Friday, 17 April 2015

क्या लोकपाल का हश्र अनुसूचित जाति आयोग जैसा ही होगा ? --- अमित सिंह



 संसद के दोनों सदनों से मंजूरी मिलने के बाद आखिरकार देश को पांच दशक बाद भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए बहुप्रतीक्षित लोकपाल मिल गया। आज का सवर्णपरस्त समाज अन्ना को दूसरे महात्मा की उपाधि देने लगा. यह किसका लोकपाल है? सरकार का या फिर  अन्ना का? पता नहीं ! फिर भी चालीस साल से इसकी मांग हो रही थी क्यों? अन्ना को जो अनशन करने पडे़ ? सांसदों को आधी-आधी रात तक माथापच्ची करनी पड़ी। और अब जब यह बन गया है, अन्ना कह रहे हैं कि यह लोकपाल जिसका भी है, अच्छा है। कम से कम चालीस-पचास फीसदी भ्रष्टाचार तो इससे कम हो ही जाएगा। बताते हैं कि राहुल ने इस मामले में अगुवाई की। अब अन्ना कम से कम लोकपाल को लेकर तो अनशन नहीं करेंगे। बाकी की देखी जायगी। अन्ना अब राहुल की तारीफ करते नहीं थक रहे हैं।
    वैसे लोकपाल का जो भी स्वरूप सामने आया है, उसमें पता चल रहा है, कि यह तो कोई जेल भेजने वाला कानून भर है। मगर इसमें गलत शिकायत पाये जाने पर सजा और जुर्माने का जो प्राविधान किया गया है, उसे लेकर आम आदमी की चिंता वाजिब लगती है। अगर लोकपाल जेल भेजने के लिए ही बनना था, तो उसके लिए तो पहले ही बहुत से कानून थे। बेचारे लालू तो बिना लोकपाल के ही कई बार जेल हो आये हैं। राजा, कनिमोझी, कलमाड़ी भी बिना लोकपाल के जेल हो आये हैं। अरविंद केजरीवाल ने साफ हाथ झाड़ लिये हैं कि जी, हमारा वाला तो है नहीं और अन्ना जी वाला तो बिल्कुल भी नहीं है। वह तो जनलोकपाल था। पर यह तो जोकपाल है। इससे नेता तो क्या चूहा भी जेल नहीं जा पायेगा।
    यह जानकर चूहे मस्त हैं। अब वे सरकारी गोदामों का अनाज एकदम तनावमुक्त होकर चट कर सकते हैं। लेकिन अन्ना कह रहे हैं कि चूहा तो क्या, इससे तो शेर भी जेल जायेगा। इससे शेर बेचारे और डर गये हैं। शिकारियों-तस्करों के चलते जिंदगी तो उनकी पहले ही खतरे में थी, पर अब तो देर-सबेर जेल भी जाना पड़ेगा। नेताओं ने समझा था कि लोकपाल उनके खिलाफ है, लेकिन उन्हें लोकपाल मिल गया। इस चक्कर में राजनीति थोड़ी-बहुत उनके हाथ से खिसक गई हो। यानी जो जिसको नहीं चाहिए था, वही उन सबको मिला।
  
