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Saturday, 21 May 2016

उत्तर प्रदेश विधानसभा पर किसान पंचायत का उद्घोष और सरकार से मिला आश्वासन ------ विजय राजबली माथुर

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***कामरेड अंजान ने पंचायत में आए हुये किसानों को सूचित किया कि जैसा कि , मशहूर शायरा और एक्ट्रेस मीना कुमारी का कहना था :
मसर्रत पे रिवाजों का सख्त पहरा है 
ना जाने कौन सी उम्मीद पर दिल ठहरा है 
तेरी आँखों से छलकते हुये इस गम की कसम 
ये दोस्त दर्द का रिश्ता बहुत गहरा है 

उन्होने भी किसानों के दर्द के साथ गहरा रिश्ता बनाया है और इसीलिए किसानों के लिए किसी भी बड़े से बड़े आंदोलन में भाग लेने के लिए वह सदा तैयार रहते हैं। ***

  लखनऊ,20 मई 2016 :
किसानसभा के स्थापना दिवस 11 अप्रैल 2016 से 'किसान जागरण यात्रा ' का प्रारम्भ संगठन के संस्थापक स्वामी सहजानन्द   सरस्वती जी की जन्मस्थली  गाजीपुर से राजेन्द्र यादव,पूर्व विधायक और महामंत्री उ प्र किसानसभा के नेतृत्व में प्रारम्भ हुआ था जो  35 जिलों का भ्रमण करते हुये लखनऊ के चिनहट क्षेत्र में 19 तारीख को पहुँच गई थी जिसने 20 तारीख को चारबाग रेलवे स्टेशन पहुँच कर विभिन्न जिलों से आए हुये किसान साथियों को साथ लेकर अपने राष्ट्रीय महामंत्री कामरेड अतुल कुमार सिंह 'अंजान ' के नेतृत्व  में एक विशाल मार्च निकाला जो उत्तर प्रदेश विधासभा क्षेत्र के जी पी ओ पार्क में  गांधी प्रतिमा पर धरना - सभा  में परिवर्तित हो गया जिसकी अध्यक्षता प्रदेश अध्यक्ष पूर्व विधायक इम्तियाज़ बेग ने की । प्रारम्भ में चारबाग में इप्टा के कलाकारों ने भी किसानों के उत्साह वर्द्धन हेतु अपनी प्रस्तुति दी। 

सभा में विभिन्न किसान नेताओं ने अपने विचार तथा यात्रा-वृतांत सुनाये। खेत मजदूर सभा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष , पूर्व सांसद  विश्वनाथ शास्त्री जी  भी सभा को संबोधित करने वाले वालों में प्रमुख थे। उत्तर प्रदेश भाकपा के प्रदेश सचिव गिरीश चंद्र शर्मा  ने अपने  9 और 10 मई के बुंदेलखंड दौरे का विस्तृत वर्णन किया  और खेद जताया कि वह राजेन्द्र यादव के अनुरोध के बावजूद किसान जागरण यात्रा में शामिल नहीं हो पाये।(ज्ञातव्य है कि किसान जागरण यात्रा 11 से 14 मई तक बुंदेलखंड क्षेत्र में आने वाली थी। )  गिरीश जी ने कहा कि वह बीमारी के बावजूद किसानों के साथ पार्टी की एकजुटता  दिखाने के लिए उपस्थित हुये हैं। बुन्देल खंड  समस्या पर आगामी 20 जून को छह पार्टियों की ओर से धरना  देने का  आयोजन कर रहे हैं। मीडिया ने उनके वक्तव्य को चटकारा लेते हुये प्रकाशित किया है। : 

उत्तर प्रदेश किसानसभा के महामंत्री और जागरण यात्रा के संयोजक राजेन्द्र यादव ने अपने उद्बोधन में बताया कि अभी तक सरकार द्वारा दिये आश्वासन के बावजूद बंद चीनी मिलें चालू नहीं हुई हैं, प्रदेश में सड़कों की स्थिति सबसे अधिक दयनीय है,गड्ढा युक्त सड़कों के कारण आए दिन दुर्घटना होती हैं, अनियमित विद्युत कटौती से प्रदेश का किसान ,व्यापारी,छात्र,महिलाएं सभी परेशान हैं। नहरों में टेल तक पानी नहीं पहुँच पाता। इस वर्ष दैवीय आपदा के कारण किसानों की फसल बीमा एवं फसल मुआवजा तो केंद्र और राज्य सरकार द्वारा घोषित धन राशि का लाभ प्रदेश के 70 प्रतिशत किसानों को प्राप्त नहीं हो सका है। इन सब महत्वपूर्ण मांगों को लेकर यह यात्रा 11 अप्रैल 2016 से गाजीपुर से चल कर बुंदेलखंड समेत 35 जिलों का परिभ्रमण करते हुये राजधानी पहुंची है। किसानसभा की दूसरी यात्रा को मथुरा से चल कर यहाँ संयुक्त होना था किन्तु पश्चिमाञ्चल के जिलों ने 7 से 14 दिन की जिलावार यात्राएं वहीं सम्पन्न कर लीं और यहाँ तक  नहीं पहुँच सके। दो माह बाद वह खुद उन जिलों में किसान  जागरण यात्रा निकालने का प्रयास करेंगे। 

