वरुण गांधी (भाजपा सांसद ), हरिशंकर व्यास ( जिनका लेख अरविंद राज स्वरूप CPI के वरिष्ठ नेता द्वारा उद्धृत किया गया है ) और हज़ारे साहब के साक्षात्कार पर ध्यान दें तो स्पष्ट होता है कि , संघ की पसंद के पी एम मोदी की सरकार के विरुद्ध अभियान में भी अग्रणी संघ के नेता और विचारक ही हैं। यशवंत सिन्हा, अरुण शौरी और शत्रुघन सिन्हा आदि नेताओं व विचारकों के कदम भी इसी कड़ी का हिस्सा हैं। विपक्ष के जो नेता या विचारक मुखर होते हैं उनके विरुद्ध क्रिमिनल व सिविल केस चलाये जाते हैं या उनकी हत्या करा दी जाती है। यह है ' चित भी मेरी : पट भी मेरी ' संघी नीति जिसे वर्तमान विपक्ष के नेता और दल नहीं समझ रहे हैं जो कि, भारतीय राजनीति से उनके सफाये की योजना है।
संघ ने सत्ता ( शासन और प्रशासन दोनों ) पर मजबूत पकड़ बनाने के बाद अब विपक्ष पर भी पकड़ बनाना शुरू कर दिया है जिससे मोदी सरकार के पतन की दशा में बनने वाली सरकार में भी संघ की मजबूत पकड़ बरकरार रहे।
यदि वर्तमान विपक्ष ने आगामी लोकसभा चुनाव कांग्रेस + CPM समेत सम्पूर्ण वामपंथ + ममता बनर्जी समेत समस्त क्षेत्रीय दलों ने एक साथ न लड़ कर अलग - अलग लड़ा या आ आ पा (AAP) को अपने साथ जोड़ा तो तय है कि, बनने वाली सरकार पर भी संघ का ही नियंत्रण रहेगा।
------ विजय राजबली माथुर
Arvind Raj Swarup Cpi
16 hrs (13-10-2017 )
हिंदू राष्ट्रवादी सम्पादक हरिशंकर व्यास ने अपने अख़बार ‘नया इंडिया’ में आज लिखा है -“ढाई लोगों के वामन अवतार ने ढाई कदम में पूरे भारत को माप अपनी ढाई गज की जो दुनिया बना ली है, उसमें अंबानी, अडानी, बिड़ला, जैन, अग्रवाल, गुप्ता याकि वे धनपति और बड़े मीडिया मालिक जरूर मतलब रखते हैं, जिनकी दुनिया क्रोनी पूंजीवाद से रंगीन है और जो अपने रंगों की हाकिम के कहे अनुसार उठक-बैठक कराते रहते हैं।
“आज का अंधेरा हम सवा सौ करोड़ लोगों की बीमारी की असलियत लिए हुए है। ढाई लोगों के वामन अवतार ने लोकतंत्र को जैसे नचाया है, रौंदा है, मीडिया को गुलाम बना उसकी विश्वसनीयता को जैसे बरबाद किया है - वह कई मायनों में पूरे समाज, सभी संस्थाओं की बरबादी का प्रतिनिधि भी है। तभी तो यह नौबत आई जो सुप्रीम कोर्ट के जजों को कहना पड़ा कि यह न कहा करें कि फलां जज सरकारपरस्त है और फलां नहीं!
“अदालत हो, एनजीओ हो, मीडिया हो, कारोबार हो, भाजपा हो, भाजपा का मार्गदर्शक मंडल हो, संघ परिवार हो या विपक्ष सबका अस्तित्व ढाई लोगों के ढाई कदमों वाले ‘न्यू इंडिया’ के तले बंधक है!