    लोकपाल पर अन्ना और केजरीवाल के बयानों और सोच में जमीन-आसमान का अन्तर है । इस अन्तर की समीक्षा में जब हम अन्य संवैधानिक संस्थाओं के गठन के पूर्व के संघर्षों, घोषणाओं, नियमों और उसके अमल करने के तरीकांे पर आते हैं तो केजरीवाल की बातों में कुछ दम नजर आने लगता है ।
    उल्लेखनीय है कि समाज के सबसे पीडि़त तबके अनुसूचित जातियों एवं जन जातियों के कल्याण के लिए संविधान के अनुच्छेद 338 के तहत गठित एक सदस्यीय आयोग सन् 1951 से कार्य कर रहा था जिसे अनुसूचित जातियों एवं जन जातियों के आयुक्त के नाम से जाना जाता था । उसका कार्यकाल 5 वर्ष का होता था । उसके स्तर को उॅचा उठाने तथा विस्तृत अधिकार देने के लिए जनता पार्टी के शासन काल में सन् 1978 में कार्यकारी आदेश के तहत श्री भोला पासवान शास्त्री की अध्यक्षता में 5 सदस्यीय बहुसदस्यीय आयोग बनाया गया। उसे संवैधानिक दर्जा देने एवं शक्तिशाली बनाने के लिए सत्तारूढ़ दल के साथ हीं साथ विपक्षी दलों एवं दलितों के उदीयमान नेता श्री राम विलास पासवान ने लगातार ऐड़ी-चोटी का जोर लगाया, आंदोलन प्रदर्शन किया । बहुसदस्यीय आयोग को 65वें संविधान संशोधन द्वारा सन् 1992 में संवैधानिक दर्जा एवं संवैधानिक अधिकार मिला और आयुक्त का पद विलोपित हो गया।
    यहाॅ केन्द्र की सरकार ने संविधान के विरूद्ध चुपके से नियमावली बनाते समय आयोग के कार्यकाल को 5 वर्ष से घटाकर 3 वर्ष और उसमें राजनीतिक व्यक्ति को भी आयोग में पदस्थापित करने का प्राविधान डाल दिया । जबकि संविधान के अनुच्छेद 338 का अवलोकन करने पर पता चलता है कि इसमें कहीं भी राजनीतिक नियुक्ति का प्राविधान नहीं हेै । जब कुछ लोगों  और संगठनों द्वारा आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों के दलीय राजनीति में भाग लेने का मामला उठाया गया तो सरकार ने मंत्रिमंडल से राजनीतिक नियुक्ति के समर्थन में नियमावली बनवाली, जिसके कारण यह आयोग व्यवहार में अपनी प्रभावशीलता, निष्पक्षता, पारदर्शिता और उपयोगिता को खो चुका  है ।
    उदीयमान नेता श्री राम विलास पासवान, उदित राज और दलितों के बड़े प्रतिनिधियों ने सरकार से मिली भगत कर ली और इसके विरूद्ध कोई आवाज नहीं उठायी। उस उदीयमान नेता को भी कल्याण मंत्रालय (अब सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय) का प्रभार मिला । पर आयोग की बंधुआ आयोग वाली स्थिति पर कोई अन्तर नहीं आया । आज सैद्धान्तिक तौर पर अनुसूचित जातियों और जन जातियों के लिए बनाया गया शक्तिशाली आयोग व्यवहार में सत्तारूढ़ दल का (चाहे कांग्रेस, बी0जे0पी0 या अन्य दल) अनुसूचित जाति/जनजाति प्रकोष्ठ(सेल) के रूप में बंधुआ मजदूर आयोग बन कर रह गया है । नियमतः आयोग को स्वायत्त, निष्पक्ष और पारदर्शी बनाया गया है । इसे