राजेन्द्र  जी ने बताया कि उन्होने जाति- धर्म और दलगत राजनीति से ऊपर उठ कर केवल किसानों  के हितार्थ इस यात्रा का संयोजन किया था इसी लिए सपा, बसपा,कांग्रेस और भाजपा के लोग भी उनके मंच से आकर किसान  जागरण यात्रा का समर्थन कर गए थे। कांग्रेस नेता जनार्दन राय तो सभा में भी उपस्थित थे। राजेन्द्र जी ने मुख्यमंत्री व सपाध्यक्ष द्वारा वार्ता के लिए बुलाये जाने के संदर्भ में कहा कि वह किसान हितों के लिए किसी से कोई समझौता नहीं करेंगे और यदि मांगे नहीं मानी गईं तो उग्र आंदोलन चलाया जाएगा। 

किसानसभा के राष्ट्रीय महासचिव कामरेड अतुल अंजान ने अपने वृहद सम्बोधन में  संवाद शैली के माध्यम से किसानों को यह समझाने का अथक प्रयास किया कि वे जाति-धर्म,गोत्र-क्षेत्र,वाद-प्रतिवाद में  न फंस कर एकजुटता बनाएँ अन्यथा उनका जीवन और दुष्कर होता जाएगा। किसानों की आत्म -हत्याओं का ज़िक्र करते हुये उन्होने बताया कि वह खुद भी आंध्र व तेलंगाना में किसान पद-यात्राओं में इसी लिए शामिल हुये कि किसानों को आत्म-हत्या के कदम उठाने से रोका जाये। उन्होने किसानों को आगाह किया कि वे अपनी ज़मीन कतई न बेचें क्योंकि आने वाले समय में यही ज़मीन उनके बच्चों को भूख से बचा सकेगी। बिल्डरों के षडयन्त्रों से सावधान रहने को उन्होने किसानों को जागरूक किया। उन्होने बताया कि मीडिया में टी वी चेनल्स और अखबार के जरिये कैटरीना कैफ व दीपिका पादुकोण के किस्से इसलिए उछलते हैं कि किसान इन सब में व फूट के मामलों में उलझ कर अपनी समस्याओं पर आवाज़ न उठा सके । मीडिया के संबंध में उनकी चेतावनी का नमूना इससे ही स्पष्ट है कि उनके वक्तव्य को काट-छांट कर सिर्फ इस रूप में छापा गया है। :

