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Tuesday, 3 May 2016

चरण स्पर्श : पैर छूना --- राजनीति और विज्ञान ------ विजय राजबली माथुर

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राजनीति  : 

जब लालू प्रसाद बिहार के मुख्यमंत्री थे तब उन्होने पैर छूने  - चरण स्पर्श  की परंपरा का विरोध किया था  लेकिन अब जे एन यू  छात्र संघ  के अध्यक्ष  कन्हैया कुमार द्वारा उनके पैर छू  कर आशीर्वाद  लेने पर कन्हैया की आर एस एस व  कारपोरेट समर्थक  वामपंथियों  द्वारा कड़ी आलोचना की जा रही है। विभिन्न विद्वानों के मत  संकलित कर प्रस्तुत किए गए हैं। व्यक्तिगत रूप से  राजनीति में पैर छूने या चरण स्पर्श की प्रक्रिया का मैं  समर्थन नहीं करता लेकिन मैंने यह भी देखा है कि, भाकपा, यू पी  के प्रदेश कार्यालय में बैठ कर  पार्टी के सीताराम केसरी बने  कोषाध्यक्ष  ब्राह्मण कामरेड  AISF व AIYF के नेता रहे  ब्राह्मण व  यादव युवाओं से  अपनी कुर्सी पर बैठे-बैठे  पैर छुवाते - चरण स्पर्श  करवाते हैं। तब कामरेडशिप  आड़े नहीं आती है क्योंकि वह ब्राह्मण कामरेड हैं । लालू जी के चरण स्पर्श पर समस्या इसलिए है कि वह ब्राह्मण नहीं हैं। यह भेदभाव ही तो 
' ब्राह्मण वाद ' है। 

विज्ञान  : 

हाथ और पैरों में अंगूठा समेत दस- दस उँगलियाँ होती हैं  । इनमें   पैर की उँगलियों के नाखूनों द्वारा  'ऊर्जा'  बाहर  निकलती है जबकि  हाथ की उँगलियों के नाखूनों द्वारा  'ऊर्जा' ग्रहण  की जाती है। पैर छूने  अथवा चरण स्पर्श  का विज्ञान यह है कि यदि किसी विद्वान के चरण हाथ द्वारा स्पर्श किए जाएँ तो ज्ञान का अंश हाथों द्वारा  प्राप्त किया जाता है। इसी लिए सबके चरण स्पर्श का विधान भी नहीं था। आजकल उस लायक कोई विद्वान भी नहीं है। 

चरण स्पर्श की भी वैज्ञानिक विधि यह है  कि, चरण स्पर्श करने वाला ज्ञान पिपासू अपने दाहिने हाथ के नाखून विद्वान के दाहिने पैर के नाखूनों पर इस प्रकार रखे कि अंगूठा  अंगूठे पर तर्जनी तर्जनी पर , मध्यमा  मध्यमा पर , अनामिका अनामिका पर और कनिष्ठा कनिष्ठा पर रहे। इसी प्रकार बायाँ हाथ  बाएँ  पैर पर रहे। अर्थात हथेली को उलट कर  X  चरण स्पर्श करना होता है। तभी  विद्वान के पैरों के पर्वतों से निकालने वाली ज्ञान रश्मियेँ   इच्छुक जिज्ञासु  के हाथों द्वारा उसके शरीर में प्रविष्ट होती है। 

आज व्यवहार में पैर छूने  चरण स्पर्श  की जो प्रक्रिया है वह मात्र दिखावा भर है कि किसी बड़े को सम्मान दिया गया है। बड़े को सम्मान देना कोई गुनाह नहीं है अतः कन्हैया की आलोचना सिर्फ उनकी लोकप्रियता की प्रतिक्रिया में उत्पन्न  खिसियाहट भर है। 
संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

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03-05-2016 
05-05-2016 
05-05-2016 

Wednesday, 16 March 2016

जेएनयू और कन्हैया कुमार ने एक मिसाल पेश की है ------ ईशा भाटिया


एक घंटे के लंबे भाषण में हर मिनट कन्हैया ने सुनने वालों को बांधे रखा. भाषण की शुरुआत में ही वह रौंगटे खड़े करने वाला माहौल बना चुके थे. सरकारी नीतियों के विरोध को कन्हैया ने जिस तरह आवाज दी वह काम दरअसल विपक्ष का है लेकिन पिछले दो सालों में विपक्ष को कभी भी इस भूमिका में नहीं देखा गया है.


