Monday, 7 April 2014

बेगम हज़रत महल -स्मृति दिवस पर ---संजोग वाल्टर

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Begum Hazrat Mahal , born c. 1820 also known as Begum of Awadh, was the first wife of Nawab Wajid Ali Shah.She rebelled against the British East India Company during the Indian Rebellion of 1857. After her husband had been exiled to Calcutta, she took charge of the affairs in the state of Awadh and seized control of Lucknow. She also arranged for her son, Prince Birjis Qadir, to become Wali (ruler) of Awadh; However, he was forced to abandon this role after a short reign. She finally found asylum in Nepal where she died in 7 April 1879.



Saturday, 29 March 2014

भारतीय जनता पार्टी के चुनाव फंड के लिए पैसा जुटाने के लिए इनकम टैक्स की डिप्टी कमिश्नर पूनम राय और उनके पति रिश्वत लेते गिरफ्तार---पंकज चतुर्वेदी




भारतीय जनता पार्टी के चुनाव फंड के लिए पैसा जुटाने के लिए इनकम टैक्स की डिप्टी कमिश्नर पूनम राय और उनके पति भाजपा नेता गणेश मालवीय सहित पांच लोगों को शुक्रवार रात सीबीआई ने दस लाख रुपए की रिश्वत लेते गिरफ्तार किया। गणेश मालवीय भाजपा की केंद्रीय चुनाव समिति के राष्‍ट्रीय सहसंयोजक सदस्‍य, मोदी जी व मप्र के मुख्‍यमंत्री चौहानजी के करीबी हैंा फेस बुक पर इस लिंक पर देखें वे कैसे साहेब के साथ हैं https://www.facebook.com/ganeshkmalviya?fref=browse_search



एक दशक पहले तक श्री मालवीय एक छोटे से अखबार के पत्रकार थेा एनडीए शासन के दौरान ये एक केंद्रीय मंत्री विक्रम वर्मा के पर्सनल स्‍टाफ में आ गए और वहीं उनकी मुलाकात आईआरएस अफसर पूनम राय से हुई व उनका विवाह हुआा अपने सियासती रसूख के बल पर ही पूनमजी भोपाल में आ गई और वे शहरी के सबसे मलाईदासर सर्किल की अफसर थींा
सीबीआई ने भरत नगर (शाहपुरा) स्थित इनकम टैक्स कॉलोनी में 2007 बैच की आईआरएस अफसर पूनम के घर पर ही यह कार्रवाई की। जैसे ही मालवीय का कर्मचारी रुपए लेकर घर पहुंचा, सीबीआई टीम ने उसे दबोच लिया। वह एक चार्टर्ड अकाउंटेंट के एमपी नगर स्थित दफ्तर से रिश्वत की रकम लेकर आया था। सेंट्रल इंडिया में इनकम टैक्स अधिकारी पर की गई यह अब तक की सबसे बड़ी कार्रवाई मानी जा रही है। सीबीआई रात 12 बजे तक पूनम से पूछताछ करती रही।

सीबीआई अधिकारियों ने बताया कि रामायण कंस्ट्रक्शन कंपनी के अधिकारियों को इनकम टैक्स रिटर्न में गड़बड़ी को ठीक करने के लिए डिप्टी कमिश्नर ने 25 लाख रुपए की रिश्वत मांगी थी। बिल्डर ने इसकी शिकायत सीबीआई को की थी।
महिला अफसर के पति गणेश मालवीय ने इसमें मध्यस्थता की और सौदा 18 लाख रुपए में तय किया था। इसकी पहली किस्त 10 लाख रुपए शुक्रवार शाम को एमपी नगर स्थित एक चार्टर्ड अकाउंटेंट के दफ्तर में दी गई थी। सीए और उसका भतीजा जब दफ्तर में यह रकम गिन रहे थे, तभी वहां सीबीआई अधिकारी पहुंच गए। इसी दौरान वहां रिश्वत की रकम लेने के लिए मालवीय के एनजीओ मृत्युंजय का कर्मचारी संजय पहुंचा। सीबीआई अधिकारियों ने खुद को सीए ऑफिस का कर्मचारी बताकर उससे पूछा कि वह रकम कैसे ले जाएगा? संजय ने कहा कि कुछ ही देर में गणेश भैया का फोन आएगा। कुछ देर बाद गणेश ने फोन संजय से रकम लेकर घर आने को कहा। सीबीआई अधिकारियों ने संजय की बाइक पर अपना एक गवाह बिठा दिया। संजय जैसे ही यह रकम लेकर घर पहुंचा, वहां दूसरी टीम ने गणेश को यह रकम लेते हुए रंगे हाथों दबोच लिया।

https://www.facebook.com/pankaj.chaturvedi2/posts/10202686515197410

Wednesday, 26 March 2014

मीठी-मीठी बातों से क्यों आगाह किया था?