कामरेड अंजान ने पंचायत में आए हुये किसानों को सूचित किया कि जैसा कि , मशहूर शायरा और एक्ट्रेस मीना कुमारी का कहना था :
मसर्रत पे रिवाजों का सख्त पहरा है 
ना जाने कौन सी उम्मीद पर दिल ठहरा है 
तेरी आँखों से छलकते हुये इस गम की कसम 
ये दोस्त दर्द का रिश्ता बहुत गहरा है 
उन्होने भी किसानों के दर्द के साथ गहरा रिश्ता बनाया है और इसीलिए किसानों के लिए किसी भी बड़े से बड़े आंदोलन में भाग लेने के लिए वह सदा तैयार रहते हैं। उन्होने स्पष्ट कहा कि वह जिस संगठन के राष्ट्रीय महा सचिव पद पर हैं वह स्वामी सहजानन्द सरस्वती जी के वैज्ञानिक समाजवाद के दृष्टिकोण का अनुगामी है। इन्दु लाल याज्ञनिक,महात्मा गांधी और नेताजी सुभाष चंद्र बोस इस किसानसभा के अध्यक्ष रह चुके हैं। बंगाल किसानसभा के अध्यक्ष पद को सुशोभित करने वालों में स्वामी विवेकानंद के बड़े भाई भी शामिल रहे हैं। लखनऊ जिले के ही काकोरी में क्रांतिकारी चंद्रशेखर आज़ाद,रोशन सिंह,आदि नेता सभी किसानों के पुत्र ही तो थे। (यद्यपि कामरेड अंजान ने बताया नहीं किन्तु उन क्रांतिकारियों का साथ देने वालों में तथा बटुकेश्वर दत्त के साथ काला पानी की सजा काटने वालों में उनके पिता श्री अयोध्या सिंह जी भी शामिल थे )। 
कामरेड अंजान ने उपस्थित किसानों के माध्यम से यह भी बताया कि , किसानसभा के केंद्रीय कार्यालय में उन्होने दो लाख  रुपये मूल्य की किताबें संग्रहित करा दी हैं जिंनका लाभ किसानों की आने वाली पीढ़ियाँ  भी उठा सकेंगी। इतनी प्रचंड गर्मी में  किसानों ने अपने हक के समर्थन में जागरण यात्रा में भाग लिया और 46 डिग्री तापमान में लखनऊ में धरने  पर बैठे इसके लिए उनके प्रति कामरेड अंजान ने आभार व्यक्त किया । साथ ही साथ किसान परिवारों के आबाल-वृद्ध सभी को उन्होने धन्यवाद दिया कि अपने परिजनों को उन लोगों ने इस किसान महापंचायत में भाग लेने हेतु भेजा। यात्रा और धरने में शामिल महिलाओं के प्रति उन्होने कृतज्ञता व्यक्त की। उन्होने किसान पंचायत में  यह घोषणा भी की कि जब कभी भी किसानसभा की सरकार बनेगी राजेन्द्र यादव को किसान स्वतन्त्रता आंदोलन का 'स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी' घोषित किया जाएगा। उनका योगदान भुलाया नहीं जा सकता है। 

प्रशासन की ओर से SDM साहब द्वारा किसानसभा का मांग-पत्र ग्रहण किया गया। इसकी प्रमुख मांगें  इस प्रकार हैं :
1. राष्ट्रीय किसान आयोग (स्वामीनाथन आयोग) की संस्तुतियों को केंद्र और राज्य सरकारें तत्काल लागू करें। 
 2. 60 वर्ष के सभी स्त्री-पुरुष किसानों,खेत मजदूरों,ग्रामीण दस्तकारों को 10,000 रु. ( दस हजार रुपया) मासिक पेंशन केंद्र व राज्य सरकारें मिलकर देना सुनिश्चित करें।   
3. किसानों के सहकारी-सरकारी कर्ज़ माफ किये जायें एवं उन्हें रबी-खरीफ पर ब्याज मुक्त ऋण उपलब्ध कराया जाये।   
4. कृषि उत्पादों का लाभकारी मूल्य (लागत पर पचास फीसदी जोड़ कर) दिया जाय।  
 5. भूमि अधिग्रहण अध्यादेश को तत्काल वापस लिया जाय।   
6. केरल राजयकी भांति किसान कर्ज़ एवं आपदा राहत ट्रिब्यूनल की स्थापना की जाय।   
7. खेती किसानी के लिए बिजली की बढ़ी दरों को वापस लिया जाय, साथ ही सस्ती एवं अबाध बिजली 18 घंटे उपलब्ध कराई जाय।  
 8. नहरों की टेल तक वास्तविक सफाई कराकर पानी खेतों में पहुँचने का पुख्ता प्रबंध किया जाय।  
 9. प्रदेश के किसानो के निजी नलकूपों को अन्य राज्यों की तरह मुफ्त बिजली की व्यवस्था की जाय।  
 10. नंदगंज,रसड़ा,छाता,देवरिया,औरैया,शाहगंज चीनी मिलों को चालू किया जाय।  
 11. शिक्षा व चिकित्सा व्यवस्था को सरकार अपने हाथ में ले।  
 12. गन्ने का सामान्य मूल्य 450 रु. किया जाय एवं गन्ने का बकाया भुगतान किया जाय।  
 13. प्रदेश में रबी व खरीफ की फसल बर्बाद होने के बाद केंद्र व प्रदेश की सरकारें क्षतिपूर्ति देने का वादा करें या अब तक लगभग 33%किसान लाभान्वित हुए हैं शेष किसानों को तत्काल क्षतिपूर्ति दी जाय।