सिविल कोर्ट के अधिकार दिये गये हैं । इसे प्रतिवर्ष अपनी वार्षिक रिपोर्ट तथा बीच में भी आवश्यकतानुसार कोई रिपोर्ट देने का अधिकार है तथा राष्ट्रपति को ऐसे सभी प्रतिवेदनों को संसद और संबंधित विधान सभाओं में एक्शन टेकेन रिपोर्ट के साथ रखवाने और चर्चा करने का संवैधानिक अधिकार है। पर यह वार्षिक रिपोर्ट भी चार-पाॅच साल के अन्तराल पर ही दी जाती है और उसे भी सरकार चार-पाॅच साल तक अपने पास रखे रहती है। पर व्यवहार में आज पी0 एल0 पूनिया कांग्रेस सांसद, बाराबंकी को राष्ट्रीय आयोग का अध्यक्ष नियुक्त कर सरकार द्वारा संवैधानिक प्राविधानों की खुलेआम धज्जियाॅ उड़ाई जा रही हैं । पूनिया राष्ट्रीय आयोग को कांग्रेस पार्टी के सेल के रूप में बखूबी इस्तेमाल कर रहे हैं।
        आज तक किसी भी राजनीतिक पार्टी और दलितों के किसी भी सामाजिक राजनीतिक संगठन ने इसका सक्रिय रूप से विरोध नहीं किया है। ऐसा प्रतीत होता है कि सभी नेता इस कुर्सी पर देर सबेर बैठने की आश लगाये बैठे हैं । राष्ट्रीय आयोग के बारे में ‘‘पिंजरे का शेर है राष्ट्रीय अनुसूचित जाति/जन जाति आयोग’’ संबंधी एक महत्वपूर्ण शोधपरक आलेख ‘‘सम्यक भारत’’ नई दिल्ली मासिक पत्रिका के अक्टूबर 2013 अंक में प्रकाशित हुआ था । यह आलेख सरकार की दुर्भावना और राजनीतिक दलों की चुप्पी को बड़े ही सिलसिलेवार ढ़ंग से उजागर करता है, जो चैंकानेवाला है।
        आज हमें राष्ट्र को सार्थक दिशा मे ले जाने के लिए नेक-नियत, इच्छाशक्ति और आत्मबल की जरूरत है। जहाॅ तक लोकपाल बिल की बात है यह लोकपाल को जांच, अभियोजन और दंड के अधिकार देता है । कुछ लोग इसे लोकतंत्र और देश की सम्प्रभुता के लिए खतरा कहते हैं  और यह अनुच्छेद 245 के तहत भारत के संविधान के खिलाफ है । अन्तर्राष्ट्रीय फंडिंग से ताकतवर बने कुछ एन0जी0ओ0 वालों ने मीडिया और ग्लोबलाईजेशन की अर्थनीति से ताकतवर मध्यम वर्ग के रूप में उभरे प्रभुवर्ग की संतानों के सहयोग से जिस तरह भ्रष्टाचार के खातमे की आड़ में लोगों को भ्रमित कर बहुजन राजनीति को हाशिये पर पहुॅचाने का काम किया है वह विचारणीय है । लोकपाल के पीछे छिपा एजेंडा राजनीतिक प्रणाली के रूप में लोकतंत्र का निजीकरण है। देश इस समय दोराहे पर खड़ा है। राजनीतिक लोग अपना स्वार्थ तलाश रहे हैं! इसके अलावा लोकपाल के सामने आने वाले मामलों को यदि समयबद्ध तरीके से नहीं निपटाया जा सका, तब तो स्थिति हमारी अदालतों जैसी ही हो जायेगी, जहां आज तीन करोड़ से अधिक मामले वर्षांे से लंबित हैं! मगर यह छद्म आभास क्या लोगों की सोच को बदल सकता है, या वे अपनी समझ और अनुभव पर यकीन करेंगे? उपर्युक्त पर नजर डालने पर अतीत का अनुभव बताता है कि क्या लोकपाल के साथ भी ऐसा ही होगा ? क्या केजरीवाल की बात सच होने जा रही है ?