 

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 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त माथुर

Thursday, 6 March 2014

चिकित्सकों को जन-विरोधी सिद्ध करने का औचित्य क्या है?












फेसबुक तथा समाचार-पत्रों के माध्यम से एक बड़ा वर्ग कानपुर के चिकित्सा  छात्रों एवं चिकित्सक/शिक्षकों के साथ हुये अन्यायपूर्ण अत्याचार के बावजूद समस्त चिकित्सक समुदाय को दोषी सिद्ध करके बर्बर पुलिस और अमानवीय प्रदेश सरकार को बचाने का प्रयास कर रहा है।

उपरोक्त दोनों वीडियों का अवलोकन करने तथा चिकित्सकों के बयानों का अध्ययन करने से ज्ञात होगा कि किस प्रकार पुलिस के माध्यम से छात्रों एवं शिक्षक चिकित्सकों को पुलिस द्वारा उत्पीड़ित कराया गया है इस संबंध में कानपुर के जिलाधिकारी का कहना है कि छात्रावास में पुलिस जाने की उनको जानकारी थी। क्या उन्होने प्राचार्य से पुलिस प्रवेश की अनुमति ली थी? यदि नहीं तो पुलिस के साथ-साथ वहाँ के जिलाधिकारी भी  इस उत्पीड़न में भागीदार हैं और बेगुनाह मरीजों की मौतों के लिए जिम्मेदार हैं। 


https://www.facebook.com/photo.php?fbid=295422987277272&set=gm.616254928457429&type=1&theater शिक्षा  संस्थानों में पुलिस का प्रवेश ब्रिटिश शासन में भी वर्जित था और बगैर प्राचार्य की पूर्वानुमती के पुलिस विद्यालय अथवा छात्रावास में नहीं घुस सकती थी। एक उदाहरण इस संबंध में शाहजहाँपुर के मिशन हाईस्कूल का देना उपयुक्त रहेगा। सभी जानते थे कि राम प्रसाद बिस्मिल जो वहाँ कक्षा नौ के छात्र थे देश की आज़ादी के लिए क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय रहते थे। सरकार ने खुफिया जानकारी के आधार पर उनको गिरफ्तार करने हेतु स्कूल भेजा था किन्तु प्राचार्य महोदय ने बिस्मिल जी की देश-भक्ति के मद्देनजर उनको गिरफ्तार न होने देने का निश्चय करके पुलिस को अपने कार्यालय में उलझाए रख कर कक्षाध्यापक के पास संदेश भेजा कि हाज़िरी रजिस्टर में रामप्रसाद को 'अनुपस्थित' दिखा कर कक्षा से भगा दें।रामप्रसाद जी ऊपरी मंजिल की कक्षा में थे और खिड़की के जरिये पेड़ पर कूद कर नीचे उतर  कर गायब हो गए जब पुलिस का कक्षा में प्रवेश हुआ वह वहाँ नहीं मिले हाजिरी  रजिस्टर में भी गैर-हाजिर पाये गए। 

लेकिन इस वीडियों में डॉ प्रोफेसर साहब बता रहे हैं कि पुलिस ने गेट बंद करवाकर छात्रों के साथ-साथ उनको भी पीटा और गालियां दी तथा गिरफ्तार करके थाने भेज दिया। गुलाम भारत में विद्यालय के अध्यापकों ने क्रांतिकारी बिस्मिल को बचा लिया किन्तु आज़ाद भारत में छात्रों को बचाने की प्रक्रिया में शिक्षक चिकित्सक भी पिटे व गिरफ्तार हुये जिसके  लिए कानपुर के जिलाधिकारी और एस पी सीधे -सीधे तथा प्रदेश सरकार अप्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदार हैं।  

डाक्टरों के आंदोलन के संबंध में पुलिस और प्रशासन की बदनीयती का एक और उदाहरण आगरा का है। सरोजनी नायडू मेडिकल कालेज के जूनियर डाक्टर्स का आंदोलन था और उस समय के एस पी सिटी ( जो DG भी बने ) ने मजिस्ट्रेट से ब्लैंक साईंन  करा कर रखे वारंट्स के आधार पर डाक्टर नेताओं को गिरफ्तार कर लिया था। भाकपा ने डाक्टरों का समर्थन किया और अपने कार्यालय से मशाल जुलूस निकाला था। राजा-की-मंडी चौराहे पर पहुँचते ही  जुलूस में शामिल जिलामंत्री कामरेड रमेश  मिश्रा समेत सभी लोगों को उस एस पी सिटी द्वारा हस्तगत ब्लैंक  वारंट्स के आधार पर गिरफ्तार कर लिया गया । यहाँ तक कि डॉ जवाहर सिंह धाकरे जो उस एस पी सिटी के शिक्षक भी रहे थे को भी नहीं बकशा  गया। सहायक जिलमंत्री डॉ महेश चंद्र शर्मा जी और मैं बच कर पार्टी कार्यालय आ गए और पार्टी कार्यालय नियमित खुलता रहा। रोजाना डाक्टरों व कम्युनिस्ट नेताओं के समर्थन में मजदूर भवन से  गिरफ्तारी आंदोलन चला। किसी ने भी जमानत नहीं कराई और अंत में पंद्रह दिन बाद  सभी को बिना शर्त रिहा किया गया। 