“आडवाणी, जोशी जैसे चेहरे रोते हुए तो मीडिया रेंगता हुआ। आडवाणी ने इमरजेंसी में मीडिया पर कटाक्ष करते हुए कहा था कि इंदिरा गांधी ने झुकने के लिए कहा था मगर आप रेंगने लगे! वहीं आडवाणी आज खुद के, खुद की बनाई पार्टी और संघ परिवार या पूरे देश के रेंगने से भी अधिक बुरी दशा के बावजूद ऊफ तक नहीं निकाल पा रहे हैं।
“सोचें, क्या हाल है! हिंदू और गर्व से कहो हम हिंदू हैं (याद है आडवाणी का वह वक्त), उसका राष्ट्रवाद इतना हिजड़ा होगा यह अपन ने सपने में नहीं सोचा था। और यह मेरा निचोड़ है जो 40 साल से हिंदू की बात करता रहा है! मैं हिंदू राष्ट्रवादी रहा हूं। इसमें मैं ‘नया इंडिया’ का वह ख्याल लिए हुए था कि यदि लोकतंत्र ने लिबरल, सेकुलर नेहरूवादी धारा को मौका दिया है तो हिंदू हित की बात, दक्षिणपंथ, मुसलमान को धर्म के दड़बे से बाहर निकाल उन्हें आधुनिक बनवाने की धारा का भी सत्ता में स्थान बनना चाहिए।
“यह सब सोचते हुए कतई कल्पना नहीं की थी कि इससे नया इंडिया की बजाय मोदी इंडिया बनेगा और कथित हिंदू राष्ट्रवादी सवा सौ करोड़ लोगों की बुद्धि, पेट, स्वाभिमान, स्वतंत्रता, सामाजिक आर्थिक सुरक्षा को तुगलकी, भस्मासुरी प्रयोगशाला से गुलामी, खौफ के उस दौर में फिर हिंदुओं को पहुंचा देगा, जिससे 14 सौ काल की गुलामी के डीएनए जिंदा हो उठें। आडवाणी भी रोते हुए दिखलाई दें।
“आप सोच नहीं सकते हैं कि नरेंद्र मोदी, और उनके प्रधानमंत्री दफ्तर ने साढ़े तीन सालों में मीडिया को मारने, खत्म करने के लिए दिन-रात कैसे-कैसे उपाय किए हैं। एक-एक खबर को मॉनिटर करते हैं। मालिकों को बुला कर हड़काते हैं। धमकियां देते हैं।
“जैसे गली का दादा अपनी दादागिरी, तूती बनवाने के लिए दस तरह की तिकड़में सोचता है, उसी अंदाज में नरेंद्र मोदी और उनके प्रधानमंत्री दफ्तर ने भारत सरकार की विज्ञापन एजेंसी डीएवीपी के जरिए हर अखबार को परेशान किया ताकि खत्म हों या समर्पण हो। सैकड़ों टीवी चैनलों, अखबारों की इम्पैनलिंग बंद करवाई।
“इधर से नहीं तो उधर से और उधर से नहीं तो इधर के दस तरह के प्रपंचों में छोटे-छोटे प्रकाशकों-संपादकों पर यह साबित करने का शिकंजा कसा कि तुम लोग चोर हो। इसलिए तुम लोगों को जीने का अधिकार नहीं और यदि जिंदा रहना है तो बोलो जय हो मोदी! जय हो अमित शाह! जय हो अरूण जेटली!
“और इस बात पर सिर्फ मीडिया के संदर्भ में ही न विचार करें! लोकतंत्र की तमाम संस्थाओं को, लोगों को कथित ‘न्यू इंडिया’ में ऐसे ही हैंडल किया जा रहा है। ढाई लोगों की सत्ता के चश्मे में आडवाणी हों या हरिशंकर व्यास या सिर्दाथ वरदराजन, भाजपा का कोई मुख्यमंत्री या मोहन भागवत तक सब इसलिए एक जैसे हैं कि सभी ‘न्यू इंडिया’ की प्रयोगशाला में महज पात्र हैं, जिन्हें भेड़, चूहे के अलग-अलग परीक्षणों से ‘न्यू इंडिया’ लायक बनाना है। ...”