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लेखक परिचय:
 लेखक-कंप्यूटर साइन्स - इंजिनियर , सामाजिक-चिंतक हैं । दुर्बलतम की आवाज बनना और उनके लिए आजीवन संघर्षरत रहना ही अमित सिंह का परिचय है।
--- विजय राजबली माथुर 
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Thursday, 16 April 2015

स्वम्य और भगवान --- अमित सिंह

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 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Wednesday, 15 April 2015

एक हिन्दुस्तानी हकीकत :रस्सी का साँप --- अमित सिंह शिवभक्त नंदी

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 एक हिन्दुस्तानी हकीकत :

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एक बार एक दरोगा जी का मुंह लगा नाई पूछ बैठा -
"हुजूर पुलिस वाले रस्सी का साँप कैसे बना देते हैं ?"

दरोगा जी बात को टाल गए।

लेकिन नाई ने जब दो-तीन
बार यही सवाल पूछा तो दरोगा जी ने मन ही मन तय किया कि इस भूतनी वाले को बताना ही पड़ेगा कि रस्सी का साँप कैसे बनाते हैं !

लेकिन प्रत्यक्ष में नाई से बोले - "अगली बार आऊंगा तब
बताऊंगा !"

इधर दरोगा जी के जाने के दो घंटे बाद ही 4 सिपाही नाई
की दुकान पर छापा मारने आ धमके - "मुखबिर से पक्की खबर मिली है, तू हथियार सप्लाई करता है। तलाशी लेनी है दूकान की !"

तलाशी शुरू हुई ...

एक सिपाही ने नजर बचाकर हड़प्पा की खुदाई से निकला जंग लगा हुआ असलहा छुपा दिया !

दूकान का सामान उलटने-पलटने के बाद एक सिपाही चिल्लाया - "ये रहा रिवाल्वर"

छापामारी अभियान की सफलता देख के नाई के होश उड़ गए - "अरे साहब मैं इसके बारे में कुछ नहीं जानता"।

"आपके बड़े साहब भी मुझे अच्छी तरह पहचानते हैं !"

एक सिपाही हड़काते हुए बोला - "दरोगा जी का नाम लेकर बचना चाहता है ?

साले सब कुछ बता दे कि तेरे गैंग में कौन-कौन है ...
तेरा सरदार कौन है ... तूने कहाँ-कहाँ हथियार सप्लाई किये ... कितनी जगह लूट-पाट की ...
आ चल तू अभी थाने चल !"

थाने में दरोगा साहेब को देखते ही नाई पैरों में गिर पड़ा - "साहब बचा लो ... मैंने कुछ नहीं किया !"

दरोगा ने नाई की तरफ देखा और फिर सिपाहियों से पूछा - "क्या हुआ ?"

सिपाही ने वही जंग लगा असलहा दरोगा के सामने पेश कर दिया - "सर जी मुखबिर से पता चला था .. इसका गैंग है और हथियार सप्लाई करता है.. इसकी दूकान से ही ये रिवाल्वर मिली है !"

दरोगा सिपाही से - "तुम जाओ मैं पूछ-ताछ करता हूँ !"

सिपाही के जाते ही दरोगा हमदर्दी से बोले - "ये क्या किया तूने ?"

नाई घिघियाया - "सरकार मुझे बचा लो ... !"

दरोगा गंभीरता से बोला - "देख ये जो सिपाही हैं न ...साले एक नंबर के कमीने हैं ...
मैंने अगर तुझे छोड़ दिया तो ये साले मेरी शिकायत ऊपर अफसर से कर देंगे ...
इन कमीनो के मुंह में हड्डी डालनी ही पड़ेगी ...
मैं तुझे अपनी गारंटी पर दो घंटे का समय देता हूँ , जाकर किसी तरह बीस हजार का इंतजाम कर ..
पांच - पांच हजार चारों सिपाहियों को दे दूंगा तो साले मान जायेंगे !"

नाई रोता हुआ बोला - "हुजूर मैं गरीब आदमी बीस हजार कहाँ से लाऊंगा ?"

दरोगा डांटते हुए बोला - "तू मेरा अपना है इसलिए इतना सब कर रहा हूँ तेरी जगह कोई और होता तो तू अब तक जेल पहुँच गया होता ...जल्दी कर वरना बाद में मैं कोई मदद नहीं कर पाऊंगा !"

नाई रोता - कलपता घर गया ... अम्मा के कुछ चांदी के जेवर थे

चौक में एक ज्वैलर्स के यहाँ सारे जेवर बेचकर किसी तरह बीस हजार लेकर थाने में पहुंचा और सहमते हुए बीस हजार रुपये दरोगा जी को थमा दिए !