मुकदमा पार्टी नेताओं पर आगजनी व अशांति भड़काने का लगाया गया था। बाज़ार के दूकानदारों ने सभी गिरफ्तारियों की निंदा की थी और पुलिस के  आरोपों को झूठा साबित कर दिया था। लेकिन कानपुर में चिकित्सकों के साथ हुई इस ज्यादती पर कुछ लोग डाक्टरों को ही गुनाहगार ठहरा रहे हैं जो सर्वथा गलत है। जनता को डाक्टरों के साथ खड़े होना चाहिए अन्यथा फासिस्ट सरकार आने वाले समय में दूसरे वर्गों का भी जब उत्पीड़न करेगी तब उनको भी जन-समर्थन मिलना मुश्किल हो जाएगा। 




Friday, 28 February 2014

शुतुरमुर्ग चाल के वामपंथियों के लिए

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http://www.livehindustan.com/



Satya Narayan 

अब सुन ए केजरीवाल
कांग्रेस और भाजपा के राज की तरह
अब भी है मज़दूरों का हाल बेहाल

ठेकेदारी-प्रथा को ख़त्म न करके तुम करते हो ठेकेदारों को मालामाल
और मज़दूरों को करते हो कंगाल
लगता है आप पार्टी है ठेकेदारों की दलाल
लोकसभा के चुनाव में मत भेजना टोपी-धारियों को मज़दूर बस्तियों में
क्योंकि जाग गया है मज़दूर और अब
खिंच सकती है आपके "कार्यकर्ताओं" की खाल.…. .






2011 में, मीरा  हिलेरी क्लिंटन के  'अंतरराष्ट्रीय महिला व्यापार नेतृत्व परिषद' में शामिल 


 मीरा सान्याल दक्षिण मुंबई से चुनाव लड़ेंगी:

 मेधा ने स्पष्ट किया है कि आम आदमी पार्टी के टिकट पर वह चुनाव में उतरेंगी। हालांकि अभी उन्होंने अपनी सीट के बारे में पत्ते नहीं खोले हैं। दूसरी ओर, रॉयल बैंक ऑफ स्कॉटलैंड (इंडिया) की पूर्व अध्यक्ष मीरा सान्याल 'आप' के टिकट से केंद्रीय राज्यमंत्री मिलिंद देवड़ा को चुनौती देंगी। मीरा वही भारतीय महिला हैं जिसको हिलेरी क्लिंटन के राज्य सचिव के तरफ से 'अंतरराष्ट्रीय महिला व्यापार नेतृत्व परिषद' में शामिल होने का मौका मिला था।
साल के शुरुआत में मीरा आम आदमी पार्टी में शामिल हुईं थी और उन्होंने दक्षिण मुंबई से लोकसभा का टिकट मांगा था। पार्टी उनकी इच्छा को पूरा करते हुए देवड़ा के खिलाफ चुनाव लड़ने की अनुमति दे दी है।

मीरा सान्याल दक्षिण मुंबई संसदीय क्षेत्र से 2009 के लोकसभा चुनावों में निर्दलीय उम्मीदवार थी। उस दौरान मीरा चुनाव हार गईं थीं। इस बार मीरा ने चुनावी मैदान में सफल होने के लिए 'आप' का सहारा लिया है। फिलहाल मीरा 'लिबरल्स इंडिया फॉर गुड गवर्नेंस' संस्था की अध्यक्ष भी हैं। गौरतलब है कि मीरा ने समाज सेवा के लिए रॉयल बैंक ऑफ स्कॉटलैंड का अध्यक्ष पद छोड़कर राजनीति में कदम रखा था।


