Monday, 10 February 2020

एक निहायत शर्मनाक हादसा ------ रमाशंकर बाजपेयी

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Delhi के Gargi College में छेड़छाड़ का मामला Lok Sabha में उठा है. Congress सांसद गोरव गोगोई ने इसका जिक्र लोकसभा में किया है, गोगोई ने कहा है कि सरकार इसमें क्या कर रही है? शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने जवाब देते हुए कहा है कि बाहरी लोग कॉलेज में घुसे थे.थोड़ी देर पहले दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष स्वाति मालीवाल यहां पहुंची. राष्ट्रीय महिला आयोग ने भी मामले का संज्ञान लेते हुए कॉलेज में एक टीम भेजने की बात कही है.







 संकलन-विजय माथुर, 
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Saturday, 8 February 2020

हिन्दू महासभा और मुस्लिम लीग गठबन्धन विभाजन का जिम्मेदार ------ मनीष सिंह

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अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए नेहरू लियाकत पैक्ट हुआ था।  पैक्ट की पहली. लाइन में "इर्रिस्पेक्टिव ऑफ रेलीजियन" लिखा था। प्रंधानमंत्री जी ने अपने संसदीय भाषण CAA को उचित साबित करने के लिए इसी नेहरू-लियाकत पैक्ट को आधार बनाया। बीच का वो शब्द स्किप कर गए।


प्रधानमंत्री की स्पीच की तथ्यात्मक मिथ्यावाचन को टेलीग्राफ ने करीने से उजागर किया है। 
 बंगाल मंत्रिमंडल ,1941में हिन्दू महासभा के श्यामा प्रसाद मुखर्जी बंगाल की मुस्लिम लीग सरकार के वित्तमंत्री बने



Manish Singh
07-02-2020 
विभाजन का जिम्मेदार कौन... क्रोनोलॉजी समझिये। 
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👉विभाजन पर सहमति क्यो दी गयी-इसलिए कि दंगे नही रुक रहे थे.. 
👉दंगे क्यो नही रुक रहे थे- क्योकि पुलिस बैठे देख रही थी
👉पुलिस क्यो बैठे देख रही थी- क्योकि दंगाइयों की सरकार थी
👉 दंगाई सत्ता तक कैसे आये - गठबंधन बनाकर
👉 गठबन्धन किनका था- हिन्दू महासभा और मुस्लिम लीग का
👉 इनके लीडर कौन थे- सावरकर और जिन्ना
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1940 में मुस्लिम लीग पृथक पाकिस्तान का प्रस्ताव पास कर चुकी थी। 1941 में हिन्दू महासभा के श्यामा प्रसाद मुखर्जी बंगाल की मुस्लिम लीग सरकार के वित्तमंत्री बने।

सिंध की मुस्लिम लीग सरकार ने 1943 में पाकिस्तान बनने का रिजोल्यूशन पास किया। इस सरकार में हिन्दू महासभा के 3 मंत्री थे। प्रस्ताव के बाद भी मंत्रिमंडल में बने रहे।

कांग्रेस कहाँ थी??- विपक्ष में।

गांधी कहां थे??- विभाजन के खिलाफ जान देने की बात कर रहे थे। मौलाना अबुल कलाम आजाद को कांग्रेस का अध्यक्ष बना रहे थे। जिन्नाह को प्रधानमंत्री बनाने की वकालत कर रहे थे। महासभाइयों के लिए ये मुस्लिम तुष्टिकरण की पराकाष्ठा थी।

गांधी को मारने की कोशिशें तेज हो गयी। 
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1941 में बंगाल के मुख्यमंत्री फजलुल हक, 1950 के दशक में पाकिस्तान के गृहमंत्री हो गए। उनके मंत्रिमंडल के वित्त मंत्री श्यामा प्रसाद मुखर्जी भारतीय जनसंघ के फाउंडर प्रेजिडेंट हुए। 1946 आते आते जिन्ना को महासभा के टेक की जरूरत नही रही। महासभाई दूध से मक्खी की तरह निकाल फेंके गए। लीग ने अपने इलाकों में दंगे करवाकर उसे पाकिस्तान बनवा लिया।