सांसदों के लिए मिसाल कन्हैया का भाषण

कन्हैया कुमार के भाषण की बढ़ चढ़ कर तारीफ हो रही है. ईशा भाटिया का सवाल है कि जो कन्हैया ने किया, क्या वह दरअसल विपक्ष का काम नहीं था.
कन्हैया कुमार और कुछ करने में सफल रहे हों या नहीं लेकिन भाषण कला का बेहतरीन उदाहरण देने में पूरी तरह कामयाब रहे. एक घंटे के लंबे भाषण में हर मिनट कन्हैया ने सुनने वालों को बांधे रखा. भाषण की शुरुआत में ही वह रौंगटे खड़े करने वाला माहौल बना चुके थे. सरकारी नीतियों के विरोध को कन्हैया ने जिस तरह आवाज दी वह काम दरअसल विपक्ष का है लेकिन पिछले दो सालों में विपक्ष को कभी भी इस भूमिका में नहीं देखा गया है.
ऐसा नहीं है कि कांग्रेस के पास अच्छे वक्ता नहीं हैं लेकिन कांग्रेस का हाल उस क्रिकेट टीम जैसा है जो अपने सबसे कमजोर बल्लेबाजों को सबसे पहले फील्ड में भेजती है. अब धीरे धीरे लगता है कि राहुल गांधी ने बल्ला पकड़ना सीख लिया है. लेकिन जब तक वे बैटिंग करना शुरू करेंगे, जनता तो स्टेडियम खाली कर चुकी होगी. शुरुआत करते करते उन्होंने इतनी देर कर दी कि अब वे संजीदगी से भी कुछ कहें, तब भी लोगों को मजाक ही लगता है.
Isha Bhatia
(ईशा भाटिया )
खैर, राहुल गांधी से ज्यादा कन्हैया का भाषण स्मृति ईरानी के लिए जरूरी है. गुस्से में आग बबूली ईरानी ने संसद में जिस अंदाज में भाषण दिया था वह भाषण कम डांट फटकार और गुंडागर्दी ज्यादा लग रहा था. कन्हैया ने दिखाया कि कैसे आप मुस्कुराते हुए, बिना अपना आपा खोए, बिना किसी व्यक्ति विशेष का नाम लिए, मुद्दों और विचारधाराओं पर बात कर सकते हैं.
अपना मत रखने के लिए ना ही आपको किसी की ओर उंगली उठाने की जरूरत पड़ती है, ना ही आंखों में रोष लाने की. क्या संसद में विवाद का अवसर इसी मकसद से नहीं दिया जाता कि दोनों पक्ष लोकतांत्रिक तरीके से अपना अपना मत रखें और उस पर जनहित में विमर्श करें? लेकिन हमारे सांसद ना तो भाषण देने में निपुण हैं और ना ही उन्हें सुनने में सक्षम. संसद में तर्कसाध्य बहस ना हो सके, इस कोशिश में वे कोई कसर नहीं छोड़ते. फिर भले ही उसके लिए स्पीकर की मेज के सामने आ कर चिल्लाना ही क्यों ना पड़े, जोर जोर से अपनी मेज पीटनी पड़े या जरूरत रहते कुर्सियां उठा कर फेंकनी पड़े. संसद का हाल अक्सर उस क्लासरूम जैसा दिखता है जिसमें टीचर है नहीं और बच्चों की पढ़ाई में कोई रुचि नहीं.
एक सभ्य नागरिक समाज वाद विवाद से ही आगे बढ़ता है. जेएनयू और कन्हैया कुमार ने हमारे सांसदों, मंत्रियों और युवाओं के लिए एक मिसाल पेश की है. रात के अंधेरे में कैंपस का माहौल विद्रोह से भरा लेकिन संजीदा था.
स्टूडेंट एकजुट थे, साथ मिल कर आजादी के नारे लगा रहे थे. इस नजारे ने कुछ कुछ 1968 के फ्रांस की याद भी दिलाई. लेकिन बहुत बड़ा फर्क भी था क्योंकि ये संगठित छात्र पूरे देश के नहीं, बल्कि केवल एक छोटी सी यूनिवर्सिटी के थे. हां, कैमरे के फ्रेम में 7,000 या 70,000 में फर्क करना आसान नहीं होता.
बहरहाल कैंपस में परिवर्तन के नारे गूंज रहे हैं पर कैंपस के बाहर की दुनिया का सच अलग ही है. कन्हैया ने सीधी सरल भाषा का इस्तेमाल करते हुए आम नागरिकों को अपनी बात समझाने की कोशिश की है. युवा वर्ग में बदलाव और बेहतर भविष्य की ललक है. उसे आवाज देने की जरूरत है और अगर बदलाव लाना है तो इस कोशिश को जारी रखना होगा, देश के बाकी युवाओं को भी साथ लेना होगा, सरकार के खिलाफ और देश के खिलाफ बोलने के फर्क को और भी आसान शब्दों में समझाना होगा.
सरकार और राजनीतिक दलों को भी समझना होगा कि लोकतंत्र विचारों की प्रतिस्पर्धा है, राष्ट्र और उसके नागरिकों की बेहतरी के लिए अच्छे विचारों की प्रतिस्पर्धा. उसे रोकने की कोशिश लोकतंत्र से द्रोह होगा.
ब्लॉग: ईशा भाटिया