सभाध्यक्ष द्वारा उपस्थित किसान समुदाय व स्थानीय जनता को धन्यवाद देने के बाद सभा समापन की घोषणा की गई। 
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(कामरेड अंजान और राजेन्द्र यादव जी के अतिरिक्त अर्चना उपाध्याय जी,जितेंद्र हरि पांडे,बी एन यादव,शिव बचन यादव,उपकार सिंह  कुशवाहा और उनके पिता श्री  भी उन लोगों में शामिल थे जिनसे मैं व्यक्तिगत रूप से भेंट कर सका । ) ------ विजय राजबली माथुर 

कामरेड राजेन्द्र यादव व जितेंद्र हरि पांडे के सौजन्य से प्राप्त रैली के कुछ  और खास  फोटो : 













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फोटो सौजन्य : अर्चना उपाध्याय जी 
22-05-2016 at 21 hrs.



संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश   
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फेसबुक पर टिप्पणियाँ :
21-05-2016 

Tuesday, 26 April 2016

किसान बजट भी संसद में प्रस्तुत किया जाय ------ अतुल कुमार सिंह 'अंजान '

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राष्ट्रीय महासचिव - किसानसभा कामरेड अतुल कुमार सिंह 'अंजान ' 








उ.प्र.किसान सभा के प्रदेश सचिव व पूर्व विधायक राजेंद्र यादव की नैतृत्व में गाजीपुर से निकली किसान जन जागरण यात्रा बुधवार को मऊ के कलेक्ट्रेट में पहुंची। किसान सभा के महा सचिव अतुल कुमार अनजान के कहा कि अखिल भारतीय किसान सभा ने राजेंद्र यादव की अगुवायी में नंदगंज चीनी मिल गाजीपुर के सामने एक महीने तक अनवरत धरना व 15 दिन तक सरजू  पांडे पार्क में क्रमिक धरना चलाया जो की ऐतिहासिक आंदोलन था जिसमे हर दल के लोग सामिल हुए ।
उन्होंने कहा कि गन्ना सचिव व राज्य सरकार के आश्वासन के बाद भी बंद पड़ी मिलें चालू नहीं हो सकीं। कहा कि प्रदेश में सडकों की स्थिति सबसे अधिक दयनीय है। अनियमित विद्युत कटौती से प्रदेश का किसान ;व्यापारी ;छात्र; महिलायें सभी परेशान हैं।
नहरों में टेल तक पानी नहीं पहुंच पा रहा। इस साल दैवीय आपदा के कारण किसानों की फसल बीमा व फसल मुवावजा तो केंद्र और राज्य सरकार द्वारा घोषित धनराशि का लाभ प्रदेश के 70 प्रतिशत किसानों को नहीं मिल रहा है।
किसान सभा जनजागरण यात्रा की प्रमुख मागों को बताते हुए अतुल कुमार अनजान ने बताया कि 60 साल से अधिक उम्र के सभी किसान, मजदूर ,बडई, शिल्पकार,स्त्री-पुरुष को 6000 रूपये मासिक पेन्शन प्रदेश व केंद्र सरकार मिलकर दे ।
प्रदेश में रवी व खरीफ की फसल बर्बाद होने के बाद प्रदेश व केंद्र सरकार ने छतिपूर्ति देने का वादा किया था लेकिन अब तक 30 प्रतिशत किसानों को ही मिल पाया है जिससे किसानो में रोष व्याप्त है।
गन्ने का समर्थन मूल्य 450 रुपया कुंतल दिया जाए तथा गन्ने की बकाया राशि ब्याज के साथ दिया जाय। देवकली पम्प कैनाल व शारदा सहायक परियोजनाओं की अधिकांश नहरें पट गयी हैं,इनके टेल तक सफाई कराकर पानी पहुंचाया जाए। 
नन्दगंज ,रसड़ा ,छाता,देवरिया ,शाहगंज चीनी मिलों को चालू कराया जाय। स्वामीनाथ रिपोर्ट को लागू किया जाय। फसलों के लाभकारी मूल्य में 50 प्रतिशत लाभ जोड़कर दिया जाय। फसल बर्बादी एवम फसल बीमा का पैसा किसानों को तत्काल दिया जाय।
रेल बजट की तरह किसान बजट भी संसद में प्रस्तुत किया जाय। जो किसान नहरी एरिया से बाहर हैं उनको 80 प्रतिशत सब्सिडी पर सोलर सबमर्सिबल बिजली पम्प अथवा डीजल इंजन दिये जायं। पदेश की छोटो नदियों में डैम बनाकर पानी का संचय किया जाय।

