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Monday, 11 May 2015

यह इन्टरनेट की ताकत ही है----- अरविंद विद्रोही



इन्टरनेट यानि अंतर्जाल पर बने मित्रो के रिश्तो पर मेरा अनुभव

https://www.facebook.com/notes/arvind-vidrohi/% 

पड़ोसिओ,पारिवारिक रिश्तो अर्थात तथाकथित वास्तविक दुनिया के रिश्तो से बेहतर भावनाओ की समझ रखने वाले,समझने वाले और समझाने वाले ,हर ख़ुशी-गम आपस में मिल बटने वाले लोग मुझे तो इस तथाकथित आभाशी -काल्पनिक दुनिया में मिले है| अनतर्जाल पर पता नहीं कितने प्रकार के जाल होंगे लेकिन मैं तो अपने अंतर्जाल के इन मित्रो के स्नेह,ममत्व,अपनत्व के जाल में बहुत ही सुकून महसूस करता हूँ |                                                   मेरे अपने जीवन के उस मोड़ पर जब करीबी लगभग सभी रिश्तेदारों ने मुंह मोड़ लिया था ,राजनीतिक-सामाजिक लाभ ले चुके लोगो ने भी किनारा कस लिया था तो उस अकेलेपन के दौर से गुजरने में चन्द रिश्तो की डोर ने मुझे ताकत दिया,जीवन संघर्ष को आगे बढ़ाने के लिए मजबूर किया| यह चन्द रिश्ते ना होते तो शायद यह जीवन भी ना होता| अकेलेपन की दुनिया से निकलने और स्वार्थी लोगो से एक दुरी बनाये रखने के लिए इन्टरनेट का प्रयोग शुरु किया | आज यह गर्व से कह सकता हूँ की यह इन्टरनेट की ताकत ही है कि तमाम अनजाने लोगो से मेरी जान-पहचान हुई और उनके स्नेह ने मुझे दिनों दिन हौसला ही दिया | आज तमाम पुराने जानने वाले स्वार्थी रिश्तेदारों से मुझे निजात मिल चुका है,अब मेरी स्थिति सभी स्नेही जनों के आशीर्वाद से अच्छी है | उन लोगो से मिलने ,बात करने में मेरी तनिक भी रूचि नहीं रहती जिन्होंने मेरा साथ मेरे बुरे वक़्त में नहीं दिया | आज मैं इन्टरनेट के ही माध्यम से एक बड़े और नए रिश्तो को हशी-ख़ुशी जी रहा हूँ,खून से बड़े स्नेह रखने वाले लोग यहाँ मुझे मिले है|फेसबुक के सभी मित्र आज मुझे अपने परिवार के ही लगते है| मेरा अनुभव तो यही है इस अंतर्जाल के सन्दर्भ में ......

Sunday, 16 June 2013

धन का खेल

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 निम्नांकित घटनाएँ  भले ही अलग-अलग स्थानों की और अलग-अलग प्रतीत हों परंतु तीनों के मूल में 'धन' ही है। धन के आगे दूसरी किसी बात का महत्व नहीं है ये घटनाएँ इसी ओर इंगित करती हैं।