दरोजा जी ने रुपयों को संभालते हुए पूछा - "कहाँ से लाया ये रुपया?"

नाई ने ज्वैलर्स के यहाँ जेवर बेचने की बात बतायी तो दरोगा जी ने सिपाही से कहा - "जीप निकाल और नाई को हथकड़ी लगा के जीप में बैठा ले .. दबिश पे चलना है !"

पुलिस की जीप चौक में उसी ज्वैलर्स के यहाँ रुकी !

दरोगा और दो सिपाही ज्वैलर्स की दूकान के अन्दर पहुंचे ...

दरोगा ने पहुँचते ही ज्वैलर्स को रुआब में ले लिया - "चोरी का माल खरीदने का धंधा कब से कर रहे हो ?"

ज्वैलर्स सिटपिटाया - "नहीं दरोगा जी आपको किसी ने गलत जानकारी दी है!"
दरोगा ने डपटते हुए कहा - "चुप ~~~ बाहर देख जीप में
हथकड़ी लगाए शातिर चोर बैठा है ... कई साल से पुलिस को इसकी तलाश थी ... इसने तेरे यहाँ जेवर बेचा है कि नहीं ? तू तो जेल जाएगा ही .. साथ ही दूकान का सारा माल भी जब्त होगा !"

ज्वैलर्स ने जैसे ही बाहर पुलिस जीप में हथकड़ी पहले नाई को देखा तो उसके होश उड़ गए..

तुरंत हाथ जोड़ लिए - "दरोगा जी जरा मेरी बात सुन लीजिये!

कोने में ले जाकर मामला एक लाख में सेटल हुआ !

दरोगा ने एक लाख की गड्डी जेब में डाली और नाई ने जो गहने बेचे थे वो हासिल किये फिर ज्वैलर्स को वार्निंग दी - "तुम शरीफ आदमी हो और तुम्हारे खिलाफ पहला मामला था इसलिए छोड़ रहा हूँ ... आगे कोई शिकायत न मिले !"

इतना कहकर दरोगा जी और सिपाही जीप पर बैठ के
रवाना हो गए !

थाने में दरोगा जी मुस्कुराते हुए पूछ रहे थे - "साले तेरे को समझ में आया रस्सी का सांप कैसे बनाते हैं !"

नाई सिर नवाते हुए बोला - "हाँ माई-बाप समझ गया !"

दरोगा हँसते हुए बोला - "भूतनी के ले संभाल अपनी अम्मा के गहने और एक हजार रुपया और जाते-जाते याद कर ले ...

हम रस्सी का सांप ही नहीं बल्कि नेवला .. अजगर ... मगरमच्छ सब बनाते हैं .. बस
 







 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Friday, 3 April 2015

युवाओं को कोसने वाले क्या जवाब देंगे? शासन-प्रशासन को शर्म आएगी क्या?

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 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Tuesday, 31 March 2015

'ट्रेजेडी क्वीन':मीना कुमारी --- ध्रुव गुप्त/ संजोग वाल्टर

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 मीना कुमारी जी की 44 वीं पुण्य तिथि पर उनका लिखा और उनका ही गाया यह गीत सुनें :

 