मांगो को लेकर आज किसान सभा ने कलेक्ट्रेट में सभा किया।
Rajendra Yadav Ex Mla

https://www.facebook.com/groups/794417660591110/permalink/1175955229104016/




मछली शहर - विश्व नाथ शास्त्री जी , पूर्व सांसद 




संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Saturday, 30 August 2014

राजेन्द्र यादव : एक स्मरण ---डॉ जितेंद्र रघुवंशी

राजेन्द्र यादव : एक परिचय
राजेन्द्र यादव का जन्म 28 अगस्त 1929 को आगरा में हुआ था। उनके पिता
चिकित्सक थे। वे आंरभिक वर्षों में पिता के साथ मेरठ में कई जगहों पर रहे।
मिडिल की परीक्षा उन्होंने सुरीड़ नामक जगह से पास की। फिर उसके बाद
पढ़ने के लिए मवाना (मेरठ) अपने चाचा के पास गए। वहीं हॉकी खेलते हुए
पैरों में चोट लग गई जिसके कारण उनके पैर की एक हड्‌डी को निकालना पड़ा।
उसी दौरान उन्होंने उर्दू की कहानियों-उपन्यासों आदि को पढ़ा। चाचा का
तबादला झांसी होने के कारण वे झांसी चले गए और वहीं से उन्होंने मैट्रिक
(1944) किया।उन्होंने आगरा कॉलेज से बी.ए.(1949) किया। आगरा
विश्वविद्यालय से ही उन्होंने एम.ए.(1951) भी किया। उसके बाद सन्‌ 1954
में वे कलकत्ता चले गए तथा 1964 तक वहीं रहे। उन्होंने वहीं ‘ज्ञानोदय’
दो बार छोटी-छोटी अवधि के लिए नौकरी भी की। सन्‌ 1964 में दिल्ली आने पर
‘अक्षर प्रकाशन’ की स्थापना की और कई महत्वपूर्ण लेखकों की प्रथम रचना को
छापा। सन्‌ 1986 से वे साहित्यिक मासिक ‘हंस’ का संपादन कर रहे
थे ।
नवीन सामाजिक चेतना के कथाकार राजेन्द्र यादव की पहली कहानी
‘प्रतिहिंसा’(1947) कर्म योगी मासिक में प्रकाशित हुई थी। उनके पहले
उपन्यास ‘प्रेत बोलते हैं’ जो बाद में ‘सारा आकाश’ (1959) नाम से
प्रकाशित हुई उन्हें अपने समय के अगुआ उपन्यासकारों में स्थापित कर दिया।
राजेन्द्र यादव नई कहानी आंदोलन के कुछ महत्वपूर्ण कथाकारो में गिने जाते
हैं।
अपनी कहानी में उन्होंने मानवीय जीवन के तनावों और संघर्षों को पूरी
संवेदनशीलता से जगह दी है। नगरीय जीवन के आतंक और विडंबना को बड़ी कुशलता
से वे सामने लाये। उनकी ‘एक कमजोर लड़की की कहानी’ ‘जहां लक्ष्मी कैद है’
‘अभिमन्यु की आत्महत्या”छोटे-छोटे ताजमहल’ ‘किनारे से किनारे तक’ जैसी
कहानियां हिन्दी की ही नहीं विश्व साहित्य की सर्वश्रेष्ठ कहानियों में
गिनी जाती हैं। ‘देवताओं की मूर्तियां’ ‘जहां लक्ष्मी कैद है’ (1957)
‘छोटे-छोटे ताजमहल’(1961)’टूटना और अन्य कहानियां’(1987) उनके अन्य कहानी
संग्रह हैं। उनकी अब तक की तमाम कहानियां ‘पड़ाव-1′ ‘पड़ाव-2′ और
‘यहांतक’ शीर्षक से तीन जिल्दों में संकलित हैं।
राजेन्द्र यादव औपन्यासिक चेतना के कथाकार माने जाते हैं। उनका पहला
उपन्यास ‘सारा आकाश’ हिन्दी के सर्वाधिक लोकप्रिय उपन्यासों में से एक
है। ‘सारा आकाश’ की लगभग आठ लाख प्रतियांं बिक चुकी हैं। ‘सारा आकाश’ की
कहानी एक रूढ़िवादी निम्नमध्य वर्गीय परिवार की कहानी है जिसका नायक एक
अव्यवहारिक आदर्शवादी है।
आजाद भारत की युवा पीढ़ी के वर्तमान की त्रासदी और भविष्य का नक्शा।
आश्वासन तो यह है कि सम्पूर्ण दुनिया का सारा आकाश तुम्हारे सामने खुला
है-सिर्फ तुम्हारे भीतर इसे जीतने और नापने का संकल्प हो- हाथ पैरों में
शक्ति हो... मगर असलियत यह है कि हर पाँव की बेड़ियाँ हैं और हर दरवाजा
बंद है। युवा बेचैनी को दिखाई नहीं देता है किधर जाए और क्या करे। इसी
में टूटती है उसका तन, मन और भविष्य का सपना। फिर वह क्या करे-पलायन,
आत्महत्या या आत्मसमर्पण ?
आज़ादी के पचास वर्षों में सारा आकाश ऐतिहासिक उपन्यास भी है और समकालीन