https://www.facebook.com/arvindrajswarup.cpi/posts/1984164238468371
वरुण गांधी (भाजपा सांसद ), हरिशंकर व्यास ( जिनका लेख अरविंद राज स्वरूप CPI के वरिष्ठ नेता द्वारा उद्धृत किया गया है ) और हज़ारे साहब के साक्षात्कार पर ध्यान दें तो स्पष्ट होता है कि , संघ की पसंद के पी एम मोदी की सरकार के विरुद्ध अभियान में भी अग्रणी संघ के नेता और विचारक ही हैं। यशवंत सिन्हा, अरुण शौरी और शत्रुघन सिन्हा आदि नेताओं व विचारकों के कदम भी इसी कड़ी का हिस्सा हैं। विपक्ष के जो नेता या विचारक मुखर होते हैं उनके विरुद्ध क्रिमिनल व सिविल केस चलाये जाते हैं या उनकी हत्या करा दी जाती है। यह है ' चित भी मेरी : पट भी मेरी ' संघी नीति जिसे वर्तमान विपक्ष के नेता और दल नहीं समझ रहे हैं जो कि, भारतीय राजनीति से उनके सफाये की योजना है।
संघ ने सत्ता ( शासन और प्रशासन दोनों ) पर मजबूत पकड़ बनाने के बाद अब विपक्ष पर भी पकड़ बनाना शुरू कर दिया है जिससे मोदी सरकार के पतन की दशा में बनने वाली सरकार में भी संघ की मजबूत पकड़ बरकरार रहे।
यदि वर्तमान विपक्ष ने आगामी लोकसभा चुनाव कांग्रेस + CPM समेत सम्पूर्ण वामपंथ + ममता बनर्जी समेत समस्त क्षेत्रीय दलों ने एक साथ न लड़ कर अलग - अलग लड़ा या आ आ पा (AAP) को अपने साथ जोड़ा तो तय है कि, बनने वाली सरकार पर भी संघ का ही नियंत्रण रहेगा।
------ विजय राजबली माथुर
Wednesday, 16 March 2016
जेएनयू और कन्हैया कुमार ने एक मिसाल पेश की है ------ ईशा भाटिया
एक घंटे के लंबे भाषण में हर मिनट कन्हैया ने सुनने वालों को बांधे रखा. भाषण की शुरुआत में ही वह रौंगटे खड़े करने वाला माहौल बना चुके थे. सरकारी नीतियों के विरोध को कन्हैया ने जिस तरह आवाज दी वह काम दरअसल विपक्ष का है लेकिन पिछले दो सालों में विपक्ष को कभी भी इस भूमिका में नहीं देखा गया है.
सांसदों के लिए मिसाल कन्हैया का भाषण
कन्हैया कुमार के भाषण की बढ़ चढ़ कर तारीफ हो रही है. ईशा भाटिया का सवाल है
कि जो कन्हैया ने किया, क्या वह दरअसल विपक्ष का काम नहीं था.
कन्हैया कुमार और कुछ करने में सफल रहे हों या नहीं लेकिन भाषण कला का
बेहतरीन उदाहरण देने में पूरी तरह कामयाब रहे. एक घंटे के लंबे भाषण में हर
मिनट कन्हैया ने सुनने वालों को बांधे रखा. भाषण की शुरुआत में ही वह
रौंगटे खड़े करने वाला माहौल बना चुके थे. सरकारी नीतियों के विरोध को
कन्हैया ने जिस तरह आवाज दी वह काम दरअसल विपक्ष का है लेकिन पिछले दो
सालों में विपक्ष को कभी भी इस भूमिका में नहीं देखा गया है.
ऐसा नहीं है कि कांग्रेस के पास अच्छे वक्ता नहीं हैं लेकिन कांग्रेस का हाल उस क्रिकेट टीम जैसा है जो अपने सबसे कमजोर बल्लेबाजों को सबसे पहले फील्ड में भेजती है. अब धीरे धीरे लगता है कि राहुल गांधी ने बल्ला पकड़ना सीख लिया है. लेकिन जब तक वे बैटिंग करना शुरू करेंगे, जनता तो स्टेडियम खाली कर चुकी होगी. शुरुआत करते करते उन्होंने इतनी देर कर दी कि अब वे संजीदगी से भी कुछ कहें, तब भी लोगों को मजाक ही लगता है.
