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Monday, 20 November 2017

जन - विरोधी सरकार के तानाशाही की ओर बढ़ते कदम ------ उर्मिलेश

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  संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Monday, 15 February 2016

यह तो ग्रह मंत्री की ही चूक मानी जाएगी ------ श्रीराम तिवारी



Shriram Tiwari यदि जे एनयू में पाकिस्तानी एजेंट घुसे आयें हों तो यह तो ग्रह मंत्री की ही चूक मानी जाएगी !

केंद्रीय मंत्रिमंडल के सभी मंत्रियों में संभवतः सबसे ज्यादा अनुभवी - कुशल प्रशासक एक मात्र 'सहिष्णु' - धर्मनिरपेक्षतावादी एवं राजनीति के जमीनी नेता श्री राजनाथसिंह जी की बौद्धिक क्षमता का उनके विरोधी भी सम्मान करते हैं। किन्तु इतने प्रखर विद्वान व वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री को अपनी कही हुई किसी बात में वजन लाने के लिए या कथन को सत्य सिद्ध करने के लिए पाकिस्तान में छिपे बैठे किसी भारत विरोधी आतंकी हाफिज सईद की गवाही की दरकार क्यों आन पडी ? हमारे लिए तो देश के गृहमंत्री का वयान ही काफी है। यदि जेएनयू की घटना में कोई दोषी है तो कानूनी कार्यवाही होनी चाहिए ! राजनाथ जी को किसी भारत विरोधी आतंकी की आग लगाऊ वयानबाजी का सहारा नहीं लेना चाहिए। बल्कि उन्हें इस समस्या के निदान बाबत सर्वदलीय बैठक बुलानी चाहिये !

ग्रह मंत्री जी को हमेशा स्मरण रखना चाहिए कि जब पाकिस्तानी आतंकी भारत के सबसे सुरक्षित पठानकोट एयरबेस में घुस सकते हैं , जब वे मुंबई के ताज होटल में घुस सकते हैं, जब वे संसद में घुस सकते हैं ,तो जेएनयू में क्यों नहीं घुस सकते ? जेएनयू के कुछ उत्साही छात्रों ने कोई प्रोग्राम रखा और यदि जे एनयू में पाकिस्तानी एजेंट घुसे आयें हों तो यह तो ग्रह मंत्री की ही चूक मानी जाएगी ! यह भी समभव है कि किसी दक्षिणपंथी छात्र संगठन के बदमास शोहदे उस कार्यक्रम में पाकिस्तानी झंडा लहराने घुसे हों ! सिर्फ मीडिया के हो हल्ले या और 'माऊथ पब्लिशिटी 'के आधार पर उस कार्यक्रम के आयोजकों कोगिरफ्तार करना उचित नहीं है । हम सभी भारतीय जानते हैं कि जम्मू- कश्मीर में अभी-अभी तक भाजपा समर्थित पीडीएफ की मुफ्ती सरकार रही है । इस दौर में अनेक बार श्रीनगर-लाल चौक और कश्मीर में पाकिस्तानी झंडे लहराए गए। पाकिस्तान -जिन्दावाद के नारे भी लगाये गए। तो उन घटनाओं को देशद्रोही क्यों नहीं माना गया। और यदि माना गया है तो अब तक किस -किस पर कार्यवाही की गयी ? यदि कोई कार्यवाही नहीं की गयी तो क्यों न पूरी भाजपा सरकार और संघ परिवार को ही देशद्रोही मान लिया जाए ?

मुफ्ती सरकार को समर्थन देने वाले और उसमें शामिल भाजपाई मंत्रियों की इन देशद्रोही घटनाओं में क्या जिम्मेदारी थी ? उनसे त्यागपत्र क्यों नहीं लिया गया ? केंद्र की मोदी सरकार ने उस राज्य सरकार को बर्खास्त क्यों नहीं किया ? यदि बर्खास्त करने की ताकत नहीं थी तो कम -से -कम वहाँ राष्ट्रपति शासन ही लगाकर दिखाते ! जेएनयू के उस कार्यक्रम का जो वीडीओ सामने आया है उसमें तो एबी वी पी के विद्यार्थी चिन्हित किये गए हैं। और 'सनातन सभा ' वाले तो आरएसएस का खुलकर नाम ले रहे हैं। अब राजनाथ सिंह जी और भाजपा के प्रवक्ताओं ने अपनों को बचने के लिए और गढ़े हुए झूंठ को सच सावित करने के लिए हाफिज सईद के उस वयान का सहारा लिया है जिसमें वह 'गन्दा आदमी'जेएनयू के छात्रों के समर्थन की बात कर रहा है। क्या 'संघ परिवार' के इतने बुरे दिन आ गए कि अपनी ही न्याय पालिका का भरोसा नहीं रहा और पाकिस्तानी आतंकियों के वयानों से अपनी राजनैतिक खेती करने में जुटे हैं। इतनी गंदी राजनीति तो कांग्रेस ने भी नहीं की होगी। केंद्र सरकार और संघ परिवार ने 'राष्ट्रवाद 'का जो उन्माद फैला रखा है उसका आधार क्या यही असत्याचरण ही है ?

