Sunday, 8 May 2016

किसान और देश को बचाने के लिए है किसान जागरण यात्रा ------ इम्तियाज़ बेग / राजेन्द्र यादव

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भाइयों,बहनों 

आइये इस किसान जागरण यात्रा में आप अपना सक्रिय सहयोग और समर्थन दें। आज़ादी के बाद कुटिल राजनीतिक चालाकियों के कारण हाशिये पर डाल दिये गाँव और किसान को संगठित कर इस देश की मुख्य राजीनीतिक और आर्थिक धारा में शामिल करने के इस महाभियान में आप सक्रिय हिस्सेदारी निभाएँ जो आज़ादी के सिपाहियों और शहीदों का एक मात्र सपना रहा है। 
भारतीय किसान एक निर्मम षणयंत्र के तहत लूटे जा रहे हैं। किसान विरोधी देशी-परदेसी सरकारी नीतियाँ तो उसे लूट ही रही हैं,साथ में असमय वर्षा,बाढ़,सूखा,ओलावृष्टि और कीट हमले से प्रकृति भी लूट रही है। मौसम विज्ञान इसे जलवायु परिवर्तन का परिणाम बता रहे हैं, किन्तु सबसे बड़ा सवाल है कि किसान कहाँ जाये?आज इस देश में सबकी आवाज़ सुनी जाती है,किसान संगठित नहीं है,इसलिए सरकारी नीतियाँ उसे पीट-पीट कर अधमरा करती जा रही हैं। अधमरे लोगों में कमजोर दिल वाले आत्महत्या कर रहे हैं। स्वयं सरकारी आंकड़ों (क्राइम रिकार्ड ब्यूरो) के अनुसार पिछले 15 वर्षों से आठ लाख से अधिक किसानों ने आत्महत्या कर ली है। महाराष्ट्र के विदर्भ और मराठवाड़ा मं  दसों किसान बेचारगी में आत्महत्या कर रहे हैं,और उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड में भी रोजाना चार-पाँच किसान आत्महत्या कर रहे हैं। शराब कारोबारी विजय माल्या जहाँ एक ओर सरकारी बैंकों का हजारों-हजार करोड़ रूपये दिनदहाड़े लूट कर चला गया,वहीं कृषि आय के बहाने बेईमान पूंजीपति और कारोबारी बीस हजार लाख करोड़ रूपये का कालाधन इसी देश में दबा कर रखे हुए हैं और किसान नकली बीज-खाद और कीटनाशक ऊंचे दामों पर इस बेईमान सरकारी तंत्र के चलते खरीदने के लिए विवश है। सरकारी तंत्र (जिलाधिकारी,एस.पी.) न तो टैक्स चोरों-मिलावटखोरों को पकड़ पा रहा है और न तो डकैती और सांप्रदायिकता भड़काने वाले राजनीतिक गुंडों पर कोई लगाम लगा पा रहा है। विजया माल्या जैसे टैक्स चोर,काले कारोबारी जेल के बजाय राज्य सभा में सांसद चुन कर भेजे जा रहे हैं, वहीं प्राकृतिक  आपदा और बढ़ते खेती की लागत के कारण समय पर मामूली ऋण जमा न कर पाने वाले किसान को बेरहमी से उसके खेत और घर से घसीट कर हवालात में बंद कर दिया जाता है तथा हवालात का भी खर्च उसी से जबरदस्ती वसूला जा रहा है। 
स्थिति खतरनाक मोड़ ले चुकी है। किसान अपने दलहन-तिलहन,गेहूं-धान गन्ना का दाम नहीं तय कर सकता है। अब स्टाक मार्केट के अरबपति-खरबपति दलाल और बाजार के मुनाफाखोर खिलाड़ी इसका दाम तय कर रहे हैं। यही पूंजी का कमाल खेती-किसानी का दुर्दिन है। कारण साफ है किसान संगठित नहीं है। वेतन आयोग ने हाल ही में सरकारी कर्मचारी का न्यूनतम मासिक वेतन रु. 18,0000.00 मासिक तथा अधिकतम रु.2.50 लाख मासिक तय कर दिया है किन्तु साथ सत्तर सालों तक खेतों में पसीना बहाने वाले किसानों,खेत मजदूरों का कोई पुरसा हाल नहीं है न तो उनके न्यूनतम आय की कोई गारंटी है। इसीलिए गांवों से प्रतिवर्ष 9% की दर से सालान पलायन हो रहा है और खेती का रकबा भूमि अधिग्रहण कानून और अंधे विकासवाद की नीतियों के चलते लगातार घटता जा रहा है। 
कृषि लागत दर और महंगाई लगातार बढ़ती जा रही है,इसे हर हाल में रोकना होगा और इसे रोकने के लिए संगठित और धारदार किसान आंदोलन की जरूरत आज सबसे ज्यादा है। खेती को बचना है तो गाँव को भी बचना होगा,गाँव बचेगा तभी खेती और किसानी बचेगी। खेती और गाँव बचाकर ही हम किसान और देश को बचा सकते हैं यही सच्ची देश भक्ति और राष्ट्रवाद है। 
इन्हीं सच्चाइयों को ध्यान में रख कर उत्तर-प्रदेश किसान सभा ने पूरे प्रदेश में 11 अप्रैल 2016 से किसान जागरण यात्रा प्रारम्भ की है। देश के किसानों के सर्वमान्य नेता,स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी स्वामी सहजानन्द के जन्म स्थल गाजीपुर से यह अभियान शुरू किया गया है जो 20 मई को लखनऊ में विशाल किसान महापंचायत में तब्दील हो जायेगा और इस महापंचायत में उत्तर प्रदेश के सभी प्रभावी किसान संगठनों के नेतृत्व के अतिरिक्त अखिल भारतीय किसान सभा के महासचिव और साथी अतुल कुमार अनजान की उल्लेखनीय उपस्थिति रहेगी।