तो श्यामा प्रसाद नेहरू मंत्रिमंडल में शामिल हो गए। 
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नीचे एक नक्शा है। खुद से पूछिए की जो इलाके कांग्रेस के थे, वो पाकिस्तान क्यों नही बने। जवाब मिल जाएगा।

नीचे फोटो में भारत का पहला टुकड़े टुकड़े गैंग भी है। फोटो बंगाल मंत्रिमंडल की है, जो केंद्र में खड़े जिन्ना के साथ हैं। शक्लों से नही, कपड़ों से नही, तो टोपियों से पहचान लीजिये। आपका इतिहास का जानकार न होना शर्मनाक नही।


मगर जानने के बाद भी ... ?? डूब मरो। 70 साल आपके बाप-दादे इनसे नफरत क्यो करते रहे, कभी सोचा ???

https://www.facebook.com/manish.janmitram/posts/2731672406917059









संकलन-विजय माथुर
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Sunday, 2 February 2020

इनका असल निशाना संविधान है ------ उर्मिलेश

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सन् 1948 की 30 जनवरी को सांप्रदायिक-फासीवादियों ने 'राष्ट्रपिता' पर निशाना साधा। तब से वे लंबे समय तक समाज और सियासत में हाशिए पर रहे! लेकिन पिछले कुछ वर्षों से वे बड़ी ताकत के साथ उभरे हैं। इस बार 30 जनवरी के शहादत-दिवस को फिर रक्तरंजित किया गया! यह एक असमाप्त सिलसिले का हिस्सा है! इनका असल निशाना संविधान है! 30 जनवरी की हालिया घटना पर वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश का विश्लेषण:


 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Saturday, 1 February 2020

कुणाल कामरा : प्रतिबंध और पायलट

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 संकलन-विजय माथुर

Monday, 27 January 2020

नागरिक कर्तव्य का दायित्व निर्वहन ------ वीरेंद्र यादव







Virendra Yadav 
26-01-2020 
आज गणतंत्र दिवस के अवसर पर लखनऊ के 'शाहीनबाग ' ऐतिहासिक घंटाघर पार्क में अभूतपूर्व जनसैलाब था। घंटाघर की चारों दिशाओं में तिरंगे ही तिरंगे, हवा में गूंजते नारे और आजादी के तराने। आंचल सचमुच परचम बन गए थे, जिनके बुर्के अभी नहीं उतर पाए हैं, उन्होंने भी नकाब उतार दी थी। कल गिरफ्तार हुई पूजा शुक्ला की रिहाई की मांग को लेकर आज कुछ नए नारे इस मुहिम में अब शामिल हो गए थे। लेकिन आज इस अपार जनसमूह को देखकर ऐसा लगा कि यह नई सिविल सोसाइटी है, जिसकी पहचान उन सौ पचास लोगों तक सीमित नहीं है, जो इस शहर के जलसा, जुलूस और सभाओं के जाने पहचाने चेहरे हैं। यह अवाम का नया अवतार है जो आजादी के आंदोलन की याद दिलाते हुए नागरिक अधिकारों की नई इबारत लिख रहा है।आज इप्टा के राष्ट्रीय महासचिव मित्र राकेश के साथ इस जनसैलाब के बीच से गुजरते और जायजा लेते हुए हम लोगों ने शिद्दत से य़ह अहसास किया कि यह नया नागरिक समाज अब पुराने नेतृत्त्व का मुखापेक्षी नहीं है। इस नए आंदोलन के साथ युवा नेतृत्त्व का नया सामूहिक चेहरा भी उभर रहा है। स्वीकार करना होगा कि इस मुहिम में दैश की बहुसंख्यक जमात अल्पमत में और अल्पसंख्यक जमात बहुमत में है। लेकिन यह पहली बार हुआ है कि अलपसंख्यक की बहुतायत के बावजूद इस मुहिम के नारे और मुहावरे मजहबी न होकर कौमी है। धार्मिक पहचान के नाम पर नमाज है तो हवन और अरदास भी। जेल सदफ गई तो पूजा भी, शोएब गए तो दारापुरी और दीपक भी।यह भी पहली बार है कि इस मुहिम में शामिल होने के लिए इस बार न किसी ने हमें कोई इत्तला दी और न ही कोई संदेश। हम खुद बखुद वहाँ जब तब जाते हैं और अपने नागरिक कर्तव्य का दायित्व निर्वहन कर बकौल राकेश अपनी अंतरात्मा के भार से मुक्त होते हैं। सचमुच यह भारतीय जनतंत्र का नया अवतार है। जो आंचल परचम बने हैं न वे फिर घूंघट बनेंगे और न जिन चेहरों ने नकाब से मुक्ति पाई है, अब न वे फिर पर्दानशीं होंगें। 