52 वर्षीय मीरा भारत के मशहूर और प्रभावशाली बैंकर्स में से एक हैं। उनका जन्म कोच्चि में हुआ था। मीरा सान्याल स्वर्गीय एडमिरल गुलाब मोहनलाल हीरानंदानी की पुत्री हैं, जिन्हें वीरता पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। एडमिरल गुलाब मोहनलाल का नाम भारतीय नौसेना के इतिहास में सुनहरे अक्षरों में लिखा जाता है। मीरा एएमपी रिटेल सर्विसेज के एमडी आशीष जे सान्याल की पत्नी हैं। मीरा ने अपनी शुरुआती पढ़ाई मुंबई से की थी और फ्रांस के आईएनएसईएडी से एमबीए की डिग्री हासिल की।

अपने 30 साल के बैंकिंग करियर के दौरान मीरा ने आखिरी के 6 साल आरबीएस बैंक के लिए काम किया। इसके पहले, 15 साल एबीएन एएमआरओ बैंक में 15 साल काम किया। मीरा ने कंपनी को ग्लोबल बैंकिंग और टैक्नोलॉजी सेवाएं देने के लिए तैयार किया था। आज यह कंपनी भारत में लगभग 12 हजार लोगों को रोजगार प्रदान कर रही है। 2005 में मीरा को 17 देशों के लिए बैंक का प्रमुख बनया गया था।

 मीरा एक अंतरराष्ट्रीय एनजीओ 'राइट टू प्ले' की सदस्य भी हैं। यह संस्था बच्चों के विकास के लिए 20 देशों में काम करती है।

2011 में, मीरा को हिलेरी क्लिंटन के राज्य सचिव के तरफ से 'अंतरराष्ट्रीय महिला व्यापार नेतृत्व परिषद' में शामिल होने का न्योता मिला था। मीरा ने इस परिषद का हिस्सा बनकर महिलाओं के विकास में अहम योगदान दिया था। फाइनेंस के क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन के लिए उन्हें 'भारतीय वाणिज्य मंडलों के संघ का सदस्य बनाया गया था'। इसके साथ ही मीरा सीआईआई के बैंकिंग और वित्त, सार्वजनिक नीति और महिलाओं की सुरक्षा के लिए राष्ट्रीय परिषद की सदस्य भी हैं।

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शुतुरमुर्ग चाल और प्रवृति के वामपंथी लगातार केजरीवाल/आ आ पा भक्ति के गीत गाये जा रहे हैं। इधर ममता बनर्जी की हज़ारे से समर्थन प्राप्त करने की कूटनीतिक चाल ने तो ऐसे लोगों को किंकर्तव्य विमूढ़ कर दिया है और वे अनर्गल प्रलाप में निमग्न हो गए हैं। 'दीवार पर लिखे को न पढ़ने' और न समझने के कारण वे एक तानाशाह के बदले दूसरे तानाशाह को आमंत्रण देते से प्रतीत  होते हैं जब  उनके द्वारा केजरीवाल व उनकी पार्टी को ईमानदार तथा जन-हितैषी बताया जाता है जबकि 17 फरवरी 2014 को खुल कर खुद को वह पूंजीवाद समर्थक घोषित कर चुके हैं। 

केजरीवाल की पार्टी द्वारा जिन धनिकों या विदेशी सत्ता के शुभेच्छुओं को अपना उम्मीदवार बनाया जा रहा है उनका भारत देश व इसकी जनता के हित से कोई सरोकार नहीं है। दिल्ली सरकार में केजरीवाल ने एक कारखानादार को श्रम मंत्री बनाया था जिसने मजदूरों का घनघोर दमन व उत्पीड़न किया था फिर भी किस मुंह से खुद को वामपंथी कहने वाले लोग उनका समर्थन करते हैं इसे तो वे ही जानें किन्तु इतना स्पष्ट है कि इस दृष्टि के पीछे साधारण जनता और मजदूर वर्ग का हित नहीं है। 

बहुत ही साधारण सी बात है कि जब उदारीवाद के मसीहा मनमोहन जी आउट आफ़ डेट हो गए और उनका विकल्प मोदी साहब जन-संहार के दोष से उबर नहीं पाये तो देशी-विदेशी कारपोरेट को केजरीवाल साहब के रूप में नव-उदारीवाद का मसीहा नज़र आया और उनको राजनीति के स्टेज पर प्रस्तुत कर दिया गया। किन्तु उनके समर्थक वामपंथी क्यों उनकी छवी चमका रहे हैं जिनके हाथ मजदूरों के खून से सने हुये हैं?



