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Friday, 18 October 2019

जन के नाम पर जन को छलने का काम ------ चंद्रेश्वर

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 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Saturday, 3 November 2018

बेटी का कन्यादान क्यों ? ------ एकता जोशी

*  एक समय ऐसा था कि ढोंग और पाखंड को बढ़ावा देने के लिए बहुत से लोग युवा अवस्था में ही सन्यासी बनकर मंदिरों में चले जाते थे लेकिन युवावस्था में होने के कारण अपनी हवस पर काबू नहीं कर पाते थे तब अपनी हवस को मिटाने के लिए कन्यादान का षड्यंत्र रचा गया था। 
** जब उन देवदासियों की कोख से पुजारियों की नाजायज औलाद पैदा होती थी तो बड़ा होने पर उन्हें हरि की औलाद अथवा हरिजन कहा जाता था।
*** बाद में उन्हें वैश्या बनाकर कोठों पर भेज दिया जाता था और उनसे पैदा हुए बच्चों को दलाल बनाकर कोठों की देखरख करने की जिम्मेदारी दे दी जाती थी।
**** सच्चाई को समझे बिना आजतक भी कन्यादान की परंपरा चली आ रही है जो कि उचित नहीं है।
एकता जोशी
02-11-2018 



जब बेटी-बेटा एक समान हैं तो फिर बेटी का कन्यादान क्यों ?

मनुष्य जीवन में वैसे तो दान का बहुत बड़ा महत्व है चाहे किसी भी धर्म को मानने वाले लोग हों वे अपने अपने स्तर पर दान करते हैं इस सम्बंध में इस्लाम धर्म के संस्थापक हजरत मोहम्मद साहब ने भी कहा था कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी आय का ढाई प्रतिशत भाग जरूर दान में देना चाहिए इसी प्रकार बौद्ध धम्म के संस्थापक तथागत बुद्ध ने भी गृहस्थों से दान करने की बात कही थी तथा बाबा साहेब अंबेडकर का भी सन्देश था कि अपनी आय का पांच प्रतिशत भाग समाज हित में दान जरूर करना चाहिए लेकिन किसी भी महापुरुष ने यह नहीं कहा था कि अपनी बहन या बेटी को दान करना चाहिए।

स्वभाविक सी बात है कि दान करने के बाद उस पर हमारा किसी भी प्रकार का अधिकार नहीं रहता है मान लेते हैं कि हमने किसी व्यक्ति को दान में वस्त्र भेंट कर दिए अब दान करने के बाद उन वस्त्रों पर हमारा कोई अधिकार नहीं रहता है चाहे वह व्यक्ति उन वस्त्रों को स्वयं पहने या अन्य किसी को पहनने को दे अथवा बिक्री करे।
हमारी बहन अथवा बेटी को भी जब हम दान कर देते हैं तो उसे दूसरे को सौंपने या बिक्री करने पर क्या हम चुप रहेंगे ?

कोई समय था जब बेटे और बेटी में अंतर किया जाता था लेकिन आजकल बेटी और बेटे को समान समझा जाता है तो फिर बेटी का कन्यादान क्यों ?

तथागत बुद्ध के उपदेश को बाबा साहेब अंबेडकर ने अपने ग्रन्थ बुद्ध और उनका धम्म में लिखा है कि किसी बात को केवल इसलिए मत मानो कि वह परम्परा से चली आ रही है या बहुत से लोग उसे मानते हैं या फिर धर्म ग्रन्थों में लिखी हुई है अथवा किसी महापुरुष की कही हुई है।
आप उसे तभी मानो की वह आपकी बुद्धि विवेक एवं अनुभव पर खरी उतरती हो।