आमीन!

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 संकलन-विजय माथुर

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Saturday, 25 January 2020

वह सहिष्णु समाज वाले भारत को उग्र राष्ट्रवाद से भरा हिन्दू राष्ट्र बनाना चाहते हैं ------ दि इकोनामिस्ट

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 संकलन-विजय माथुर

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Friday, 24 January 2020

फ़ीरोज गांधी विदेशी पत्रकार की नजर से ------

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    संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Wednesday, 22 January 2020

हम कागज नही बनाएंगे - हम रजिस्ट्रेशन नही कराएंगे: "सत्याग्रह" ------ मनीष सिंह



Manish Singh
16 अगस्त 1908, जोहान्सबर्ग, जगह हमीदा मस्जिद के सामने का मैदान। भारतीय और एशियन समुदाय की भारी भीड़ गांधी के इशारे का इंतजार कर रही थी। गांधी टेलीग्राम पढ़ रहे थे, जो सरकार की ओर से आया था। लिखा था- काला कानून वापस नही लिया जाएगा।

गांधी ने आंदोलन दोबारा शुरू करने की घोषणा की। उस मैदान में हजारों लोगों ने उस मैदान में अपने  NRC सर्टिफिकेट जला दिए। पूरे दक्षिण अफ्रीका में भयंकर बवंडर खड़ा हो गया। दुनिया सत्याग्रह नाम के नए-नए ईजाद हथियार का इस्तेमाल देख रही थी।
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दरअसल 1906 में ट्रांसवाल की सरकार ने एक " ट्रांसवाल एशियाटिक ऑर्डिनेंस" जारी किया। हर भारतीय, अरब, चीनी और दूसरे काले एशियन्स को अपना रजिस्ट्रेशन करवाना होगा। रजिस्ट्रार के पास जाकर अपना शारीरिक परीक्षण करवाना होगा, अंगुलियों की छाप देनी होगी। एक सर्टिफीकेट लेना होगा, जो सदा साथ रखना होगा। न होने पर फाइन या जेल हो सकती थी। आबाल- वृद्ध , कोई भी अगर बगैर रजिस्ट्रेशन पेपर्स के मिले, उसकी उंगलियों की छाप मैच न करे, तो सीधे जेल, या डिपोर्ट किया जा सकता था।

पहले से ही रंगभेद झेल रहे एशियन समुदाय को, इस कानून से जीना मुश्किल होने के आसार थे। गांधी जो अब तक समुदाय के जाने पहचाने चेहरे हो चुके थे, आगे आये। जोहान्सबर्ग के एम्पायर थिएटर में सारे समुदायों के लीडर्स को इकट्ठा किया। तीन हजार की भीड़ को संबोधित करते गांधी ने इस कानून को "काला कानून" कहा।