Tuesday, 18 February 2014

इस तरह के कल्पना विलासी नेता से तो जनता के हितों की रक्षा करना संभव नहीं लगता ---जगदीश्वर चतुर्वेदी

मुक्त व्यापार,मुक्त बाज़ार का मुक्त नायक केजरीवाल

February 18, 2014 at 10:00am
अरविंद केजरीवाल पर मीडिया के लट्टू होने की वजह धीरे धारे साफ़ होती जा रही हैं। साथ ही नव्य उदार आर्थिक नीतियों के हिमायती युवाओं के उसके प्रति आकर्षण के वैचारिक कारण भी सामने आने लगे हैं । हमें यह भ्रम भी नहीं पालना चाहिए कि केजरीवाल सिस्टम में परिवर्तन करने के लिए राजनीति में आए हैं । वे भी यह नहीं मानते ।
अरविंद केजरीवाल ने साफ़ कहा है कि वह 'क्रोनी कैपीटलिज्म" ( लंपट पूँजीवाद) के ख़िलाफ़ है। लेकिन पूँजीवाद के पक्ष में है। सीआईआई के जलसे में बोलते हुए केजरीवाल ने कहा

"We are not against capitalism, we are against crony capitalism", ( बिज़नेस स्टैंडर्ड, 17फरवरी 2014)
यह भी कहा 'हम ग़लती कर सकते हैं लेकिन हमारी मंशाएँ भ्रष्ट नहीं हैं।'
केजरीवाल की मंशाएँ साफ़ हैं और लक्ष्य भी साफ़ हैं। पहलीबार केजरीवाल ने आर्थिक नीतियों के सवाल पर अपना नज़रिया व्यक्त करते हुए जो कुछ कहा है वह संकेत है कि आख़िरकार वे देश को किस दिशा में ले जाना चाहते हैं ?

केजरीवाल पर बातें करते समय उनके आम आदमी पार्टी के गठन के पहले के बयानों और कामों के साथ मौजूदा दौर में दिए जा रहे बयानों का गहरा संबंध है फिर भी हमें राजनेता केजरीवाल और सामाजिकनेता केजरीवाल में अंतर करना होगा ।
आम आदमी पार्टी के गठन के बाद केजरीवाल यह पहला महत्वपूर्ण नीतिगत बयान है। यह बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि उनके दल के साथ सोशलिस्टों, अतिवामपंथी, उदार देशभक्त और जानेमाने वामपंथी विचारधारा के लोग भी शामिल हैं। ये सब वे लोग हैं जो कल तक विभिन्न मंचों से अपने जो विचार रख रहे थे उनसे केजरीवाल के आर्थिक विचारों का मेल बिठाने में असुविधाएं हो सकती हैं ।
केजरीवाल ने साफ़ शब्दों में अपने नज़रिए की बुनियादी धारणा पेश की है , उन्होंने कहा है
"Time has come to define what is the government's role," Kejriwal said, adding the government has no business to be in business, which is best left to private players.

He said whatever the form of government, it has three primary tasks - providing security, justice and a corruption-free administration."

यानी केजरीवाल चाहते हैं सरकार या राज्यसत्ता की बाज़ार के नियमन में कोई भूमिका न हो । वे चाहते हैं सरकार का काम है सिर्फ़ प्रशासन चलाना ।व्यापार के काम को निजी क्षेत्र के रहमोकरम पर छोड़ दिया जाय।

नव्य उदार आर्थिक नीति की भी यही माँग रही है। इसी माँग की पूर्ति के लिए कांग्रेस काम करती रही है और बाज़ार की शक्तियाँ ही तय करती रही हैं कि व्यापार में क्या हो?

यह अचानक नहीं है कि केजरीवाल 48दिन दिल्ली में सरकार में रहे लेकिन उन्होंने महँगाई नियंत्रण के लिए कोई क़दम नहीं उठाया । यहाँ तक कि व्यापारियों की लूट -खसोट के ख़िलाफ़ कोई बयान तक नहीं दिया।

केजरीवाल ने अपने बयान में मूलत: मुक्त बाज़ार की धारणाओं की हिमायत की है और जो फ़ार्मूला सुझाया है वह विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष विगत कई दशकों से सुझाता रहा है । यह नीति लगातार सभी देशों में पिटती रही है यहाँ तक कि अमेरिका में भी पिटी है।

मुक्त बाज़ार का मतलब भारत जैसे देश के लिए आत्मघाती है। इसका यह भी अर्थ है कि मनमोहन सिंह की सरकार द्वारा जो जनविरोधी आर्थिक नीतियाँ लागू होती रही हैं उनको लेकर बुनियादी तौर पर केजरीवाल का कोई बुनियादी सैद्धांतिक मतभेद नहीं है। केजरीवाल की मनमोहन सिंह के बारे में जो धारणा है वह जानें,कहा है,
"The world's best economic expert is our Prime Minister Manmohan Singh. During the last 10 years of UPA tenure, you saw best economic policies but the biggest drawback was lack of honest politics. As there was no honest politics, those economic policies could not be implemented,"

यानी मनमोहन सिंह की नीतियाँ सही हैं लेकिन संकट है तो ईमानदार राजनीति का । ईमानदार राजनीति हो और मनमोहन सिंह की नीतियाँ रहें तो बस सोने में सुहागा समझो !