अब इस कन्यादान की परंपरा के इतिहास पर भी नजर डालना जरूरी है कि एक समय ऐसा था कि ढोंग और पाखंड को बढ़ावा देने के लिए बहुत से लोग युवा अवस्था में ही सन्यासी बनकर मंदिरों में चले जाते थे लेकिन युवावस्था में होने के कारण अपनी हवस पर काबू नहीं कर पाते थे तब अपनी हवस को मिटाने के लिए कन्यादान का षड्यंत्र रचा गया था और जनता को बेवकूफ बनाने के लिए कहा था कि मंदिरों में भगवान की सेवा ठीक से नहीं हो पा रही है इसलिए भगवान की सेवा के लिए देवदासी के रूप में अपनी कन्याओं को दान करोगे तो भगवान तुम्हारी मुरादें पूरी करेंगे और जो भी मन्नत मांगने पर वह अवश्य पूरी होगी साथ में उस कन्या की परवरिश के लिए आसपड़ोस एवं रिश्तेदारों द्वारा वस्त्र या नकद राशि दान में भी देनी चाहिए।
उस वक्त अशिक्षित लोग हुआ करते थे इसलिए इन पाखंडियों के षड्यंत्र को समझ नहीं सके और उनकी बात मानकर भगवान की सेवा में मंदिरों में कन्याओं का दान करने लगे साथ में उसकी परवरिश के लिए वस्त्र और नकद राशि रिश्तेदारों के द्वारा दान में दी जाने लगी।
जब दान में दी गई कन्याओं की उम्र 16 वर्ष के करीब होने को आती तो उनके साथ वे पाखंडी पुजारी लोग दुराचार करके अपनी हवस मिटाते थे।

जब उन देवदासियों की कोख से पुजारियों की नाजायज औलाद पैदा होती थी तो बड़ा होने पर उन्हें हरि की औलाद अथवा हरिजन कहा जाता था। बाद में यही शब्द गांधीजी ने SC समाज को देना उचित समझा।

मंदिरों में देवदासियों का बाहुल्य हो जाने पर बाद में उन्हें वैश्या बनाकर कोठों पर भेज दिया जाता था और उनसे पैदा हुए बच्चों को दलाल बनाकर कोठों की देखरख करने की जिम्मेदारी दे दी जाती थी।

सच्चाई को समझे बिना आजतक भी कन्यादान की परंपरा चली आ रही है जो कि उचित नहीं है।समझने वाली बात यह है कि जब बेटी-बेटा एक समान हैं तो फिर बेटी का कन्या दान क्यों ?

इस सच्चाई को समझने के बाद प्रत्येक जागरूक व्यक्ति को संकल्प करना चाहिए कि भविष्य में कभी भी कन्यादान नहीं करूंगा।

#आपकी एकता
 एकता जोशी
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Sunday, 16 October 2016

मानवों के कार्य-व्यवहार से प्रकृति में उथल-पुथल : भगदड़ ------ विजय राजबली माथुर

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 कुम्भ,मेलों की भगदड़,केदारनाथ आदि में ग्लेशियरों का फटना आदि इन मानवीय दुर्व्यवस्थाओं के ही दुष्परिणाम हैं।वाराणासी की ताज़ातरीन भगदड़ भी ऐसी ही घटना है जिसके मूल में पाखंड-आडंबर और ढोंग के प्रदर्शन का हाथ है। लेकिन इन सबसे व्यापार जगत को भरपूर मुनाफा होता है इसलिए केंद्र व प्रदेश सरकारें मृतकों व घायलों को मुक्त - हस्त से आर्थिक सहायता देकर ऐसे ढोंग -पाखंड को ही मजबूत करती हैं बजाए लोगों को शिक्षित करके ऐसे प्रकृति - विरोधी आयोजनों से दूर रहने की प्रेरणा देने के। 

प्रकृति के नियमों का पालन करना ही धर्म है।...................किसी भी एथीस्ट व प्रगतिशील में इतना साहस नहीं है कि वह इस ढोंग-पाखंड-आडंबर का विरोध करके वास्तविक 'धर्म' से जनता को परिचित कराये बल्कि जो ऐसा करता है उसी को ये प्रगतिशील व एथीस्ट अपने निशाने पर रखते हैं जिस कारण जनता दिग्भ्रमित होकर अपना शोषण करवाती रहती है।दूसरी तरफ प्राकृतिक विषमता का दुष्परिणाम अलग से समाज को झेलना पड़ता है जिसमें पुनः शोषित जनता का ही सर्वाधिक उत्पीड़न होता है। .............क्योंकि ये सारे ढोंग-पाखंड-आडंबर झूठ ही धर्म का नाम लेकर होते हैं इसलिए इनमें भाग लेने वाले प्राकृतिक प्रकोप का शिकार होते हैं। ढोंग-पाखंड-आडंबर फैलाने का दायित्व केवल पुरोहितों-पंडे,पुजारी,मुल्ला-मौलवी,पादरी आदि का ही नहीं है बल्कि इनसे ज़्यादा तथाकथित 'प्रगतिशील' व 'वैज्ञानिक' होने का दावा करने वाले 'अहंकारी विद्वानों' का है जो उसी ढोंग-पाखंड-आडंबर को धर्म से संबोधित करते हैं बजाए कि जनता को समझाने व जागरूक करने के।