भी। बेहद पठनीय और हिन्दी के सर्वाधिक लोकप्रिय उपन्यासों में से एक सारा
आकाश चालीस संस्करणों में आठ लाख प्रतियों से ऊपर छप चुका है, लगभग सारी
भारतीय और प्रमुख विदेशी भाषाओं में अनूदित है। बासु चटर्जी द्वारा बनी
फिल्में सारा आकाश हिन्दी की सार्थक कला फिल्मों की प्रारम्भकर्ता फ़िल्म
है।
आज की आर्थिक सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था किस प्रकार एक आदर्शवादी
मनुष्य को समझौतावादी बना देती है- यह उनके उपन्यास ‘उखड़े हुए लोग’
(1956) की मुख्य कथा वस्तु है। ‘शह और मात’(1959) डायरी शैली में लिखा
गया उपन्यास है।उपन्यास ‘कुलटा’ समाज के उच्चवर्गीय महिलाओं की खिन्नता
को उजागर करती है। अपनी लेखिका पत्नी मन्नू भंडारी के साथ लिखा गया
उपन्यास ‘एक इंच मुस्कान’ खंडित व्यक्तित्व वाले आधुनिक व्यक्तियों की
प्रेम कहानी है। ‘अनदेखे अनजाने पुल’ ‘मंत्र विद्ध’(1967)
उनके अन्य उपन्यास हैं जो जीवन और उसके विरोधाभासों को और भी स्पष्टता
में दिखाते हैं। ‘आवाज तेरी है ‘(1960) नाम से उनकी कविताओं का एक संग्रह
भी प्रकाशित है।
उन्होंने समीक्षा निबंध की कई पुस्तकें भी लिखी हैं। ‘कहानी :स्वरूप और
संवेदना’ (1968) ‘कहानी :अनुभव और अभिव्यक्ति ‘(1996) और ‘उपन्यास
:स्वरूप और संवेदना’(1997) आलोचना की महत्वपूर्ण पुस्तकें हैं। दस खंडों
में प्रकाशित ‘कांटे की बात’ श्रृंखला में उनके ‘हंस’ मेंं छपे संपादकीय
को मुख्यत:लिया गया है। ‘औरों के बहाने’ 1981 में प्रकाशित हुई थी। नए
साहित्यकार पुस्तकमाला की श्रृंखला में मोहन राकेश कमलेश्वर फणीश्वनाथ
रेणु मन्नू भंडारी तथा स्वयं अपनी लिखी हुई चुनिंदा कहानियों का उन्होंने
संपादन किया।
‘कथा दशक’(1981-90) ‘हिन्दी कहानियां :आत्मदर्पण’(1994) ‘काली
सुर्खियां’(1994 अफ्रीकी कहानियां) और ‘एक दुनियां समानांतर का’ भी
उन्होंने संपादन किया।उनके द्वारा किए गए महत्त्वपूर्ण अनुवादों में
‘हमारे युग का एक नायक’ (लमेल्तोव) ‘प्रथम प्रेम’ ‘वसंत प्लावन’
(तुर्गनेव) ‘टक्कर’(चेखव) ‘संत सर्गीयस’ (टालस्टॉय) ‘एक महुआ :एक मोती’
(स्टाइन बैक) और ‘अजनबी’ (अलबेयर कामू) हैं। ‘मुड़-मुड़ के देखता हूं’
(2001) ‘वे देवता नहीं हैं ‘(2000) और ‘आदमी की निगाह में औरत’ (2001)
उनके संस्मरणों के संग्रह हैं।
हंस पत्रिका
उपन्यास सम्राट पे्रमचंद द्वारा स्थापित और संपादित हंस अपने समय की
अत्यन्त महत्वपूर्ण पत्रिका रही है। महात्मा गांधी और कन्हैयालाल माणिक
लाल मुंशी दो वर्ष तक हंस के सम्पादक मंडल में रहे। मुंशी प्रेमचंद की
मृत्यु के बाद हंस का संपादन उनके पुत्र प्रसिद्ध कथाकार अमृतराय ने
किया। इधर अनेक वर्षों से हंस का प्रकाशन बंद था। मुंशी प्रेमचंद के
जन्मदिन यानी ३१ जुलाई १९८६ से अक्षर प्रकाशन ने प्रसिद्ध कथाकार
राजेन्द्र यादव के सम्पादन में हंस को एक कथा मासिक के रूप में फिर से
प्रकाशित किया।
आज से 28 साल पहले जब अगस्त 1986 में राजेंद्र यादव ने हंस पत्रिका का
पुनर्प्रकाशन शुरू किया था, तब किसी को भी उम्मीद नहीं रही होगी कि यह
पत्रिका निरंतरता बरक़रार रखते हुए ढाई दशक तक निर्बाध रूप से निकलती
रहेगी, शायद संपादक को भी नहीं. उस व़क्त हिंदी में एक स्थिति बनाई या
प्रचारित की जा रही थी कि यहां साहित्यिक पत्रिकाएं चल नहीं सकतीं.
सारिका बंद हो गई, धर्मयुग बंद हो गया, जिससे यह साबित होता है कि हिंदी
में गंभीर साहित्यिक पत्रिका चल ही नहीं सकती. लेकिन तमाम आशंकाओं को धता
बताते हुए हंस ने यह सिद्ध कर
दिया कि हिंदी में गंभीर साहित्य के पाठक हैं..