उन्होंने कहा- "हम इस कानून को रिजेक्ट करते हैं। हमे मिलकर तय करना होगा कि हममें से कोई रजिस्ट्रेशन न कराए। मैं सबसे पहले अपना वचन देता हूँ। मैं अपना रजिस्ट्रेशन नही कराऊंगा"

एक बूढ़ा मुसलमान उठा। वो सेठ हबीब था। सबसे पहला था वो, जिसने गांधी के सामने शपथ उठाई- " हम कागज नहीं बनाएंगे"...।

ये गूंजता हुआ नारा हो गया। कानून का उल्लंघन, जेल, मारपीट, अपमान और दमन को सहना, लेकिन अड़े रहना, पीछे नही हटना। मजबूती से थमे रहना, अपना आग्रह मुस्कान के साथ बनाये रखना। हम कागज नही बनाएंगे। हम रजिस्ट्रेशन नही कराएंगे।

आंदोलन के इन तरीकों को शुरू में उन्होंने "पैसिव रेजिस्टेंस" कहा। मगर नाम कुछ जंच नही रहा था। उन्होंने साथियों से नाम सुझाने को कहा। एक साथी मगनलाल थे- उन्होंने कहा, " सदाग्रह!!

गांधी ने सुना , सोचा.. फिर एकाएक बोले - " सत्य के प्रति निर्भीक आग्रह.. यही !

"सत्याग्रह"

यह गांधी की दिशा बन गयी। गांधी का हथियार बन गया। वक्त वो था, आज भी वही है। सवा सौ साल से दुनिया का कोई हिस्सा हो, वक्त हो, देश हो..

सत्याग्रह को हर आततायी ख़ौफ़ से देखता है।


https://www.facebook.com/manish.janmitram/posts/2698406466910320

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रामचंद्र गुहा को डर का अहसास कराया जा चुका है...... कौशल सिंह / सर्वेश रंजन सिंह

Sarvesh Rajan Singh
10 mins

रामचंद्र गुहा को खोने को बहुत कुछ है.. लेकिन पाने को कुछ भी नहीं क्योकि जो पाना था वो पा लिया अब उसे खोये न, इसका डर का अहसास कराया जा चुका है......
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गाँधी नेहरू पटेल का अनुशरण करना आसान नहीं है . ये वो लोग है जिनको खोने का कोई डर नहीं था क्योकि जो पाए थे उसे वो खो दिए थे. और जो पाना था वो स्वप्न में था इसी ने उनको महान बनाया. ये लोग जब जब अंग्रेज़ो की सत्ता के द्वारा प्रताड़ित हुवे दुबारा मज़बूत और अति उत्साह के साथ आये क्योकि खोने को कुछ था नहीं और हर प्रताड़ना उन्हें उनके स्वप्न को नज़दीक ला देता की सत्ता अब डर रही है. उन लोगो का स्वप्न था भारत की आज़ादी। और ये कब प्राप्त होगी ये नही मालूम था।

रामचंद्र गुहा और रतन टाटा ने जो बयान दिया है उसके मेरे नज़र में दो मायने है. मुझे रतन टाटा के बयान से कोई दुःख नहीं हुवा है क्योकि बिजनेसमैन को सत्ता के साथ हमेशा खड़ा देखा है और न हो तो सत्ता उसे बर्बाद कर सकती है. अनिल अम्बानी इसके सबसे बेहतरीन उदहारण है. मुझे साफ़ साफ़ याद है की कैसे मायावती ने अनिल अम्बानी को बर्बाद कर दिया, अनिल अम्बानी को मुलायम सरकार में बहुत से ठेके मिले और इसके लिए अनिल अम्बानी ने एक समय भारत का सबसे बड़ा IPO लेकर आये थे , ऊर्जा के क्षेत्र में, उम्मीद उत्तर प्रदेश से थी. लेकिन सरकार बदली और मायावती ने उस सारे प्रोजेक्ट को थप किया और वही से अनिल अम्बानी की बर्बादी शुरू हुवी.