साभार :

http://www.dw.com/hi/%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%B8%E0%A4%A6%E0%A5%8B%E0%A4%82-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%8F-%E0%A4%AE%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B2-%E0%A4%95%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%B9%E0%A5%88%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B7%E0%A4%A3/a-19093780?maca=hi-Facebook-sharing

Friday, 11 March 2016

जेएनयू के कन्हैया कुमार, खालिद उम्र और अन्य देश के होनहार और क्षमता स्वस्थ छात्र हैं : अशोक कुमारगांगुली,पूर्व न्यायाधीश

***** अंग्रेजों ने गांधी, नेहरू और मौलाना आजाद जैसे लोगों के खिलाफ देशद्रोह का मामला दर्ज किया था मगर कॉलेजों और विश्वविद्यालय के छात्रों के खिलाफ कभी भी इस अधिनियम को लागू नहीं किया गया मगर नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार देश के शैक्षिक संस्थानों में एक विशेष सिद्धांत और चिंता को थोपने के लिए इस बदनाम ज़माने के अधिनियम का उपयोग कर रही है। उन्होंने कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण प्रक्रिया है और देश विभाजन की ओर बढ़ रहा है।*****

मौजूदा मोदी सरकार अंग्रेजी उपनिवेशवादियों से भी बदतर है : पूर्व न्यायाधीश अशोक कुमारगांगुली

कोलकाता: जेएनयू के छात्र कन्हैया कुमार, खालिद उम्र और अन्य लोगों के खिलाफ देशद्रोह का आरोप आयद किए जाने का कड़ा विरोध करते हुए सुप्रीम कोर्ट के पूर्व और पश्चिम बंगाल मानवाधिकार आयोग के पूर्व अध्यक्ष न्यायमूर्ति अशोक कुमार गांगुली ने कहा कि इंडियन पैनल कोड में 124 ए में जो धारा शामिल है वह अंग्रेजी सम्राज्य की देन है जो स्वतंत्रता सेनानियों के खिलाफ इस्तेमाल की जाती थी।

मगर कांग्रेस के इन्तहा पसंद विचारधारा से संबंधित लोगों के दबाव के कारण यह कोड भारत की आजादी के बाद भी हमारे संविधान और कानून का हिस्सा रह गया। पूर्व न्यायाधीश अशोक कुमार गांगुली ने इंडियन पैनल कोड के 124-A में संशोधन की वकालत करते हुए कहा कि इस बार राजनीतिक हितों के अधिग्रहण के लिए इस्तेमाल हो रहा है।