 अज़ीब दास्तां है ये, कहां शुरू कहां खत्म !:
 'ट्रेजेडी क्वीन' के नाम से मशहूर हिंदी / उर्दू सिनेमा की भावप्रवण अभिनेत्री और उर्दू की संवेदनशील शायरा मीना कुमारी उर्फ़ माहज़बीं परदे पर अपने लाज़वाब अभिनय के अलावा अपनी बिखरी और बेतरतीब निज़ी ज़िन्दगी के लिए भी जानी जाती है। भारतीय स्त्री के जीवन के दर्द को रूपहले परदे पर साकार करते-करते कब वह ख़ुद दर्द की मुकम्मल तस्वीर बन गई, इसका पता शायद उन्हें भी न चला होगा। भूमिकाओं में विविधता के अभाव के बावज़ूद उनकी खास अभिनय-शैली और मोहक आवाज़ का जादू भारतीय दर्शकों पर हमेशा छाया रहा।1939 में बाल कलाकार के रूप में उन्होंने बेबी मीना के नाम से अपना फिल्मी सफ़र शुरू किया था। नायिका के रूप में 1949 में बनी 'वीर घटोत्कच' उनकी पहली फिल्म थी, लेकिन उन्हें मक़बूलियत हासिल हुई विमल राय की फिल्म 'परिणीता से।1972 की 'गोमती के किनारे' उनकी आखिरी फिल्म थी। 33 साल लम्बे फिल्म कैरियर में उनकी कुछ कालजयी फ़िल्में हैं - परिणीता, दो बीघा ज़मीन, फुटपाथ, एक ही रास्ता, शारदा, बैजू बावरा, दिल अपना और प्रीत पराई, कोहिनूर, आज़ाद, चार दिल चार राहें, प्यार का सागर, बहू बेगम, मैं चुप रहूंगी, दिल एक मंदिर, आरती, चित्रलेखा, साहब बीवी गुलाम, सांझ और सवेरा, मंझली दीदी, भींगी रात, नूरज़हां, काजल, फूल और पत्थर, पाकीज़ा और मेरे अपने। मीना कुमारी मशहूर फिल्मकार कमाल अमरोही के साथ अपने असफल दाम्पत्य और तब के संघर्षशील अभिनेता धर्मेन्द्र के साथ अपने अधूरे प्रेम संबंध की वज़ह से भी चर्चा में रहीं। उनकी बेपनाह भावुकता ने उन्हें नशे की दुनिया में भटकाया, लेकिन उनकी शायरी ने उन्हें मुक्ति भी दी।
 मीना कुमारी की पुण्यतिथि पर उन्हें खिराज़े अकीदत उन्ही की एक नायाब नज़्म के साथ ! 
 सुबह से शाम तलक दूसरों के लिए कुछ करना है
 जिसमें ख़ुद अपना कुछ नक़्श नहीं
 रंग उस पैकरे-तस्वीर ही में भरना है
 ज़िन्दगी क्या है कभी सोचने लगता है 
यह ज़हन और फिर रूह पे छा जाते हैं 
दर्द के साये, उदासी सा धुंआ, दुख की घटा
 दिल में रह रहके ख़्याल आता है 
ज़िन्दगी यह है तो फिर मौत किसे कहते हैं?
 प्यार इक ख़्वाब था इस ख़्वाब की ता'बीर न पूछ !
 https://www.facebook.com/photo.php?fbid=837061809703752&set=a.379477305462207.89966.100001998223696&type=1&theater

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Meena Kumari ( 1 August 1932 – 31 March 1972), born Mahjabeen Bano was an movie actress and poet. She is regarded as one of the most prominent actresses to have appeared on the screens of Hindi Cinema. During a career spanning 30 years from her childhood to her death, she starred in more than ninety films, many of which have achieved classic and cult status today. With her contemporaries Nargis and Madhubala she is regarded as one of the most influential Hindi movie actresses of all time.
Kumari gained a reputation for playing grief-stricken and tragic roles, and her performances have been praised and reminisced throughout the years. Like one of her best-known roles, Chhoti Bahu, in Sahib Bibi Aur Ghulam (1962), Kumari became addicted to alcohol. Her life and prosperous career were marred by heavy drinking, troubled relationships, an ensuing deteriorating health, and her death from liver cirrhosis in 1972.
Kumari is often cited by media and literary sources as "The Tragedy Queen", both for her frequent portrayal of sorrowful and dramatic roles in her films and her real-life story.