 नई दुनिया छोड़ कर जब डॉ राजेन्द्र माथुर साहब  ने नवभारत टाईम्स के प्रधान संपादक का दायित्व ले लिया था तब एक सम्पादकीय लेख में उन्होने पर्यावरण के संबंध में चेतावनी दी थी कि यदि ऐसे ही चलता रहा तो अगले बीस वर्षों में देश की जलवायु बदल जाएगी।उनकी चेतावनी से समाज  कुछ भी नहीं बदला बल्कि  पर्यावरण -प्रदूषण पहले से भी ज़्यादा बढ़ गया है। नदियां अब नालों में परिवर्तित हो चुकी हैं।  अति वर्षा,अति सूखा, अति शीत,भू-स्खलन,बाढ़ आदि प्रकोप जीवनचर्या का अंग बन चुके हैं। 'गंगा की सफाई' के लिए स्वामी निगमानंद का बलिदान हो चुका है और अब इज़राईल की दिलचस्पी गंगा की सफाई में है।

हालांकि प्रगतिशीलता व वैज्ञानिकता की आड़ में बुद्धिजीवियों का एक प्रभावशाली तबका 'ज्योतिष' की कड़ी निंदा व आलोचना करता है। परंतु ज्योतिष=ज्योति +ईश अर्थात ज्ञान -प्रकाश देने वाला विज्ञान। जिस प्रकार ग्रह-नक्षत्रों का प्रभाव मानव समेत सभी प्राणियों व वनस्पतियों पर पड़ता है उसी प्रकार मानवों के कार्य-व्यवहार से ग्रह-नक्षत्र भी प्रभावित होते हैं। इसे एक छोटे उदाहरण से यों समझें:
एक बाल्टी पानी में एक गिट्टी उछाल दें तो हमें तरंगें दीखती हैं परंतु वही गिट्टी नदी या समुद्र में डालने पर हमें तरंगें नहीं दीखती हैं परंतु बनती तो हैं। वैसे ही मानवों के कार्य-व्यवहार से ग्रह-नक्षत्र प्रभावित होते हैं। जिसका पता प्रकृति में होने वाली उथल-पुथल से चलता है। कुम्भ,मेलों की भगदड़,केदारनाथ आदि में ग्लेशियरों का फटना आदि इन मानवीय दुर्व्यवस्थाओं के ही दुष्परिणाम हैं।वाराणासी की ताज़ातरीन भगदड़ भी ऐसी ही घटना है जिसके मूल में पाखंड-आडंबर और ढोंग के प्रदर्शन का हाथ है। लेकिन इन सबसे व्यापार जगत को भरपूर मुनाफा होता है इसलिए केंद्र व प्रदेश सरकारें मृतकों व घायलों को मुक्त - हस्त से आर्थिक सहायता देकर ऐसे ढोंग -पाखंड को ही मजबूत करती हैं बजाए लोगों को शिक्षित करके ऐसे प्रकृति - विरोधी आयोजनों से दूर रहने की प्रेरणा देने के। 
प्रकृति के नियमों का पालन करना ही धर्म है। धर्म= मानव जीवन और मानव समाज को  धारण करने हेतु  जो आवश्यक है  जैसे कि ,'सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य का पालन किया जाये -यही धर्म है। परंतु 'एथीस्टवाद' के कारण इसे नकार दिया जाता है और ढोंग-पाखंड-आडंबर को धर्म की संज्ञा दी जाती है जबकि वह तो व्यापारियों/उद्योगपतियों द्वारा जनता की लूट व शोषण के उपबन्ध हैं। किसी भी एथीस्ट व प्रगतिशील में इतना साहस नहीं है कि वह इस ढोंग-पाखंड-आडंबर का विरोध करके वास्तविक 'धर्म' से जनता को परिचित कराये बल्कि जो ऐसा करता है उसी को ये प्रगतिशील व एथीस्ट अपने निशाने पर रखते हैं जिस कारण जनता दिग्भ्रमित होकर अपना शोषण करवाती रहती है।दूसरी तरफ प्राकृतिक विषमता का दुष्परिणाम अलग से समाज को झेलना पड़ता है जिसमें पुनः शोषित जनता का ही सर्वाधिक उत्पीड़न होता है। 