उन्होंने कहा कि जेएनयू के जिन छात्रों विशेषकर कन्हैया कुमार, खालिद उम्र व अन्य के खिलाफ देशद्रोह का मामला दर्ज किया गया है वह देश के होनहार और क्षमता स्वस्थ छात्र हैं।

उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय शिक्षा की जगह होती है जहां चिंता और विचार, बहस और वैज्ञानिक जांच होते रहे हैं। विद्यालय में अगर बहस और विचार का माहौल खत्म कर दिया जाएगा तो छात्रों में रचनात्मकता समाप्त हो जाएगी।

कोलकाता प्रेस क्लब में आयोजित ” फार्म फॉर डेमोक्रेसी एंड कम्युनल अमीटी ” द्वारा आयोजित संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए न्यायमूर्ति गांगुली ने मौजूदा भाजपा सरकार को अंग्रेजी उपनिवेशवादियों से भी बदतर करार दिया और कहा कि अंग्रेजों ने गांधी, नेहरू और मौलाना आजाद जैसे लोगों के खिलाफ देशद्रोह का मामला दर्ज किया था मगर कॉलेजों और विश्वविद्यालय के छात्रों के खिलाफ कभी भी इस अधिनियम को लागू नहीं किया गया मगर नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार देश के शैक्षिक संस्थानों में एक विशेष सिद्धांत और चिंता को थोपने के लिए इस बदनाम ज़माने के अधिनियम का उपयोग कर रही है। उन्होंने कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण प्रक्रिया है और देश विभाजन की ओर बढ़ रहा है।

http://sadaebharat.com/2016/03/07/the-current-government-is-worse-than-the-english-colonists-former-justice-ashok-kumarganguli/

Sunday, 6 March 2016

जे एन यू विवाद सरकार का रचा षड्यंत्र था ------ जयंती घोष

जेएनयू की एक प्रोफेसर ने आरोप लगाया है कि संसद हमले के दोषी अफजल गुरू की फांसी को लेकर जेएनयू में उस कार्यक्रम आयोजन पर विवाद विश्वविद्यालय को बदनाम करने का सरकार का रचा षड्यंत्र था जिस दौरान कथित तौर पर देश विरोधी नारेबाजी हुई थी। उन्होंने कहा कि सरकार विशेष तौर पर विश्वविद्यालयों को निशाना बना रही है क्योंकि उसे छात्रों से भय है जो सोच सकते हैं और विश्लेषण कर सकते हैं। जेएनयू प्रोफेसर और जानी-मानी अर्थशास्त्री जयंती घोष ने ‘एनडीए की देश विरोधी नीतियां’ विषय पर एक व्याख्यान के दौरान छात्रों को संबोधित करते हुए कहा, ‘वह विश्वविद्यालय को बदनाम करने के लिए रचा गया षड्यंत्र था और इसकी योजना एक उच्च स्तर पर बनाई गई थी। कार्यक्रम के दौरान जो लोग मौजूद थे उनमें तीन नकाबपोश लोग थे जिन्होंने ‘देश विरोधी’ नारेबाजी की और ये परोक्ष रूप से गुप्तचर ब्यूरो से थे। हमारा यही संदेह है।’ यह व्याख्यान उस जेएनयू में आयोजित होने वाले ‘राष्ट्रवादी अध्यापन’ का हिस्सा है जो कि 9 फरवरी के कार्यक्रम को लेकर विवादों में है। कक्षाओं का आयोजन विश्वविद्यालय के प्रशासनिक ब्लॉक में हो रहा है जो कि विवादास्पद कार्यक्रम को लेकर छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार की राजद्रोह के मामले में गिरफ्तारी के बाद विरोध प्रदर्शन का स्थल रहा है। घोष ने कहा, ‘हमारा यही संदेह है। हम उससे अधिक महत्वपूर्ण है जितना कि हम मानते हैं- हम वास्तव में निशाने पर हैं। इसी कारण से हमें स्वयं का बचाव करना होगा।’
जेएनयू प्रोफेसर और जानी-मानी अर्थशास्त्री जयंती घोष

http://www.jansatta.com/national/afzal-guru-row-constructed-conspiracy-by-state-jnu-professor/74385/