Friday, 27 March 2015

इस ऑडिटोरियम के बिना अधूरी रहेगी थिएटर की कहानी....रंगमंच हमारी जिद है

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 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Monday, 23 March 2015

भगत सिंह: एक संक्षिप्त परिचय --- K K Bora Comrade

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 भगत सिंह: एक संक्षिप्त परिचय :
 भगत सिंह पर जलियांवाला बाग हत्याकांड का बहुत असर पड़ा था भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर, 1907 को लायलपुर ज़िले के बंगा में चक नंबर 105(अब पाकिस्तान में) नामक जगह पर हुआ था. हालांकि उनका पैतृक निवास आज भी भारतीय पंजाब के नवांशहर ज़िले के खट्करकलाँ गाँव में स्थित है. उनके पिता का नाम किशन सिंह और माता का नाम विद्यावती था. यह एक सिख परिवार था . दादा गदरी आन्दोलन से जुड़े थे चाचा निर्वासित हो के आजादी आन्दोलन में रहे पिता समेत सभी लोग आजादी की लड़ाई में कई मर्तबा जेल काट चुके थे . अमृतसर में 13 अप्रैल 1919 को हुए जलियांवाला बाग हत्याकांड ने भगत सिंह की सोच पर गहरा प्रभाव डाला था. लाहौर के नेशनल कॉलेज़ की पढ़ाई छोड़कर भगत सिंह हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन ऐसोसिएशन नाम के एक क्रांतिकारी संगठन से जुड़ गए थे. रूस की मजदूर वर्ग क्रांति से प्रभावित हो भगत सिंह ने शोषण विहीन समाज के रूप में भारतीय आजादी की लड़ाई का लक्ष्य रखा. 1930 में उन्होंने अपने संघटन का एक प्रतिनिधि सोवियत संघ में भेजा और क्रांति के लिए लेनिन के विचारो को जरुरी बताया भगत सिंह के लेख नोजवानो के नाम सन्देश में भगत सिंह ने नोजवानो से कम्युनिस्ट पार्टी को तैयार करने को कहा भगत सिंह ने भारत की आज़ादी के लिए नौजवान भारत सभा की स्थापना की थी. इस संगठन का उद्देश्य ‘सेवा,त्याग और पीड़ा झेल सकने वाले’ नवयुवक तैयार करना था. भगत सिंह ने राजगुरू के साथ मिलकर लाहौर में सहायक पुलिस अधीक्षक रहे अंग्रेज़ अधिकारी जेपी सांडर्स को मारा था. इस कार्रवाई में क्रांतिकारी चंद्रशेखर आज़ाद ने भी उनकी सहायता की थी.   भगत सिंह ने नई दिल्ली की केंद्रीय एसेंबली में बम फेंका था. क्रांतिकारी साथी बटुकेश्वर दत्त के साथ मिलकर भगत सिंह ने नई दिल्ली की सेंट्रल एसेंबली के सभागार में 8 अप्रैल, 1929 को 'अंग्रेज़ सरकार को जगाने के लिए' बम और पर्चे फेंके थे. बम फेंकने के बाद वहीं पर दोनों ने अपनी गिरफ्तारी भी दी. भगत सिंह पर ब्रिटिश शासन के ख़िलाफ़ जंग छेड़ने का आरोप लगा और उन पर लाहौर षड़यंत्र के तहत मामला बनाया गया. लाहौर षड़यंत्र मामले में भगत सिंह को सुखदेव और राजगुरू के साथ फाँसी की सज़ा सुनाई गई जबकि बटुकेश्वर दत्त को आजीवन कारावास दिया गया. भगत सिंह को 23 मार्च, 1931 की शाम सात बजे फाँसी पर लटका दिया गया. इतिहासकार बताते हैं कि फाँसी को लेकर जनता में बढ़ते रोष को ध्यान में रखते हुए अंग्रेज़ अधिकारियों ने तीनों क्रांतिकारियों के शवों का अंतिम संस्कार फ़िरोज़पुर ज़िले के हुसैनीवाला में कर दिया था. भगत सिंह ने क्रांतिकारी आंदोलन को ‘इंक़लाब ज़िंदाबाद’ का नारा दिया था.
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Madhuvandutt Chaturvedi :·
  "भगत सिंह से यह मेरी पहली मुलाकात थी। मैं जतीन्द्र नाथ दास बगैरहा से भी मिला । भगत सिंह का चेहरा आकर्षक था और उससे बुद्धिमत्ता टपकती थी । वह निहायत शांत और गंभीर था । उसमें गुस्सा नहीं दिखाई देता था । उसकी दृष्टि और बातचीत में बड़ी सुजनता थी ।" - जवाहर लाल नेहरू ( लाहौर सडयंत्र केस के कैदियों की भूख हड़ताल के एक महीने पूरे होने पर लाहौर जेल में नेहरू उनसे मिले थे । उल्लेखनीय है कि भूख हड़ताल के 61 वे दिन जतिन्द्र नाथ दास शहीद हो गए थे जिनकी शहादत पर नेहरू ने लिखा,'मृत्यु से सारे देश में सनसनी फ़ैल गयी थी ।' )