श्रीराम तिवारी

केंद्रीय मंत्रिमंडल के सभी मंत्रियों में संभवतः सबसे ज्यादा अनुभवी - कुशल प्रशासक एक मात्र 'सहिष्णु' - धर्मनिरपेक्षतावादी एवं राजनीति के जमीनी नेता श्री राजनाथसिंह जी की बौद्धिक क्षमता का उनके विरोधी भी सम्मान करते हैं। किन्तु इतने प्रखर विद्वान व वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री को अपनी कही हुई किसी बात में वजन लाने के लिए या कथन को सत्य सिद्ध करने के लिए पाकिस्तान में छिपे बैठे किसी भारत विरोधी आतंकी हाफिज सईद की गवाही की दरकार क्यों आन पडी ? हमारे लिए तो देश के गृहमंत्री का वयान ही काफी है। यदि जेएनयू की घटना में कोई दोषी है तो कानूनी कार्यवाही होनी चाहिए ! राजनाथ जी को किसी भारत विरोधी आतंकी की आग लगाऊ वयानबाजी का सहारा नहीं लेना चाहिए। बल्कि उन्हें इस समस्या के निदान बाबत सर्वदलीय बैठक बुलानी चाहिये !
ग्रह मंत्री जी को हमेशा स्मरण रखना चाहिए कि जब पाकिस्तानी आतंकी भारत के सबसे सुरक्षित पठानकोट एयरबेस में घुस सकते हैं , जब वे मुंबई के ताज होटल में घुस सकते हैं, जब वे संसद में घुस सकते हैं ,तो जेएनयू में क्यों नहीं घुस सकते ? जेएनयू के कुछ उत्साही छात्रों ने कोई प्रोग्राम रखा और यदि जे एनयू में पाकिस्तानी एजेंट घुसे आयें हों तो यह तो ग्रह मंत्री की ही चूक मानी जाएगी ! यह भी समभव है कि किसी दक्षिणपंथी छात्र संगठन के बदमास शोहदे उस कार्यक्रम में पाकिस्तानी झंडा लहराने घुसे हों ! सिर्फ मीडिया के हो हल्ले या और 'माऊथ पब्लिशिटी 'के आधार पर उस कार्यक्रम के आयोजकों कोगिरफ्तार करना उचित नहीं है । हम सभी भारतीय जानते हैं कि जम्मू- कश्मीर में अभी-अभी तक भाजपा समर्थित पीडीएफ की मुफ्ती सरकार रही है । इस दौर में अनेक बार श्रीनगर-लाल चौक और कश्मीर में पाकिस्तानी झंडे लहराए गए। पाकिस्तान -जिन्दावाद के नारे भी लगाये गए। तो उन घटनाओं को देशद्रोही क्यों नहीं माना गया। और यदि माना गया है तो अब तक किस -किस पर कार्यवाही की गयी ? यदि कोई कार्यवाही नहीं की गयी तो क्यों न पूरी भाजपा सरकार और संघ परिवार को ही देशद्रोही मान लिया जाए ? 
मुफ्ती सरकार को समर्थन देने वाले और उसमें शामिल भाजपाई मंत्रियों की इन देशद्रोही घटनाओं में क्या जिम्मेदारी थी ? उनसे त्यागपत्र क्यों नहीं लिया गया ? केंद्र की मोदी सरकार ने उस राज्य सरकार को बर्खास्त क्यों नहीं किया ? यदि बर्खास्त करने की ताकत नहीं थी तो कम -से -कम वहाँ राष्ट्रपति शासन ही लगाकर दिखाते ! जेएनयू के उस कार्यक्रम का जो वीडीओ सामने आया है उसमें तो एबी वी पी के विद्यार्थी चिन्हित किये गए हैं। और 'सनातन सभा ' वाले तो आरएसएस का खुलकर नाम ले रहे हैं। अब राजनाथ सिंह जी और भाजपा के प्रवक्ताओं ने अपनों को बचने के लिए और गढ़े हुए झूंठ को सच सावित करने के लिए हाफिज सईद के उस वयान का सहारा लिया है जिसमें वह 'गन्दा आदमी'जेएनयू के छात्रों के समर्थन की बात कर रहा है। क्या 'संघ परिवार' के इतने बुरे दिन आ गए कि अपनी ही न्याय पालिका का भरोसा नहीं रहा और पाकिस्तानी आतंकियों के वयानों से अपनी राजनैतिक खेती करने में जुटे हैं। इतनी गंदी राजनीति तो कांग्रेस ने भी नहीं की होगी। केंद्र सरकार और संघ परिवार ने 'राष्ट्रवाद 'का जो उन्माद फैला रखा है उसका आधार क्या यही असत्याचरण ही है ?
श्रीराम तिवारी
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Thursday, 24 April 2014