कुछ अति प्रगतिशील वैज्ञानिक 'ग्रह-नक्षत्रों'के प्रभाव को ही नहीं मानते हैं वैसे लोगों की मूर्खता के ही परिणाम हैं विभिन्न प्राकृतिक-प्रकोप। 


यदि ग्रह-नक्षत्रों का प्राणियों पर प्रभाव पड़ता है तो वहीं प्राणियों का सामूहिक प्रभाव भी ग्रह-नक्षत्रों पर पड़ता है। एक बाल्टी में पानी भर कर उसमें गिट्टी फेंकेंगे तो 'तरंगे'दिखाई देंगी। यदि एक तालाब में उसी गिट्टी को डालेंगे तो हल्की तरंग मालुम पड़ सकती है किन्तु नदी या समुद्र में उसका प्रभाव दृष्टिगोचर नहीं होगा परंतु 'तरंग' निर्मित अवश्य होगी । इसी प्रकार  सीधे-सीधी तौर पर मानवीय व्यवहारों का प्रभाव ग्रहों या नक्षत्रों पर दृष्टिगोचर नहीं हो सकता उसका एहसास तभी होता है जब प्रकृति दंडित करती है जैसे-उत्तराखंड त्रासदी,नर्मदा मंदिर ,कुम्भ और अब वाराणासी की भगदड़ आदि , क्योंकि ये सारे ढोंग-पाखंड-आडंबर झूठ ही धर्म का नाम लेकर होते हैं इसलिए इनमें भाग लेने वाले प्राकृतिक प्रकोप का शिकार होते हैं। ढोंग-पाखंड-आडंबर फैलाने का दायित्व केवल पुरोहितों-पंडे,पुजारी,मुल्ला-मौलवी,पादरी आदि का ही नहीं है बल्कि इनसे ज़्यादा तथाकथित 'प्रगतिशील' व 'वैज्ञानिक' होने का दावा करने वाले 'अहंकारी विद्वानों' का है जो उसी ढोंग-पाखंड-आडंबर को धर्म से संबोधित करते हैं बजाए कि जनता को समझाने व जागरूक करने के।


 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Tuesday, 9 September 2014

प्राकृतिक प्रकोप क्यों?---विजय राजबली माथुर

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इसी लाल चौक के एक होटल में हम लोगों (होटल मुगल शेरटन,आगरा के स्टाफ ) को 1981 में ठहराया गया था;वहाँ के मशहूर 'हाईलैंड फैशन्स' के मालिक गुलाम रसूल जान साहब के 'होटल हाईलैंड्स',कारगिल के लिए रवाना होने के क्रम में। तब डल झील और लाल चौक मनोरम था और स्थानीय लोगों का हम लोगों के साथ व्यवहार सौहाद्र्पूर्ण। बाद में USA प्रेरित अलगाववाद ने सारी रौनक फीकी कर दी थी। अब USA द्वारा प्रेरित कार्पोरेट्स से प्रायोजित सरकार बनने के बाद से 'प्राकृतिक' रूप से एक के बाद एक सारे देश की जनता दंडित हो रही है।


Thursday, 27 December 2012

धिक्कार है ऐसे वक्तव्यों व प्रवचनों को ---विजय राजबली माथुर



महिला वैज्ञानिक बोलीं- लड़की छह लोगों से घिर गई थी तो समर्पण क्यों नहीं कर दिया?
Dainik Bhaskar News  |  Dec 27, 2012, 09:49AM IST

 http://www.bhaskar.com/article/MP-IND-delhi-gang-rape-woman-scientist-illogical-statement-4127693-NOR.html
 