Saturday, 5 March 2016

कन्हैया कुमार के विचार : जन-अभिव्यक्ति ------ विजय राजबली माथुर

कन्हैया कुमार ने जो राह दिखा दी है उसको अपना कर ,उसको मान-सम्मान के साथ अनुकरण में लाकर जनता को अपने साथ जोड़ने का कार्य वामपंथ को अविलंब करना चाहिए। उसके विचार जन-अभिव्यक्ति हैं तभी तो अब मीडिया भी उनको स्थान देने लगा है। 
(विजय राजबली माथुर )
कन्‍हैया के भाषण में सबक लेने लायक कोई बात थी तो वह वामपंथियों के लिए ही थी। उन्‍होंने कहा, ‘जेएनयू में हम सभी को सेल्फ क्रिटिसिज्‍म की जरूरत है क्योंकि हम जिस तरह से यहां बात करते हैं वो बात आम जनता को समझ में नहीं आती है। हमें इस पर सोचना चाहिए।’ देश में वामपंथ राजनीति सालों से इस समस्‍या से जूझ रही है। वह जनता के हितों की बात करती है, फिर भी जनता उनकी सुनती नहीं है। कन्हैया ने अपने जेल के अनुभव गिनाते हुए संकेत दिया कि वामपंथियों को दलितों को साथ लेकर चलना होगा। वामपंथी पार्टियां इस पर सोच सकती हैं।



नई दिल्‍ली: देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार होने के बाद कल (गुरुवार को) जमानत पर रिहा होकर जेएनयू वापस लौटे जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार ने NDTV से खास बातचीत में कहा कि '9 फरवरी का कार्यक्रम मैंने आयोजित नहीं किया था। देश‍विरोधी नारे लगे या नहीं लगे, इसके बारे में मुझे कुछ नहीं पता, क्योंकि मैं वहां मौजूद नहीं था।'