ईमानदार राजनीति का जनहितकारी नीतियों से गहरा संबंध है। मनमोहन सिंह की जनविरोधी नीतियों का भ्रष्ट राजनीति से गहरा संबंध है । मनमोहन सिंह की नीतियाँ " लंपट पूँजीवाद" की जनक हैं। समस्या ईमानदार नेता और बेईमान नेता में से चुनने की नहीं है ।

समस्या यह है मनमोहन सिंह की नीतियाँ रहें या जाएँ ? क्या केजरीवाल के पास मनमोहन सिंह की सुझायी और लागू की गयी नीतियों का कोई विकल्प है ? केजरीवाल के बयान से लगता है उनके पास मनमोहन सिंह की नीतियों का कोई विकल्प नहीं है। नीति मनमोहन सिंह की और राजनीति केजरीवाल की !

केजरीवाल का यह कहना कि सरकार का काम है प्रशासन चलाना और व्यापार के काम से सरकार को बाहर रहना चाहिए । इसका क्या अर्थ लें ?

केजरीवाल के अनुसार व्यापार के नियम व्यापारी बनाएँ , सरकार उस काम में हस्तक्षेप न करे। यानी वे व्यापारियों को मनमानी करने का अबाधित हक़ देना चाहते हैं। बाज़ार को सरकारी चंगुल से पूरी तरह मुक्त करते हुए वे क्या करना चाहते हैं इस पर साफ़तौर पर कुछ नहीं कहा ।

मसलन केजरीवाल से पूछा जाना चाहिए कि रेडियो तरंगों का मालिक कौन रहेगा ? सरकार रहेगी या निजी क्षेत्र ? क्या रेडियो तरंगों के बाजिव दाम मिल जाएँगे तो रेडियो तरंगों को निजी क्षेत्र को बेच दिया जाय ?
यह सच है केन्द्र सरकार ने रेडियो तरंगें निजी क्षेत्र को बेचकर राष्ट्र को भारी क्षति पहुँचायी है । रेडियो तरंगों को किसी भी क़ीमत पर निजी क्षेत्र को बेचना राष्ट्रहित में नहीं है। ये तरंगें राष्ट्र के लिए आवंटित हैं और राष्ट्र की संपदा हैं। इसी तरह मुनाफ़ा देने वाले सार्वजनिक क्षेत्र के कारख़ानों के निजीकरण के प्रयासों को देखा जाना चाहिए ।
आम आदमी पार्टी का सार्वजनिक क्षेत्र के कारख़ानों और संस्थानों को लेकर क्या नज़रिया है ? इस पर केजरीवाल चुप रहे ? लेकिन उनकी मुक्तबाजार की धारणा साफ़ बता रही है कि वे सार्वजनिक क्षेत्र के पक्ष में नहीं हैं ।

यानी केजरीवाल को मौक़ा मिलेगा तो वे सार्वजनिक क्षेत्र को तेज़ी से निजी हाथों में सौंपेंगे ।

असल में अरविंद केजरीवाल का 'लंपट पूँजीवाद' का विरोध भी नक़ली है । वे चालाकी से इस बात को छिपा रहे हैं कि 'लंपट पूँजीवाद' तो पूँजीवाद के स्वाभाविक विकास की प्रक्रिया के गर्भ से पैदा हुआ है ।
अमेरिका को 'लंपट पूँजीवाद' का जनक माना जाता है और वहाँ पर बड़े पैमाने पर इसके दुष्परिणाम जनता को भोगने पड़े हैं । मुक्त बाज़ार का सिद्धांत अंततः 'लंपट पूँजीवाद' में जाकर ही शरण लेता है ।
'लंपट पूँजीवाद' के आदर्श नायकों का जनक नव्य आर्थिक उदारीकरण है । केजरीवाल से लेकर मेधा पाटकर तक किसी को इसे लेकर समस्या नहीं है। दिलचस्प बात यह है कि स्वयंसेवी संगठनों का जो नेटवर्क विगत 25 सालों में पैदा हुआ था उसका बहुत बड़ा हिस्सा इनदिनों आम आदमी पार्टी में समाहित हो चुका है । इसमें वे लोग भी हैं जो कल तक नव्य आर्थिक पूँजीवाद का विरोध कर रहे थे ,ज़मीनी संघर्ष चला रहे थे । लेकिन केजरीवाल के सीआईआई में दिए गए बयान ने साफ़ कर दिया है कि इन सभी रंगत के सामाजिक संगठनों का नव्य आर्थिक उदारीकरण का विरोध तात्कालिक और अवसरवादी था ।