 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त माथुर

Friday, 14 June 2013

फेसबुक गाथा -1

20 मार्च 2013
वकील साहब की जुबानी अस्पताल की कहानी-
नाई साहब एक ओर तो हेयर कटिंग करते जा रहे थे तो साथ ही साथ एक साहब से बातें करते जा रहे थे। वह साहब चटकारे ले ले कर बातें बताते जा रहे थे। वह बता रहे थे कि,'मेदानता हास्पिटल'मे ज़बरदस्त सफाई रखी जाती हैवहाँ आते-जाते रहने के कारण उनका पान-गुटखा खाना तो बिलकुल ही छूट गया है। इससे तो उतनी दिक्कत नहीं होती है। तलब नहीं रोकी जा सकती उसे पूरा करने के लिए लखनऊ मे 40/- रु मे मिलने वाला क्वार्टर वहाँ मँगवाने पर रु 600/- मे पड़ता है क्योंकि 35-40 किलोमीटर दूर से मङवाना होता है। लाने वाला ढूँढने के बाद उसके आने-जाने का टैक्सी का खर्चा रु 500/- पड़ जाता है और उसे भी जेब खर्च देना पड़ता है। इसके बाद पीना भी किसी तपस्या से कम नहीं पड़ता है। उन्होने साझे का कमरा लिया हुआ है जिसमे दो पेशेंट हैं और उनके एक-एक तीमारदार हैं। एक रोज़ का किराया रु 4000/- प्रत्येक को पड़ता है। अतः उसी कमरे मे दूसरे पेशेंट व तीमारदार के सामने पीना जबकि अस्पताल मे पीना प्रतिबंधित हो संभव न था। इसलिए उनको टाइलेट की शरण लेनी पड़ी। उनका कहना था कि पूरे अस्पताल मे कहीं भी किसी भी कमरे मे कुंडा,चटकनी या ताला लगाने का प्रबंध नहीं है। जब कोई अंदर जाता है तो DND की प्लेट लटका जाता है और आने पर हटा देता है। वह पीने की जल्दबाज़ी मे बिना DND प्लेट लटकाए एक बार क्वार्टर और बिसलेरी की बोतल लेकर घुस गए। पीना शुरू ही किए थे कि दूसरे पेशेंट की तीमारदारन दरवाजा खोल कर घुस गई और उनको पीते देख कर हक्का-बक्का रह गई। उल्टे पैरों वह तो लौट गई लेकिन यह साहब घबरा गए और जल्दी से सब गटक कर खाली क्वार्टर की बोतल जेब मे डाल कर पानी की बोतल वापिस लेकर आ गए। साथ के पेशेंट की उन  तीमारदार महिला से उन्होने  गुस्से मे कहा कि उनकी मिसेज से पूछ तो लेतीं कि वह नीचे गए हैं या बाथरूम मे। उन महिला को डरा कर शिकायत कर्ने से तो रोक दिया परंतु खाली बोतल फिंकवाने के लिए फिर रु 100/- खर्च कर्ने पड़े। इतनी दास्तान सुनाने के बाद वह तो दूसरे खोके पर दाढ़ी बनवाने चले गए। चलते -चलते नाई ने पूछा कि अब फायदा है तो जवाब मे उन्होने नकारात्मक हाथ हिला दिया और बोले हम दिमाग पर टेंशन नहीं लेते हैं।सरकार खर्चा देती है तो इलाज चल रहा है वरना पैसा कहाँ था?
हमने उन नाई साहब से पूछा कि यह साहब किस विभाग मे नौकरी करते हैं। नाई ने बताया कि यह सामने वाली लाईन मे रहने वाले वकील साहब हैं ,बड़े ही व्यवहारिक हैं। इनकी पत्नी IAS हैं जिनको डेढ़ लाख मासिक वेतन मिलता है और एक वर्ष से कैंसर से पीड़ित हैं तबसे लगातार इलाज चल रहा है,दिल्ली मे और कभी-कभी मेदानता मे भी भर्ती करना पड़ता है। साल भर से ही उनकी वकालत ठप पड़ी है। फिर भी मस्त हैं।

Thursday, 9 May 2013

साहित्य में वह शक्ति छिपी होती है जो 'तोप,तलवार और बम के गोलों' में भी नहीं पाई जाती---आचार्य महावीर प्रसाद दिवेदी

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"साहित्य में वह शक्ति छिपी होती है जो 'तोप,तलवार और बम के गोलों' में भी नहीं पाई जाती"-आचार्य महावीर प्रसाद दिवेदी द्वारा लिखित यह पंक्ति मुझे आज भी ज्यों की त्यों याद है जिसे हाई स्कूल की पुस्तक में सिलीगुड़ी में 1965-67 के दौरान पढ़ा था। वस्तुतः आचार्य दिवेदी जी स्वतन्त्रता आंदोलन के परिप्रेक्ष्य में लिखे जा रहे साहित्य की ओर ध्यानाकर्षण कर रहे थे। 

विश्व इतिहास पर नज़र डालने से उनकी यह उक्ति बिलकुल सही सिद्ध होती है। महर्षि कार्ल मार्क्स के साहित्य के आधार पर ही 1917 में रूस में क्रांति सफल हुई थी। आज़ाद हिन्द फौज ने छोटे-छोटे पर्चे छाप कर जनता से ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध उठ खड़े होने का आव्हान किया था। 'विद्रोह या क्रांति' कोई ऐसी चीज़ नहीं होती कि,जिसका विस्फोट अचानक होता है। बल्कि इसके अनंतर 'अन्तर'को बल मिलता रहता है। 

इस अन्तर को जनता के समक्ष लाने वाला साहित्य ही प्रभावशाली होता है जिसकी 'शक्ति' का वर्णन आचार्य दिवेदी ने किया है। प्रस्तुत स्कैन कापी से उनके विचारों का ज्ञान होता है और यह भी कि उनको किस प्रकार आभावों एवं संघर्षों का सामना करना पड़ा तब भी वह विचलित न हुये एवं 'त्याग' का मार्ग अपना कर 'तप' में तल्लीन रहे। । लेकिन आज साहित्य के नाम पर आत्म-प्रशंसक लेखक जो खुद को बड़ा साहित्यकार घोषित करते हैं तीन-तिकड़म से स्थापित होने को प्रयास रत हैं क्या भावी इतिहास इनको तवज्जो देगा? क्या वे आचार्य महावीर प्रसाद दिवेदी जी के जीवन से कोई प्रेरणा ग्रहण कर सकेंगे?या धन-बल पर धन संग्रह हेतु अपना दुलत्ती अभियान जारी रखेंगे?

संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त माथुर