कन्हैया द्वारा कही गई मुख्‍य बातें...
मेरी उस कार्यक्रम के प्रति परोक्ष रूप से कोई सहमति नहीं थी। मुझे उस कार्यक्रम की सूचना नहीं दी गई थी। कार्यक्रम की इजाजत देना मेरा काम नहीं है।
चार-पांच लोग वहां नारे लगा रहे थे। नारे लगाना गलत है। नारे लगाने वालों पर कार्रवाई होनी चाहिए।
पुलिस कहती है कि मेरी रज़ामंदी से कार्यक्रम हुआ, इसलिए गिरफ़्तार किया।
पहले से इस तरह की गतिविधियां होती आ रही है। उस कार्यक्रम को रोकना मेरे अधिकार से बाहर था।
अध्यक्ष होने के नाते मैं छात्रों की नुमाइंदगी करता हूं। छात्रों की बात करना मेरा काम, कार्यक्रम की इजाज़त देना नहीं।
कुछ छात्रों को निशाना बनाने की कोशिश हो रही है।
जो नारे लगाए गए, मैं उसकी निंदा करता हूं। ये सिर्फ़ नारे का मामला नहीं है, उससे ज़्यादा गंभीर है। नारों से लोगों का पेट नहीं भरता।
देश के सिस्‍टम पर मेरा भरोसा है।
मामला कोर्ट में है, इसलिए मैं ज्‍यादा बोल नहीं सकता।
हमारा देश इतना कमजोर है, जो नारों से हिल जाएगा?
हैदराबाद की कहानी जेएनयू में दोहराने की कोशिश हुई।
जेएनयू में दक्षिणपंथी ताकतें अलग-थलग हैं।
हर मामले को हिंदू-मुसलमान रंग दिया जाता है।
हम अफजल गुरु पर कोर्ट के आदेशों का सम्‍मान करते हैं।
मेरा भाई सीआरपीएफ में था, जो नक्‍सली हमले में मारा गया।
किसी को नक्‍सली बताकर गलत तरीके से मारने का भी समर्थन नहीं करता।
ये लड़ाई देश के खिलाफ नहीं, बल्कि सरकार के खिलाफ है।
जेएनयू के छात्रों को देशद्रोही बताया जा रहा है।
पिछड़े लोगों को निशाना बनाया जा रहा है।
पटियाला हाउस कोर्ट में जो मैंने देखा वो ख़तरनाक परंपरा है।
हाथ में झंडा लेकर संविधान की धज्जियां उड़ा रहे थे।
देशद्रोह का क़ानून अंग्रेज़ों के ज़माने का है।
भगत सिंह देश के लिए लड़ रहे थे। भगत सिंह को अंग्रेज़ देशद्रोही मानते थे।
सरकार आपके पास के थाने से लेकर संसद तक है।
विचारधारा को रणनीतिक रूप नहीं देने से वो ख़त्म हो जाती है।
केजरीवाल, राहुल गांधी को देश से प्यार है तो आंदोलन करना होगा।
भगत सिंह और गांधी जैसे सुधारक हुए। ये वो लोग थे जो साम्राज्यवाद से लड़े।
दक्षिणपंथी मुद्दों पर फ़ोकस करतें है, विचारधारा पर नहीं।
जब तक आप डरेंगे नहीं तो लड़ेंगे नहीं।
मुझे आरएसएस से डर लगा इसलिए उसके ख़िलाफ़ लड़ा।
अब पुलिस से दोस्ती हो गई है।
मैं आगे चलकर शिक्षक ही बनूंगा।
मैं मुद्दों पर बहस करूंगा, अपनी विचारधारा के लिए लडूंगा।
मैं अपने अनुभवों पर किताब लिखना चाहता हूं।
मामला कोर्ट में है, अभी फ़र्ज़ी राष्ट्रवाद पर बहस न हो।
जब आरएसएस में वैचारिक बदलाव हो रहा है तो कांग्रेस, लेफ़्ट में भी होगा। हमें इस बदलाव को बारीकी से देखने की ज़रूरत है। तभी हम लेफ़्ट, बीजेपी, कांग्रेस, केजरीवाल में फ़र्क कर पाएंगे
सबको एक ब्रश से मत रंगिए।
http://khabar.ndtv.com/news/india/exclusive-kanhaiya-kumar-interview-by-ravish-kumar-1283995?site=full
स्पष्ट रूप से पढ़ने के लिए इमेज पर डबल क्लिक करें (आप उसके बाद भी एक बार और क्लिक द्वारा ज़ूम करके पढ़ सकते हैं )
05-03-2016 

http://epaper.telegraphindia.com/details/173713-175741306.html

नीतीश कुमार ::
युवाओं के आगे आने से देश में लोकतंत्र मजबूत होगा। देश में पनप रहे अंसतोष को दबाने के लिए देशभक्ति का नारा छेड़ा है। उनको और कम्युनिस्ट पार्टी को शुभकामना देता हूं, ऐसे विचारों को बल मिलेगा।

http://www.livegaya.com/…/in…/id/3118/kanhaiya-nitish-kumar… 


भाषण में क्‍या था:  
कन्‍हैया के भाषण में सबक लेने लायक कोई बात थी तो वह वामपंथियों के लिए ही थी। उन्‍होंने कहा, ‘जेएनयू में हम सभी को सेल्फ क्रिटिसिज्‍म की जरूरत है क्योंकि हम जिस तरह से यहां बात करते हैं वो बात आम जनता को समझ में नहीं आती है। हमें इस पर सोचना चाहिए।’ देश में वामपंथ राजनीति सालों से इस समस्‍या से जूझ रही है। वह जनता के हितों की बात करती है, फिर भी जनता उनकी सुनती नहीं है। कन्हैया ने अपने जेल के अनुभव गिनाते हुए संकेत दिया कि वामपंथियों को दलितों को साथ लेकर चलना होगा। वामपंथी पार्टियां इस पर सोच सकती हैं।   

http://www.jansatta.com/national/why-jnusu-president-kanhaiya-kumar-not-a-hero/73955/?utm_source=JansattaHP&utm_medium=referral&utm_campaign=jaroorpadhe_story

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05-03-2016