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Saturday, 1 August 2015

इप्टा व प्रलेस द्वारा प्रेमचंद का स्मरण

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 कल दिनांक 31 जुलाई 2015 को क़ैसर बाग, लखनऊ स्थित उमानाथ बली प्रेक्षागृह में इप्टा व प्रलेस द्वारा कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद जी  का स्मरण उनकी दो कहानियों के नाट्य मंचन द्वारा किया गया।  समारोह संचालन राकेश जी द्वारा किया गया जिन्होने प्रेमचंद जी की आज की प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला  जबकि 'पंच परमेश्वर' का निर्देशन ओ पी अवस्थी जी द्वारा तथा 'शूद्र' का प्रदीप घोष साहब द्वारा किया गया। समारोह निर्धारित समय से प्रारम्भ हुआ जिसमें  आरंभ में सुमन श्रीवास्तव जी के निर्देशन में मलिन बस्तियों की नन्ही-नन्ही बालिकाओं द्वारा सुंदर व मनमोहक गीत प्रस्तुति की गई। 

'शूद्र' नाटक को दर्शकों की विशेष वाहवाही मिली। हाल खचाखच भरा होने के कारण खड़े होकर भी लोगों ने अति-उत्साह से अवलोकन किया व प्रस्तुति को सराहा। 

राकेश जी ने घोषणा की कि शीघ्र ही इप्टा द्वारा जन-जागरण का अभियान प्रारम्भ किया जाएगा उसमें लोगों से सहयोग की उन्होने अपेक्षा भी की। उन्होने यह भी घोषणा की कि 08 अगस्त 2015 को इसी प्रांगण के 'जयशंकर प्रसाद ' सभागार में 'भीष्म साहनी' जी की जन्मशती के सिलसिले में दिन के साढ़े चार बजे एक गोष्ठी होने जा रही है जिसमें सभी जनों की उपस्थिती आमंत्रित है।
 
(चित्र में गौरा के रूप में किरण सिंह व शेफाली के वेश में ऊषा राय तथा मंगरू की भूमिका में राजीव भटनागर )

(चित्र में गौरा के रूप में किरण सिंह व शेफाली के वेश में ऊषा राय )




 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Monday, 13 July 2015

पाठकों को उत्प्रेरित करने वाला लेखन हो : गिरीश चंद्र श्रीवास्तव

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 फोटो कटिंग्स जनसंदेश  टाईम्स , लखनऊ  दिनांक : 13 जूलाई 2015 से साभार ---


 लखनऊ के क़ैसर बाग स्थित 'जय शंकर प्रसाद सभागार', में  इप्टा द्वारा आयोजित गोष्ठी के दूसरे सत्र के अध्यक्षीय वक्तव्य में 'निष्कर्ष' के संपादक गिरीश चंद्र श्रीवास्तव साहब  ने उन तथ्यों पर प्रकाश डाला जिनके जरिये पाठकों की मनोदशा को वांछनीय दिशा में मोड़ा जा सकता है। उन्होने मुख्य रूप से मोहन राकेश की कहानियों की चर्चा की और कृष्णा सोबती की रचना कला का भी वर्णन किया। उनका दृष्टिकोण था कि केवल 'यथार्थ' को लक्ष्य करके हम पाठकों की मनोदशा को नहीं बदल सकते हैं। समय और परिस्थितियों के अनुकूल लेखन द्वारा पाठकों को सही दिशा में उत्प्रेरित करने का कार्य किया जाना चाहिए अन्यथा आज का लेखन आने वाले कल में 'अप्रासांगिक' हो जाएगा। इस संबंध में उन्होने मुंशी प्रेमचंद जी का उदाहरण दिया कि उनका लेखन आज भी उतना ही प्रासांगिक है जितना उनके काल में था और उससे आज भी प्रेरणा मिलती है। 

गोष्ठी के अंत में राकेश जी द्वारा सूचना दी गई कि 'इप्टा' व 'प्रलेस' के संयुक्त तत्वावधान में 31 जूलाई -'प्रेमचंद जयंती' पर 'राय उमानाथ बली प्रेक्षागृह' में संक्षिप्त गोष्ठी के उपरांत प्रेमचंद जी की दो कहानियों का नाट्य मंचन किया जाएगा। धन्यवाद ज्ञापन प्रदीप घोष ने किया।
( संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश)

Tuesday, 26 May 2015

इप्टा के स्थापना दिवस पर लखनऊ में 'कर्मकांड पर कटाक्ष '

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कल साँय इप्टा कार्यालय, क़ैसर बाग , लखनऊ में इप्टा के 73वें स्थापना दिवस के उपलक्ष्य में एक गोष्ठी सम्पन्न हुई जिसके उपरांत नाटक 'गंगा लाभ ' का मंचन किया गया। इस नाटक के माध्यम से  मृत्यु के अवसर का भी पोंगा-पंडितों द्वारा अपनी आजीविका के हित में शोषण हेतु  प्रयोग किया जाना बड़े ही मर्म स्पर्शी ढंग से प्रस्तुत किया गया। किस प्रकार गरीब की  भूमि का दबंगों द्वारा कब्जा किया जाता है उस पर भी नाटक में प्रकाश डाला गया है। 

जब मोदी सरकार की वार्षिकी मनाई जा रही थी तब इस सरकार के भूमि अधिग्रहण संबंधी काले कानून की तलवार भी किसानों पर लटक रही थी अतः इस नाटक के मंचन का समय बिलकुल उचित रहा। लेकिन एक दिन पूर्व गंजिंग के अवसर पर एक लाख लोगों की उपस्थिती के मुक़ाबले इस नाटक के दर्शकों की उपस्थिति नगण्य थी। आमंत्रित विद्वत जनो के अतिरिक्त कलाकार और पार्टी सदस्य ही दर्शक व श्रोता थे। साधारण जनता की भागीदारी नहीं थी जबकि नाटक जन सरोकारों से संबन्धित था। कार्यालय प्रांगण के स्थान पर सार्वजनिक स्थान पर इस नाटक का मंचन जनता को आकर्षित कर सकता था। जन नाट्य संघ (IPTA) के स्थापना दिवस पर जन (People ) का न होना चिंताजनक परिस्थितियों का परिचायक है। नब्बे के दशक में आगरा -IPTA द्वारा सार्वजनिक चौराहों, पार्कों, मंदिरों के निकट इस प्रकार के नाटक आयोजित किए जाते थे जिनमें पूर्व सूचना के बिना भी जनता की भागीदारी हो जाती थी। किन्तु आज के उदारीकरण और विकास के युग में बिना प्रचार और कड़ी मशक्कत के बगैर ऐसा हो पाना संभव भी नहीं है। अगले माह जून में लखनऊ में ही IPTA का राष्ट्रीय सम्मेलन भी होने जा रहा है जिससे साधारण जनता को भी सम्बद्ध किया जाना चाहिए।

 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Friday, 19 September 2014

नए लेखकों के लिए स्थिति घातक है ---मुद्रा राक्षस

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 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त माथुर