केजरीवाल के द्वारा 'मुक्त व्यापार' की हिमायत करने को एक बड़ी राजनीतिक सफलता के रुप में भी देख सकते हैं । कम से कम केजरीवाल के ज़रिए वे तमाम संगठन जो कल तक मेधा पाटकर से लेकर लिंगराज के नेतृत्व में नव्य आर्थिक पूँजीवादी नीतियों का विरोध कर रहे थे , वे अब खुलकर मुक्त व्यापार के पक्ष में आ गए हैं। यह एनजीओ मार्का परिवर्तनकामी राजनीति में आया नया परिवर्तन है और त्रासद परिवर्तन है ।

केजरीवाल का मुक्त व्यापार की हिमायत में दिया गया बयान माओवादी,नव्य वामपंथियों और दिल्ली के फ़ैशनेबुल सोशलिस्टों के अब तक के नीतिगत बयानों का अतिक्रमण करता है ।

सवाल यह है क्या ये लोग अब भी केजरीवाल के मुक्त बाज़ार ,मुक्त व्यापार और राज्य की भूमिका को लेकर दिए गए बयान से सहमत हैं ? और साथ रहना चाहते हैं ? क्या मुक्त व्यापार का नारा सिस्टम को बदल सकता है ? क्या मुक्त व्यापार की नीतियों से आम जनता के हितों की रक्षा संभव है ? क्या मुक्त व्यापार की नीतियों के चलते 'लंपट पूँजीवाद' से बचना संभव है ? राज्य को व्यापार से पूरी तरह मुक्त करके केजरीवाल किन वर्गों की सेवा करना चाहते हैं ?
केजरीवाल जिस मुक्त व्यापार की हिमायत कर रहे हैं उसकी एक ज़माने में स्वतंत्र पार्टी और संगठन कांग्रेस ने जमकर हिमायत की थी और देश की संसद ने मुक्त व्यापार के सिद्धांत को अनेकबार ठुकराया है। 'मिश्रित अर्थव्यवस्था' का रास्ता मुक्त व्यापार के ख़िलाफ़ विचारधारात्मक संघर्ष के क्रम में ही जन्मा था ।

मनमोहन सिंह ने विगत २० सालों में मुक्त व्यापार की हिमायत करते हुए बार बार सार्वजनिक क्षेत्र पर हमला किया है और दूरसंचार से लेकर बिजली तक सभी क्षेत्रों में निजी क्षेत्र के हाथों औने-पौने दामों पर सरकारी संपत्ति को बेचा है । विनिमयन के नाम पर मुक्त बाज़ार और बाज़ार की शक्तियों को अबाध अधिकार दिए हैं । केजरीवाल की नज़र में यह सब जायज़ दाम वसूली का मामला मात्र है । मसलन् रेडियो तरंगें हों या कोयला खदानें उनको यदि जायज़ दामों पर बेच दिया जाता तो उनको कोई आपत्ति नहीं होती । समस्या यहीं पर है।

राज्य की संपदा को निजी क्षेत्र को क्यों बेचें ? क्या सरकार संपदा का प्रबंधन सही तरीक़ों और कौशलपूर्ण ढंग से नहीं कर सकती ? क्या सरकारी प्रबंधन और संचालन की नई नीति नहीं बनायी जा सकती ?
केजरीवाल का मानना है सरकार का काम ख़ाली प्रशासन चलाना है ।व्यापार करना नहीं है । नौकरी देना सरकार की ज़िम्मेदारी नहीं है वह तो निजी क्षेत्र की ज़िम्मेदारी है । इस तरह के कल्पना विलासी नेता से तो जनता के हितों की रक्षा करना संभव नहीं लगता ।

मुक्त बाज़ार और मुक्त व्यापार की हिमायत मूलत: जनतंत्र का विलोम है। मुक्त व्यापार में जनतंत्र तो अमीरों की रखैल है।
अमेरिका में मुक्त व्यापार है और वहाँ लोकतंत्र के नाम पर धनतंत्र है। आम आदमी की कोई हैसियत नहीं है। भारत में अभी भी लोकतंत्र में ग़रीब को ताक़त हासिल है और उसके बिना आप कुछ नहीं कर सकते ।

मुक्त व्यापार में लोकतांत्रिक संरचनाएँ मनमाने नियमों के तहत काम करती हैं। याद करें अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा के पहले राष्ट्रपति चुनाव परिणामों को वहाँ मतपत्रों की गिनती पूरी किए बिना ही उनको राष्ट्रपति बना दिया गया , हमारे देश में यह संभव नहीं है। मुक्त व्यापार के जगत में नीतियों का फ़ैसला सीधे कारपोरेट घराने लेंगे और वह स्थिति भारत के लिए बेहद ख़तरनाक हो सकती है ।