खैर, राहुल गांधी से ज्यादा कन्हैया का भाषण स्मृति ईरानी के लिए जरूरी है. गुस्से में आग बबूली ईरानी ने संसद में जिस अंदाज में भाषण दिया था वह भाषण कम डांट फटकार और गुंडागर्दी ज्यादा लग रहा था. कन्हैया ने दिखाया कि कैसे आप मुस्कुराते हुए, बिना अपना आपा खोए, बिना किसी व्यक्ति विशेष का नाम लिए, मुद्दों और विचारधाराओं पर बात कर सकते हैं.
अपना मत रखने के लिए ना ही आपको किसी की ओर उंगली उठाने की जरूरत पड़ती है, ना ही आंखों में रोष लाने की. क्या संसद में विवाद का अवसर इसी मकसद से नहीं दिया जाता कि दोनों पक्ष लोकतांत्रिक तरीके से अपना अपना मत रखें और उस पर जनहित में विमर्श करें? लेकिन हमारे सांसद ना तो भाषण देने में निपुण हैं और ना ही उन्हें सुनने में सक्षम. संसद में तर्कसाध्य बहस ना हो सके, इस कोशिश में वे कोई कसर नहीं छोड़ते. फिर भले ही उसके लिए स्पीकर की मेज के सामने आ कर चिल्लाना ही क्यों ना पड़े, जोर जोर से अपनी मेज पीटनी पड़े या जरूरत रहते कुर्सियां उठा कर फेंकनी पड़े. संसद का हाल अक्सर उस क्लासरूम जैसा दिखता है जिसमें टीचर है नहीं और बच्चों की पढ़ाई में कोई रुचि नहीं.
एक सभ्य नागरिक समाज वाद विवाद से ही आगे बढ़ता है. जेएनयू और कन्हैया कुमार ने हमारे सांसदों, मंत्रियों और युवाओं के लिए एक मिसाल पेश की है. रात के अंधेरे में कैंपस का माहौल विद्रोह से भरा लेकिन संजीदा था.
स्टूडेंट एकजुट थे, साथ मिल कर आजादी के नारे लगा रहे थे. इस नजारे ने कुछ कुछ 1968 के फ्रांस की याद भी दिलाई. लेकिन बहुत बड़ा फर्क भी था क्योंकि ये संगठित छात्र पूरे देश के नहीं, बल्कि केवल एक छोटी सी यूनिवर्सिटी के थे. हां, कैमरे के फ्रेम में 7,000 या 70,000 में फर्क करना आसान नहीं होता.
बहरहाल कैंपस में परिवर्तन के नारे गूंज रहे हैं पर कैंपस के बाहर की दुनिया का सच अलग ही है. कन्हैया ने सीधी सरल भाषा का इस्तेमाल करते हुए आम नागरिकों को अपनी बात समझाने की कोशिश की है. युवा वर्ग में बदलाव और बेहतर भविष्य की ललक है. उसे आवाज देने की जरूरत है और अगर बदलाव लाना है तो इस कोशिश को जारी रखना होगा, देश के बाकी युवाओं को भी साथ लेना होगा, सरकार के खिलाफ और देश के खिलाफ बोलने के फर्क को और भी आसान शब्दों में समझाना होगा.
सरकार और राजनीतिक दलों को भी समझना होगा कि लोकतंत्र विचारों की प्रतिस्पर्धा है, राष्ट्र और उसके नागरिकों की बेहतरी के लिए अच्छे विचारों की प्रतिस्पर्धा. उसे रोकने की कोशिश लोकतंत्र से द्रोह होगा.
ब्लॉग: ईशा भाटिया
ऐसा नहीं है कि कांग्रेस के पास अच्छे वक्ता नहीं हैं लेकिन कांग्रेस का हाल उस क्रिकेट टीम जैसा है जो अपने सबसे कमजोर बल्लेबाजों को सबसे पहले फील्ड में भेजती है. अब धीरे धीरे लगता है कि राहुल गांधी ने बल्ला पकड़ना सीख लिया है. लेकिन जब तक वे बैटिंग करना शुरू करेंगे, जनता तो स्टेडियम खाली कर चुकी होगी. शुरुआत करते करते उन्होंने इतनी देर कर दी कि अब वे संजीदगी से भी कुछ कहें, तब भी लोगों को मजाक ही लगता है.