 यह अभियान नई सोच और किसानोन्मुखी राजनीति पैदा करने का है। किसानों,मजदूरों,दस्तकारों को संगठित कर देश एवं प्रदेश की राजनीति को किसानोन्मुखी बनाने की दिशा में यह सशक्त हस्तक्षेप है ताकि देश की दौलत का मुंसिफ़ाना तस्कीम हो सके और देश बहुराष्ट्रीय कंपनियों,शेयर बाजार के सट्टेबाज खिलाड़ियों,भ्रष्ट राजनेताओं,कुटिल अफसरशाहों-ठेकेदारों के चंगुल से मुक्त हो सके। 



प्रमुख मांगें

1. राष्ट्रीय किसान आयोग (स्वामीनाथन आयोग) की संस्तुतियों को केंद्र और राज्य सरकारें तत्काल लागू करें। 
2. 60 वर्ष के सभी स्त्री-पुरुष किसानों,खेत मजदूरों,ग्रामीण दस्तकारों को 10,000 रु. ( दस हजार रुपया) मासिक पेंशन केंद्र व राज्य सरकारें मिलकर देना सुनिश्चित करें। 
3. किसानों के सहकारी-सरकारी कर्ज़ माफ किये जायें एवं उन्हें रबी-खरीफ पर ब्याज मुक्त ऋण उपलब्ध कराया जाये। 
4. कृषि उत्पादों का लाभकारी मूल्य (लागत पर पचास फीसदी जोड़ कर) दिया जाय। 
5. भूमि अधिग्रहण अध्यादेश को तत्काल वापस लिया जाय। 
6. केरल राजयकी भांति किसान कर्ज़ एवं आपदा राहत ट्रिब्यूनल की स्थापना की जाय। 
7. खेती किसानी के लिए बिजली की बढ़ी दरों को वापस लिया जाय, साथ ही सस्ती एवं अबाध बिजली 18 घंटे उपलब्ध कराई जाय। 
8. नहरों की टेल तक वास्तविक सफाई कराकर पानी खेतों में पहुँचने का पुख्ता प्रबंध किया जाय। 
9. प्रदेश के किसानो के निजी नलकूपों को अन्य राज्यों की तरह मुफ्त बिजली की व्यवस्था की जाय। 
10. नंदगंज,रसड़ा,छाता,देवरिया,औरैया,शाहगंज चीनी मिलों को चालू किया जाय। 
11. शिक्षा व चिकित्सा व्यवस्था को सरकार अपने हाथ में ले। 
12. गन्ने का सामान्य मूल्य 450 रु. किया जाय एवं गन्ने का बकाया भुगतान किया जाय। 
13. प्रदेश में रबी व खरीफ की फसल बर्बाद होने के बाद केंद्र व प्रदेश की सरकारें क्षतिपूर्ति देने का वादा करें या अब तक लगभग 33%किसान लाभान्वित हुए हैं शेष किसानों को तत्काल क्षतिपूर्ति दी जाय। 