“यह कहते हुए कोई संकोच या किसी तरह की कोई हिचक नहीं है कि पिछले ढाई
दशक की हिंदी की महत्वपूर्ण कहानियां हंस में ही छपीं. एक बार बातचीत में
यादव जी ने इस बात को स्वीकार करते हुए कहा था कि अगर झूठी शालीनता न
बरतूं तो कह सकता हूं कि हिंदी में अस्सी प्रतिशत श्रेष्ठ कहानियां हंस
में ही प्रकाशित हुई हैं और ऐसे एक दर्जन से ज़्यादा कवि हैं, जिनकी पहली
कविता हंस में ही छपी और आज उनमें से कई हिंदी के महत्वपूर्ण रचनाकार
हैं.” अनंत विजय (पत्रकार )
हंस ने अपने प्रकाशन के शुरुआती वर्षों में ही उदय प्रकाश की तिरिछ,
शिवमूर्ति की तिरिया चरित्तर, ललित कार्तिकेय की तलछट का कोरस, रमाकांत
की कार्लो हब्शी का संदूक, चंद्र किशोर जायसवाल की हंगवा घाट में पानी रे
और आनंद हर्षुल की उस बूढ़े आदमी के कमरे में छाप कर हिंदी कथा साहित्य
को एक नया जीवनदान दिया ।
“हंस का यह शायद सबसे बड़ा योगदान है कि जिस समय बड़ी प्रकाशन
संस्थाओं से निकलने वाली धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान ढेर हो रही थी, उस
दौर में एक लेखक के व्यक्तिगत प्रयास से निकलने वाली इस पत्रिका ने
साहित्य से लोगों को जोड़े रखने का कामकिया. टेलीविजन के रंगीन तिलिस्म
के सामने उसने मजबूती से साहित्य के जादू को बरकरार रखने का काम किया. जब
पत्रिकाएंपढ़ने वाला परिवार टेलिविजन धारावाहिकों के जादू में खोने लगा
था हंस ने साहित्य में लोगों का विश्वास बनाये रखने का कामकिया. सबसे
बड़ी बात है कि मनोरंजन प्रधान उस दौर में भी उसने साहित्यिक सरोकारों की
लौ को बनाये रखा. पत्रिकाओं के नामपर हिंदी में सन्नाटा छाता जा रहा था,
बस एक हंस थी. न जाने कितने कथाकार हैं जिन्होंने हंस के पन्नों से
गांवसमाजों तक अपनीव्याप्ति बनाई. हमारी पीढ़ी ने जिन कथाकारों कि ओर सर
ऊँचा करके देखा और लिखने की प्रेरणा पाई संयोग से उन सबको हंस ने हीइतना
ऊंचा बनाया.” जानकिपुल (हिन्दी का प्रमुख साहित्यिक ब्लॉग )
2003 लिटरेट वर्ल्ड द्वारा कराये गए 81 साहित्यकार के माध्यम से कराये गए
सर्वे के मुताबिक “हंस हिन्दी साहित्य की सर्वाधिक महत्वपूर्ण पत्रिका
कथा मासिक ‘हंस’ है।“ हिन्दी के एक साहित्यकार के मुताबिक उन्होंने प्रयास यही किया
कि वे ‘हंस’ को अपने नेतृत्व स्त्री
विमर्श और दलित विमर्श के झण्डे बुलन्द किए जाएँ। उन्होंने स्त्री और दलित को
आज हिन्दी साहित्य में राजेंद्र यादव एक एसा नाम हैं जिन्होंने लेखन
अपने उसूलो पर किया और बिना किसी की परवाह किये सामाजिक मुद्दो पर लेखन के
माध्यम से अपने विचार सामने रखे ।
28 अक्टूबर 2013 को उनका दिल्ली में निधन हुआ. वह प्रगतिशील-जनवादी सांस्कृतिक आन्दोलन के महत्वपूर्ण स्तम्भ थे. आज साहित्य और सामाजिक विमर्श में रुचि रखने वाले
हर पाठक को राजेंद्र यादव के साहित्य को जरूर पढ़ना चाहिए ।