केजरीवाल अपनी भाषणकला के ज़रिए नीतिगत सवालों से कन्नी काटते रहे हैं और घूम फिरकर भ्रष्टाचार के मुद्दे पर चले आते हैं। भ्रष्टाचार से लड़ना ज़रुरी है लेकिन अन्य समस्याओं से भी लड़ना ज़रुरी है।

आम आदमी पार्टी को सोचना होगा कि वे मुज़फ़्फ़रनगर के दंगों पर चुप क्यों रहे ? वे गुजरात के दंगों या सिख दंगों पर बोलते हैं लेकिन मुज़फ़्फ़र नगर के दंगों पर चुप रहते हैं,यह नहीं चलेगा।दंगों में से चुनने का सवाल नहीं है । उसी तरह मोदी की साम्प्रदायिकता पर हमले करें लेकिन दिल्ली में एक जाति विशेष के लोगों या हरियाणा में जाति विशेष के लोगों द्वारा फैलाए जा रहे ज़हर का वोटबैंक की राजनीति के दबाव के कारण विरोध ही न करना ग़लत है ।

भारत में मुक्त व्यापार की हिमायत कल्पना विलास है और इससे जनता की मौजूदा बदहाली को ख़त्म नहीं किया जा सकता । केजरीवाल के पास अभी भी समय है और सोचें कि देश की आर्थिक उन्नति के लिए उनके पास नया क्या है ? मुक्त व्यापार की हिमायत तो नई बोतल में पुरानी शराब ही है और भारत की जनता यह शराब बार बार ठुकरा चुकी है ।


Friday, 14 February 2014

श्रम की प्रतिष्ठा का उत्सव :संत रविदास जयंती---सदानंद शाही/विजय राजबली माथुर

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वर्ण आधारित श्रेष्ठताक्रम को चुनौती :

सत्य की स्थापना हेतु वर्ण आधारित श्रेष्ठताक्रम को चुनौती देना संत रविदास का एक पुनीत 'कर्म' था। वर्णाश्रम-व्यवस्था को जन्मना बना देने से जातियों व उप-जातियों की उत्पत्ति  हुई जो आज तक पूरे देश को जकड़े हुये है और इसी वजह से देश लगभग 1100-1200 वर्ष पराधीन भी रहा है। 'सत्य' को नकारते हुये जहां कुछ लोग 'आर्य' शब्द को विदेशी आक्रांता वर्ग की एक जाति के रूप में निरूपित करते हैं वहीं दूसरी ओर कुछ लोग इसे देश की ही एक जाति बताते हैं। जबकि दोनों ही बातें पूर्ण रूप से असत्य हैं। 

वस्तुतः 'आर्य' कोई जाति,धर्म या नस्ल नहीं है। 'आर्य' शब्द 'आर्ष' से बना है जिसका अर्थ होता है श्रेष्ठ अर्थात जो मनुष्य श्रेष्ठ कर्म करते हैं वे सभी आर्य हैं चाहें वे किसी भी जाति,धर्म या नस्ल को मानने वाले हों और दुनिया के किसी भी कोने में रहते हों। विदेशी साम्राज्यवादियो ने अपनी दुर्नीति के चलते आर्य को विदेशी आक्रांता घोषित करके जो झगड़ा  खड़ा किया था उसका निर्मूलन करने में संत रविदास की सीख और साहित्य का काफी योगदान हो सकता है। 

योग्यतानुसार 'कर्म' और कर्मानुसार 'वर्ण' बनाए गए थे जो जन्म-जन्मांतर से जोड़ कर विकृत किए गए हैं मात्र आर्थिक -शोषण हेतु उनको पुनः अपने मूल स्वरूप कर्मानुसार वर्ण में परिवर्तित किया जाना ही  संत रविदास की शिक्षा को ग्रहण करना होगा। इसी से विद्वेष  मूलक 'जाति-व्यवस्था' को समाप्त किया जा सकेगा। आज फिर संत रविदास जैसे  सामाजिक आंदोलन को चलाये जाने की आवश्यकता है तभी श्रम की प्रतिष्ठा संभव हो सकेगी । और तभी मानव द्वारा मानव का शोषण समाप्त करके समाजवाद की दिशा में बढ़ा जा सकेगा। अन्यथा थोथे  नारों से समानता नहीं स्थापित की जा सकती। आर्थिक समानता हेतु जातीय असमानता का भी निर्मूलन करना ही होगा।   

 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त माथुर

Sunday, 9 February 2014

प्रेरणासपद एवं अनुकरणीय :मेरठ की बेटी रज़िया सुल्ताना

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 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त माथुर