 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Tuesday, 17 March 2015

पूंजी के बनावटी रिश्ते को अमान्य करना जायज ---सत्य नारायण त्रिपाठी

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 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश
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Tuesday, 10 March 2015

गांधी जी पर लांछन क्यों? --- विजय राजबली माथुर

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http://vijai-vidrohi.blogspot.in/2015/03/gandhi-british-agent-markandey-katju.html 

https://www.facebook.com/justicekatju/posts/933487810025099 
 हालांकि जस्टिस काटजू का यह कहना कि गांधी जी ने 'क्रांतिकारी आंदोलन' की धार कुन्द कर दी और अधिकांश क्रांतिकारियों को फांसी दे दी गई तो सही है परंतु 'भारत-विभाजन' के लिए उनको उत्तरदाई ठहराना उनके साथ अन्याय होगा एवं अप्रत्यक्ष रूप से RSS/भाजपा के गलत विचारों को प्रोत्साहन देना भी  । 1857 की प्रथम क्रान्ति का हश्र गांधी जी के समक्ष था कि किस प्रकार पारस्परिक फूट से उसे विफल किया गया था अतः 'अहिंसा और सत्याग्रह' का मार्ग अपनाना उनकी एक रणनीतिक सफलता थी । विभाजन तो अमेरिकी राष्ट्रपति आईजेन हावर की दुर्नीति के कारण सामने आया था जिसे कमजोर होते जा रहे ब्रिटिश साम्राज्य को भी मानना ज़रूरी हो गया था। 
 यह एक सुनिश्चित ब्राह्मणवादी विचार धारा है कि भारत के प्रतीक महा पुरुषों को बुरी तरह बदनाम कर के जनता को दिग्भ्रमित किया जाये। इसी कारण पौराणिक ग्रन्थों के जरिये 'राम' और 'कृष्ण' के चरित्रों पर लांछन लगाए गए दूसरी ओर उनको अलौकिक घोषित करके उनकी पूजा शुरू करा दी गई जिसके जरिये ब्राह्मणों को रोजगार मिल गया। शेष जनता उनके क्रांतिकारी विचारों से अनभिज्ञ होने के कारण लाभ न उठा सकी। आधुनिक युग में एक बार फिर गैर ब्राह्मण महा पुरुषों पर लांछन की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है जिससे उन लोगों को लाभ पहुंचाया जा सके जो साम्राज्यवाद के पिट्ठू रहे हैं और इसी लिए त्याग,बलिदान करने वाले महा पुरुषों पर ये कीचड़ उछाले जा रहे हैं।

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जस्टिस काटजू जातिवाद पर चल कर गैर ब्राह्मण महा पुरुषों पर लांछन लगा रहे हैं। अब नेहरू जी को भी गांधी जी के विरुद्ध घसीट लिया है। महात्मा गांधी जी के साथ-साथ नेताजी सुभाष बोस को भी विदेशी एजेंट घोषित करके जस्टिस काटजू RSS के इतिहास पुनरलेखन का कार्य संपादित कर रहे हैं।

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