खरगोन। पुलिस विभाग ने खरगोन में एक सेमिनार रखा। विषय था-महिलाओं के प्रति संवेदनशीलता। लेकिन इसमें वक्ता जितने असंवेदनशील हो सकते थे, हुए। हैरत यह है कि इनकी सिरमौर रहीं एक महिला कृषि वैज्ञानिक। डॉ. अनीता शुक्ला। ये लायंस क्लब की अध्यक्ष भी हैं।
मंच से डॉ. अनीता शुक्ला ने दिल्ली सामूहिक दुष्कर्म मामले में पीडि़ता को ही जिम्मेदार ठहरा दिया। उन्होंने कहा- महिलाएं ही पुरुष को उकसाती हैं। डॉ. शुक्ला यहीं नहीं रुकीं। उन्होंने और भी सवाल उठाए। उनका सवाल था 10 बजे रात को लड़की घर से बाहर क्या कर रही थी? फिर कहा- ब्वॉय फ्रेंड के साथ रात को बाहर निकलेगी तो यही होगा। पुलिस कहां तक संरक्षण देगी। उन्होंने पीडि़ता के प्रतिरोध को भी उसका दुस्साहस बता दिया। उनका कहना था हाथ पांव में दम नहीं, हम किसी से कम नहीं। (पूर्व महिला सांसद ने दी नसीहत- तन ढंक कर रखें लड़कियां)
छह लोगों से घिरने पर लड़की ने चुपचाप समर्पण क्यों नहीं कर दिया। कम से कम आंते निकालने की नौबत तो नहीं आती। उन्होंने कानूनों की बात भी की। उनका निष्कर्ष था सुविधाओं और अधिकारों का महिलाओं ने गलत इस्तेमाल किया है। इसलिए ऐसे मामलों में पुलिस का रवैया बिलकुल ठीक है। असंवेदनशीलता का आलम यह रहा कि इस भाषण पर वहां मौजूद ज्यादातर अफसर मौन रहे।
लेकिन भास्कर ने रात को डॉ. अनीता से फिर बात की। पूछा कि पूरा देश जिस मामले को लेकर इतना संवेदनशील है, तब  आप ऐसा क्यों कह रही हैं? उन्होंने फिर वही बातें दोहराईं और कहा-देखिए, मेरी उस पीडि़ता के प्रति पूरी संवेदना है लेकिन ऐसी घटनाओं को महिलाएं ही समझदारी दिखाकर रोक सकती हैं।  सेमिनार में एडिशनल एसपी एसएस चौहान, एसडीओपी आरबी दीक्षित, एसडीओपी भीकनगांव कर्णसिंह रावत, सीएमएचओ डॉ. विराज भालके, खनिज निरीक्षक रश्मि पांडे, आरआई अनिल राय भी उपस्थित थे।

वे क्या बोलेंगी, इसकी स्क्रीनिंग कैसे करते
हमने सेमिनार में डॉ. शुक्ला को बुलाया था। वे क्या बोलेंगी इसकी कोई स्क्रीनिंग करना संभव भी नहीं था। उन्होंने निजी विचार व्यक्त किए। मंै उनसे सहमत नहीं हूं।
- एस.एस.चौहान, एडिशनल एसपी, खरगोन

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Giridhari Goswami अगर लडकी समर्पण कर देती तो उसका शारीरिक नुक्सान कम होता , इसे इसी रूप में लेना चाहिए. बोकारो में मोनिका का बलात्कार बीस लोगो ने किया पर उन्हें उतना नुक्सान नही हुआ जितना इस लड़की को हो रहा है. एक को छोड़ १७ आरोपी साजा भूगत रहे हैं.
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आज की ‘इस्तेमाल करो और फेंको’ की उपभोक्तावादी संस्कृति पूरा कर दे रही है। इसमें प्रचार माध्यमों की पूरी ताकत से पुरूषों को उकसाया जा रहा है कि औरतों के शरीर को दबोचो, वह तुम्हारे उपभोग की वस्तु है। औरत या लड़की महज शरीर मात्र है और वह तुम्हारे उपभोग के लिए है। और जब इस घृणित कारोबार का वीभत्स परिणाम सामने आता है तो वही कारोबारी ‘फांसी-फांसी’ को कोलाहल शुरू कर देते हैं।