Tuesday, 3 May 2016

चरण स्पर्श : पैर छूना --- राजनीति और विज्ञान ------ विजय राजबली माथुर

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राजनीति  : 

जब लालू प्रसाद बिहार के मुख्यमंत्री थे तब उन्होने पैर छूने  - चरण स्पर्श  की परंपरा का विरोध किया था  लेकिन अब जे एन यू  छात्र संघ  के अध्यक्ष  कन्हैया कुमार द्वारा उनके पैर छू  कर आशीर्वाद  लेने पर कन्हैया की आर एस एस व  कारपोरेट समर्थक  वामपंथियों  द्वारा कड़ी आलोचना की जा रही है। विभिन्न विद्वानों के मत  संकलित कर प्रस्तुत किए गए हैं। व्यक्तिगत रूप से  राजनीति में पैर छूने या चरण स्पर्श की प्रक्रिया का मैं  समर्थन नहीं करता लेकिन मैंने यह भी देखा है कि, भाकपा, यू पी  के प्रदेश कार्यालय में बैठ कर  पार्टी के सीताराम केसरी बने  कोषाध्यक्ष  ब्राह्मण कामरेड  AISF व AIYF के नेता रहे  ब्राह्मण व  यादव युवाओं से  अपनी कुर्सी पर बैठे-बैठे  पैर छुवाते - चरण स्पर्श  करवाते हैं। तब कामरेडशिप  आड़े नहीं आती है क्योंकि वह ब्राह्मण कामरेड हैं । लालू जी के चरण स्पर्श पर समस्या इसलिए है कि वह ब्राह्मण नहीं हैं। यह भेदभाव ही तो 
' ब्राह्मण वाद ' है। 

विज्ञान  : 

हाथ और पैरों में अंगूठा समेत दस- दस उँगलियाँ होती हैं  । इनमें   पैर की उँगलियों के नाखूनों द्वारा  'ऊर्जा'  बाहर  निकलती है जबकि  हाथ की उँगलियों के नाखूनों द्वारा  'ऊर्जा' ग्रहण  की जाती है। पैर छूने  अथवा चरण स्पर्श  का विज्ञान यह है कि यदि किसी विद्वान के चरण हाथ द्वारा स्पर्श किए जाएँ तो ज्ञान का अंश हाथों द्वारा  प्राप्त किया जाता है। इसी लिए सबके चरण स्पर्श का विधान भी नहीं था। आजकल उस लायक कोई विद्वान भी नहीं है। 

चरण स्पर्श की भी वैज्ञानिक विधि यह है  कि, चरण स्पर्श करने वाला ज्ञान पिपासू अपने दाहिने हाथ के नाखून विद्वान के दाहिने पैर के नाखूनों पर इस प्रकार रखे कि अंगूठा  अंगूठे पर तर्जनी तर्जनी पर , मध्यमा  मध्यमा पर , अनामिका अनामिका पर और कनिष्ठा कनिष्ठा पर रहे। इसी प्रकार बायाँ हाथ  बाएँ  पैर पर रहे। अर्थात हथेली को उलट कर  X  चरण स्पर्श करना होता है। तभी  विद्वान के पैरों के पर्वतों से निकालने वाली ज्ञान रश्मियेँ   इच्छुक जिज्ञासु  के हाथों द्वारा उसके शरीर में प्रविष्ट होती है। 