सत्ता की भागीदारी से उपेक्षित वर्ग कैसे दूर रक्खा जाए ? ---तुकाराम वर्मा






विश्व के मानवीय समाज के बीच चोरी को कब से अपराध घोषित किया गया इसका उत्तर बीस वर्षों से अत्यधिक अन्वेषण करने पर भी कहीं से किसी स्रोत से नहीं मिल सका| हाँ इतना तो सुनिश्चित हो गया कि जब कुछ लोगों ने संघठित शक्ति और समूहों ने लूट के द्वारा अपार संपत्ति को एकत्र कर लिया तो उस लूटी हुई उनकी संपत्ति को कोई और न लूट सके इस कारण चोरी और लूट को सामाजिक अपराध मान लिया गया|
कालांतर में राज्य व्यवस्था बनने के बाद उसे कानूनी मान्यता दे दी गई| यह सब राजशाही के दौरान हुआ, फिर भी लूट का उद्योग चलता रहा और एक राजा दूसरे राजा पर आक्रमण करके उसकी संपत्ति को लूटने में विजय और शौर्य के रूप में पहचान पाता रहा| इसे उस राजा के धार्मिक पुरोहितों ने मान्यता दी तथा राजा को ईश्वर का प्रतिनिधि बनाकर जनता से स्वीकार्य करवाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया| इस सहयोग के लिए धार्मिक तंत्र और उसके आचार्यों को राजा से पुरस्कार एवं सामाजिक सुरक्षा प्राप्त होती रही|
विश्व में लोकतंत्र आने के बाद साधारण जनता को सत्ता की भागेदारी मिलने लगी जिस कारण स्थापित भोगवादी तंत्र को अपने को स्थापित किये रहने का खतरा बढ़ने लगा| अब चिंतनीय प्रश्न यह  उभरा कि जनता को सत्ता से कैसे अलग रक्खा जाए अतः दुरभिसंधियां रची आने लगी और प्रतिमान रूप में स्वच्छ दिखने वाली व्यवस्था के पीछे शोषण लूट और अर्थ का स्थापित साम्राज्य अधिक मजबूत किया जाने लगा|
सम्प्रति धनतंत्र प्रभावी है, दुनिया को बाजार चला रहा है| राजनेता बाजारवाद से ग्रसित हैं और पूँजीपतियों के इशारों को समझकर अपना मुँह खोलते हैं| जिन कमजोर वर्गों के नेताओं ने इस साजिश को समझा और उसे उजागर करने का प्रयास किया उनपर शिकंजा कसा गया और संगठित होकर व्यवस्था, सत्ता, धर्मतंत्र और औद्योगिक घरानों ने उन्हें अपमानित और बदनाम करना प्रारम्भ कर दिया|
चूँकि निर्वाचन के लिए राजनैतिक दल बनाना उसे चलाना अर्थ के बिना संभव नहीं अतः इन दलों को आर्थिक सहयोग से  वंचित रक्खा गया और जब इन्होंने अपने आपको आर्थिक सुदृढ़ता के अपने स्तर से प्रयास किए तो उसे वर्षों से भ्रष्टाचार करते आ रहे वर्ग ने भ्रष्टाचार के आरोपों में घेरना प्रारम्भ कर दिया, जिससे उन्हें सत्ता से बेदखल किया जा सके अथवा वह वर्ग इनके अधीन चलने वाले दलों में शामिल होकर उनकी दासता को शिरोधार्य कर ले|
ऐसा कहकर यहाँ कमजोर वर्ग के भ्रष्ट आचरण को बचाने का प्रयास नहीं किया जा रहा अपितु यह स्पष्ट करने की कोशिश है कि सत्ता की भागीदारी से उपेक्षित वर्ग कैसे दूर रक्खा जाए तथा स्थापित वर्ग का वर्जस्व बना रह सके और लोकतंत्र का केवल प्रदर्शनीय चेहरा सामने रहे|

यह विचार किसी भी तरह से एक लोकतांत्रिक राष्ट्र के लोकतंत्र के पथिकों के लिए स्वीकार करने योग्य नहीं कि किसी को सत्ता प्राप्त करने के लिए ईश्वर ने चुना है| यह काल्पनिक भ्रामक मनगढंत ढोंग है कि अमुक व्यक्ति परमेश्वर के द्वारा चुन लिया गया है| भारतीय संवैधानिक व्यवस्था ऐसे किसी विचार को मान्यता नहीं देती जिसके लिए कोई प्रमाणिक साक्ष्य न हो, क्या इस कथन के प्रमाण में परमेश्वर उनके लिए साक्ष्य के रुप में उपस्थित हो सकता है? कदाचित नहीं|
हमारा संसद भवन ईश्वर का मंदिर नहीं अपितु जनता का मंदिर है, इसमें ईश्वर के प्रतिनिधियों की नहीं अपितु जनता के प्रतिनिधियों की आवश्यकता एवं उपयोगिता है| ईश्वर के प्रतिनिधि को जनता से वोट माँगने की क्या जरूरत? ऐसा लग रहा है कि जनता का अपार धन जो ईश्वर के मंदिरों में भरा पड़ा है वह इनके प्रचार में प्रयुक्त हो रहा है|
ईश्वर के प्रतिनिधियों को ईश्वर के मंदिर में जाकर सेवकाई करनी चाहिये|