साभार: 
https://www.facebook.com/groups/yaadgaareagra/permalink/337280386447443/ 

डॉ जितेंद्र रघुवंशी
 

Thursday, 31 October 2013

राजेन्द्र यादव जी की स्मरण गोष्ठी

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समाचार फोटो वीरेंद्र यादव जी की वाल से साभार
कल शाम लखनऊ में आयोजित आदरणीय  राजेंद्र यादव जी की स्मृति में सम्पन्न गोष्ठी में व्यक्त विचार इस समाचार कटिंग के माध्यम से वीरेंद्र यादव जी ने अपनी वाल पर शेयर किए थे। इसके अतिरिक्त 'हिंदुस्तान',लखनऊ के लाईव अंक में एक समाचार और जुड़ा हुआ है कि वक्ताओं ने चिंता व्यक्त की कि अब 'हंस' का उत्तराधिकारी कौन?
हिंदुस्तान लाईव,लखनऊ,पृष्ठ-26,दिनांक 31-10-2013


इस प्रश्न की आवश्यकता क्या थी ?जबकि राजेन्द्र यादव जी की फेसबुक वाल पर उनकी सुपुत्री सुश्री रचना यादव जी ने यह स्टेटस दे दिया था। :


मेरे पिता श्री राजेंद्र यादव के अचानक हम सब को छोड़ कर चले जाने पर आप सभी दोस्तों ने जितने शोक संदेश, संवेदना और श्रद्धांजलि अर्पित की है, मैं एवं हंस परिवार के सभी कार्यकर्ता आप सभी के आभारी हैं. इस समय हम सब को आप सभी के स्नेह, शुभकामनाओ और साथ की बहुत आवश्यकता है. पापा के हम सब में विश्वास और आपके इसी प्यार के भरोसे हम हंस की गरिमा को बनाये रखने कि कोशिश करेंगे और आप तक पहुँचाते रहेंगे.
परम् धन्यवाद सहित
रचना यादव एवं हंस परिवार


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पहले मेरा विचार इस गोष्ठी में उपस्थित होकर वक्ताओं को सुनने का था।  मुझे फेसबुक पर फ्रेंड स्वीकार करने में राजेन्द्र यादव जी ने बिलकुल भी संकोच नहीं किया था;  मैं तो उनको एक महान साहित्यकार के रूप में जानता था  जबकि मैं  खुद उनके लिए अनजान व्यक्ति था।परंतु फिर यह सोच कर जाना स्थगित कर दिया कि वहाँ तो बड़े- बड़े लोग होंगे और थे भी जिनमें सिर्फ  इप्टा के राकेश जी ही अभिवादन का ठीक से जवाब देते हैं बाकी लोग तो आश्चर्य से देखते हैं कि यह मामूली आदमी यहा कैसे?जब हिंदुस्तान में 'हंस' के उत्तराधिकारी के बारे में जिज्ञासा का समाचार पढ़ा तो लगा कि मैंने वहाँ उपस्थित न होकर अच्छा ही किया।
 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त माथुर