कुछ बिजनेसमैन व्यापारी नहीं बल्कि व्यापार करने के लिए आते है . और इनकी सोच केवल कुछ समय के लिए ही होता है और उस समय में जितना दोहन किया जाय उतना कर लेते है . वो केवल एक ही सरकार के पक्ष में होते है. जैसे रामदेव , इनका कोई लॉन्ग टर्म विज़न नहीं था . जनता को स्वदेशी के नाम पर चुना लगाना था, राष्ट्रवाद के नाम पर गाय का अमृत दूध से महँगी गाय का मूत्र बेचना था और ये तभी संभव है जब राष्ट्रवादी सरकार सामने हो और उसकी मदद से अपनी मंशा को प्राप्त किया जाय. ऐसे लोग एक ही सरकार के चट्टे बट्टे होते है. और ये पूरी तैयारी के साथ होते है की दूसरी सत्ता आएगी तो इनको बंद करेगी तो क्यों न अपनी पसंद की सत्ता में ज्यादा से ज्यादा फायदा लेकर भागा जाय.

लेकिन उद्योगपति ऐसे नहीं होते . उन्हें लोग टर्म विज़न के साथ काम करना होता है . और उस लॉन्ग टर्म में कई सरकार आती है तो उन्हें खुद को सरकारों के साथ बैलेंस होकर चलना होता है . रतन टाटा का ब्यान इसी श्रेणी में आता है . अंदर से उन्हें भी पता है की ये देश आर्थिक, सामाजिक,वैज्ञानिक और वैचारिक रूप से बर्बाद हो रहा है और इसका कारण मोदी और शाह और संघ का विज़न है लेकिन सायरस मिस्त्री के कारण उन्हें ये बयान देना पड़ रहा है . जिसके लिए माफ़ है क्योकि रतन टाटा का देश के लिए योगदान सराहनीय है.

लेकिन रामचंद्र गुहा आप तो सत्ता की पहली प्रताड़ना में ही जमीं पर आ गए . और ऐसे लोग ही फासिस्ट सत्ता को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती है की सबको अपनी आभा में लाया जा सकता है . चाहे किसी भी निति को अपनाना पड़े . साम दाम दंड भेद निति ही क्यों न हो.

CAA विरोध में जेल जाने के बाद उनके सुर बदले बदले हुवे है. और केरल में जो बयान दिया वो उनकी उसी वैचारिक पतन की ओर इशारा करता है. वो भूल गए की दुनिया की हर पार्टी पर किसी न किसी परिवार का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष छत्रछाया रहती है . BJP संघ परिवार के हिस्सा है. दुनिया में क्रान्ति या बदलाव पार्टी संगठन या संघ नहीं लाती बल्कि दुनिया में जितने भी बदलाव हुवे है उसके पीछे किसी व्यक्ति के विचारो से जुड़े हुवे लोगो के कारण हुवा है. NAZI का अस्तित्व हिटलर से है . ROMAN EMPIRE का अस्तित्व जूलियस सीजर से था. जीसस , बुद्ध , नानक ये सारे व्यक्ति थे न की संगठन. रूस की क्रांति के पीछे लेनिन था.

अमेरिका में BUSH FAMILY सबसे बड़ी राजनितिक परिवार है . आज भी 50 प्रतिशत से ज्यादा अमेरिका के राज्यों में BUSH FAMILY का ही शासन है.