खैर, राहुल गांधी से ज्यादा कन्हैया का भाषण स्मृति ईरानी के लिए जरूरी है. गुस्से में आग बबूली ईरानी ने संसद में जिस अंदाज में भाषण दिया था वह भाषण कम डांट फटकार और गुंडागर्दी ज्यादा लग रहा था. कन्हैया ने दिखाया कि कैसे आप मुस्कुराते हुए, बिना अपना आपा खोए, बिना किसी व्यक्ति विशेष का नाम लिए, मुद्दों और विचारधाराओं पर बात कर सकते हैं.
अपना मत रखने के लिए ना ही आपको किसी की ओर उंगली उठाने की जरूरत पड़ती है, ना ही आंखों में रोष लाने की. क्या संसद में विवाद का अवसर इसी मकसद से नहीं दिया जाता कि दोनों पक्ष लोकतांत्रिक तरीके से अपना अपना मत रखें और उस पर जनहित में विमर्श करें? लेकिन हमारे सांसद ना तो भाषण देने में निपुण हैं और ना ही उन्हें सुनने में सक्षम. संसद में तर्कसाध्य बहस ना हो सके, इस कोशिश में वे कोई कसर नहीं छोड़ते. फिर भले ही उसके लिए स्पीकर की मेज के सामने आ कर चिल्लाना ही क्यों ना पड़े, जोर जोर से अपनी मेज पीटनी पड़े या जरूरत रहते कुर्सियां उठा कर फेंकनी पड़े. संसद का हाल अक्सर उस क्लासरूम जैसा दिखता है जिसमें टीचर है नहीं और बच्चों की पढ़ाई में कोई रुचि नहीं.
एक सभ्य नागरिक समाज वाद विवाद से ही आगे बढ़ता है. जेएनयू और कन्हैया कुमार ने हमारे सांसदों, मंत्रियों और युवाओं के लिए एक मिसाल पेश की है. रात के अंधेरे में कैंपस का माहौल विद्रोह से भरा लेकिन संजीदा था.
स्टूडेंट एकजुट थे, साथ मिल कर आजादी के नारे लगा रहे थे. इस नजारे ने कुछ कुछ 1968 के फ्रांस की याद भी दिलाई. लेकिन बहुत बड़ा फर्क भी था क्योंकि ये संगठित छात्र पूरे देश के नहीं, बल्कि केवल एक छोटी सी यूनिवर्सिटी के थे. हां, कैमरे के फ्रेम में 7,000 या 70,000 में फर्क करना आसान नहीं होता.
बहरहाल कैंपस में परिवर्तन के नारे गूंज रहे हैं पर कैंपस के बाहर की दुनिया का सच अलग ही है. कन्हैया ने सीधी सरल भाषा का इस्तेमाल करते हुए आम नागरिकों को अपनी बात समझाने की कोशिश की है. युवा वर्ग में बदलाव और बेहतर भविष्य की ललक है. उसे आवाज देने की जरूरत है और अगर बदलाव लाना है तो इस कोशिश को जारी रखना होगा, देश के बाकी युवाओं को भी साथ लेना होगा, सरकार के खिलाफ और देश के खिलाफ बोलने के फर्क को और भी आसान शब्दों में समझाना होगा.
सरकार और राजनीतिक दलों को भी समझना होगा कि लोकतंत्र विचारों की प्रतिस्पर्धा है, राष्ट्र और उसके नागरिकों की बेहतरी के लिए अच्छे विचारों की प्रतिस्पर्धा. उसे रोकने की कोशिश लोकतंत्र से द्रोह होगा.
ब्लॉग: ईशा भाटिया
साभार :
http://www.dw.com/hi/%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%B8%E0%A4%A6%E0%A5%8B%E0%A4%82-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%8F-%E0%A4%AE%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B2-%E0%A4%95%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%B9%E0%A5%88%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B7%E0%A4%A3/a-19093780?maca=hi-Facebook-sharing
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