बलात्कार और यौन हिंसा आज के पतित पूंजीवाद का हिस्सा है। यह कोई अपवाद या अतिरेक में बहाव नहीं है। इसीलिए इससे मुक्ति पूंजीवाद के खात्मे की मांग करती है। मजदूर वर्ग को, खासकर महिला मजदूरों को यौन हिंसा के मामले में भी अपनी क्रांतिकारी पहलकदमी प्रदर्शित करनी होगी और यौन हिंसा के लिए समूचे पूंजीवाद को कठघरे में खड़ा करना होगा।

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16 दिसंबर 2012 को दिल्ली के बसंत विहार क्षेत्र मे घटित जघन्य कांड पर जनांदोलन भी हो रहे हैं विभिन्न विद्वानों के विभिन्न विचार भी सामने आ रहे हैं और लोग उपाय भी सुझा रहे हैं। परंतु नितांत महत्वपूर्ण तथ्य को सभी पक्ष नज़र अंदाज़ करते जा रहे हैं। लगभग  1300 वर्षों पूर्व विदेशियों द्वारा हमारे देश की सभ्यता-संस्कृति को विकृत रूप मे पेश करने का जो अभियान चला था वह आज पक्का पौराणिक आख्यान बन चुका है और उसी के कारण समाज का निरंतर पतन होता जा रहा है,नैतिक मूल्य लगभग नष्टप्राय हैं। 

जगह-जगह भागवत प्रवचनों मे मिथ्या पाठ पढ़ाया जा रहा है कि,श्री कृष्ण गोपियों के वस्त्र हरण कर 'कदंब' पर चढ़ गए और उनको यमुना से बाहर निर्वस्त्र आने पर बाध्य कर दिया । वृन्दावन मे तो रास-लीला बाकायदा बड़ी धूम-धाम से चलती है। 
इसी प्रकार राम द्वारा स्वर्ण नखा (सूपनखा)को विवाह हेतु लक्ष्मण के पास और लक्ष्मण द्वारा राम के पास भेजने के कुत्सित प्रसंग विदेशी षड्यंत्र हैं। 
किन्तु ढ़ोंगी-पाखंडी लोग इन खुराफ़ातों को धर्म के रूप मे पेश करते हैं जिनको व्यापार जगत के दान से प्रोत्साहित किया जाता है। अतः 'हस्तक्षेप'मे व्यक्त आह्वान एक सार्थक पहल है। लेकिन इसी के साथ-साथ पोंगा-पंथ के विरुद्ध भी जनता को जाग्रत करने की आवश्यकता है। तथा कथित 'बापुओं' 'सन्यासियों' की पोल खोलने की आवश्यकता है और 'कुम्भ स्नान' के नाम पर हो रहे जनता के मानसिक शोषण के विरुद्ध भी आवाज़ बुलंद करने की ज़रूरत है। 
लेकिन दुर्भाग्य से प्रदेश व केंद्र सरकारें इस प्रकार के ढोंग-पाखंड को कारपोरेट के दबाव मे सहयोग व समर्थन दे रही हैं। जनता गुमराह है उसे 'सन्मार्ग' दिखाने वाला कोई 'नेतृत्व कारी तत्व' नज़र नहीं आ रहा है। यदि कोई पाखंड-आडंबर-ढोंग के विरुद्ध आवाज़ बुलंद करता है या लेखनी चलाता है तो उसे 'धार्मिक भटकाव' कह कर तथाकथित प्रगतिशील हतोत्साहित करते हैं और ढ़ोंगी तो प्रबल प्रहार करते ही हैं। 

यदि समाज से चरित्र हीनता को समाप्त करना है तो गलत को गलत कहने का साहस जुटाना ही होगा अन्यथा थोथे शोर गुल व हुल-हपाड़े से कुछ नहीं होने वाला है।