और रामचंद्र गुहा जी कांग्रेस की विरासत नेहरू तक थी . नेहरू के बाद कांग्रेस का कोई राजवंश पुत्र प्रधानमंत्री नहीं बना . नेहरू के बाद सत्ता लाल बहादुर शास्त्री को मिली न की उसकी बेटी इंदिरा गाँधी को . और इंदिरा गाँधी को नेहरू वाली कांग्रेस ने निकाल फेका था और इंदिरा ने नयी पार्टी उसी तर्ज पर बनायीं जैसे NCP या TMC है. इस पार्टी ने इंदिरा के छोड़कर केवल राजीव को गद्दी विरासत में दिया वो भी इसीलिए क्योकि इंदिरा की हत्या हो गयी थी. इंदिरा के जीवित रहते तो राजीव भी राजनीती से दूर ही रहे. उनका कोई राजनितिक वजूद नहीं था. जनता भावनात्मक होती है . अखिलेश हो या उद्धव ठाकरे या जगनमोहन रेड्डी ये सारे लोगो को भावनात्मक रूप से सत्ता विरासत में लिया है . लेकिन उसके बाद इस पार्टी ने नरसिंहराव और मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री दिए जो गाँधी परिवार से हटकर था. अब ये न कह देना की मनमोहन तो सोनिया का पपेट था . तो मनमोहन पार्टी नहीं थे जिन्हें जनता के बीच में जाकर वोट माँगना था. याद रखिये प्रधानमंत्री पद देश से पहले जीती हुवी पार्टी के मैनिफैस्टो को पूरा करने के लिए होता है. क्योकि संसदीय लोकतंत्र में जनता नेता नहीं पार्टी को चुनती है .तो पार्टी अध्यक्ष को कण्ट्रोल करना होता है . देखा नहीं आज मोदी प्रधानमंत्री है . अमित शाह गृहमंत्री होकर भी BJP का अध्यक्ष पद त्याग नहीं रहा क्योकि पार्टी हाथ से निकल न जाय.

इस देश के लोग बलात्कारी को लोकसभा में चुनते है . वो दिक्कत आपको नहीं थी . दिल्ली में ही लोगो ने जिन 7 MP को चुना है उनका क्या राजनितिक क्रेडेंशियल है . हंस राज हंस को ही ले लीजिये . इस देश ने आतंकी प्रज्ञा ठाकुर को चुना है. ये सब आपको विनाशकारी नहीं लगा लेकिन केरल से राहुल गाँधी का चुना जाना विनाशकारी है.

फिर भी मैं यकीन के साथ कह रहा हु की आपका बयान जो आपने केरल में दिया है वो एक फासीवादी ताकतों के सामने झुकाव की ओर इंगित करता है. और ये तभी हो सकता है जब आपको खोने को बहुत कुछ है . क्योकि इस सत्ता में जिस तरह से देश की बर्बादी की गाथा हर क्षेत्र में चाहे वो सामजिक ,आर्थिक ,वैज्ञानिक और वैचारिक में हो रही है, लोगो को पाने की कोई उम्मीद नहीं है. और लोग अब जो उनके पास है उसे खोने से बचाने के लिए झुक रहे है .

आपने शायद सबसे ज्यादा ऑस्कर जीती हुवी फिल्म SCHINDLER LIST नहीं देखी. मैं कहता हु देखिये और खुद को SCHINDLER के स्थान पर पाते है तो आपको ये देश माफ़ कर देगा . क्योकि SCHINDLER ने अपने अंतिम भाषण में यही कहा था की वो यहूदियों को हिटलर के कहर से बचा रहे थे लेकिन फिर भी जब SS सेना का अफसर उनके सामने यहूदी बच्चे और महिला को अपने क्रीड़ा के रूप में गोली मारकर हत्या कर देता तो वो भी उस SHOT पर ताली बजाते क्योकि ऐसा न करने पर और उनके मौत पर दुःख जताने पर आपको हिटलर विरोधी घोसित किया जा सकता था. लेकिन वो अकेले में उनकी पीड़ा में कराहते थे.

समझे रामचंद्र गुहा, गाँधी, नेहरू उस आज़ादी के लिए लड़ रहे थे जो केवल उनके स्वप्न में था . क्या उन्हें पता था की दुनिया पर राज करने वाली सत्ता 1947 में आज़ाद कर देगी भारत को . लेकिन वो प्रताड़ित होते और जेल जाते और निकलकर अपने उस स्वप्न के लिए फिर उससे दुगुनी उत्साह से खड़े हो जाते.
कौशल सिंह ...

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