आज व्यवहार में पैर छूने  चरण स्पर्श  की जो प्रक्रिया है वह मात्र दिखावा भर है कि किसी बड़े को सम्मान दिया गया है। बड़े को सम्मान देना कोई गुनाह नहीं है अतः कन्हैया की आलोचना सिर्फ उनकी लोकप्रियता की प्रतिक्रिया में उत्पन्न  खिसियाहट भर है। 
संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

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03-05-2016 
05-05-2016 
05-05-2016 

Saturday, 30 April 2016

बिपन चन्द्र के खिलाफ संघ की साजिश ------ आदित्य मुखर्जी / सौरभ बाजपेयी

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Saurabh Bajpai
April 28  · 

कृपया इसे ज्यादा से ज्यादा शेयर करें ताकि बिपन चन्द्र के खिलाफ संघ की साजिश बेनकाब हो जाए...
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यह बिपन चन्द्र का 1 नवंबर 2007 का स्टेटमेंट है जो टाइम्स ऑफ़ इंडिया में प्रकाशित हुआ था. इसमें वो साफ़-साफ़ कहते हैं कि यह टर्म पहले इज़्ज़त के साथ प्रयोग किया जाता था। लेकिन अब आतंकवाद शब्द के साथ बहुत नकारात्मक भाव जुड़ गया है इसलिए वो भविष्य में इस शब्द का हरगिज़ प्रयोग नहीं करेंगे. सोच में इस परिवर्तन को वो क्या समझेंगे जिनकी सोच 1925 से आज तक नहीं बदली है.
https://www.facebook.com/photo.php?fbid=1137293679626220&set=a.181882891833975.38332.100000367971889&type=3&permPage=1



    संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Tuesday, 26 April 2016

किसान बजट भी संसद में प्रस्तुत किया जाय ------ अतुल कुमार सिंह 'अंजान '

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राष्ट्रीय महासचिव - किसानसभा कामरेड अतुल कुमार सिंह 'अंजान ' 








उ.प्र.किसान सभा के प्रदेश सचिव व पूर्व विधायक राजेंद्र यादव की नैतृत्व में गाजीपुर से निकली किसान जन जागरण यात्रा बुधवार को मऊ के कलेक्ट्रेट में पहुंची। किसान सभा के महा सचिव अतुल कुमार अनजान के कहा कि अखिल भारतीय किसान सभा ने राजेंद्र यादव की अगुवायी में नंदगंज चीनी मिल गाजीपुर के सामने एक महीने तक अनवरत धरना व 15 दिन तक सरजू  पांडे पार्क में क्रमिक धरना चलाया जो की ऐतिहासिक आंदोलन था जिसमे हर दल के लोग सामिल हुए ।
उन्होंने कहा कि गन्ना सचिव व राज्य सरकार के आश्वासन के बाद भी बंद पड़ी मिलें चालू नहीं हो सकीं। कहा कि प्रदेश में सडकों की स्थिति सबसे अधिक दयनीय है। अनियमित विद्युत कटौती से प्रदेश का किसान ;व्यापारी ;छात्र; महिलायें सभी परेशान हैं।
नहरों में टेल तक पानी नहीं पहुंच पा रहा। इस साल दैवीय आपदा के कारण किसानों की फसल बीमा व फसल मुवावजा तो केंद्र और राज्य सरकार द्वारा घोषित धनराशि का लाभ प्रदेश के 70 प्रतिशत किसानों को नहीं मिल रहा है।
किसान सभा जनजागरण यात्रा की प्रमुख मागों को बताते हुए अतुल कुमार अनजान ने बताया कि 60 साल से अधिक उम्र के सभी किसान, मजदूर ,बडई, शिल्पकार,स्त्री-पुरुष को 6000 रूपये मासिक पेन्शन प्रदेश व केंद्र सरकार मिलकर दे ।
प्रदेश में रवी व खरीफ की फसल बर्बाद होने के बाद प्रदेश व केंद्र सरकार ने छतिपूर्ति देने का वादा किया था लेकिन अब तक 30 प्रतिशत किसानों को ही मिल पाया है जिससे किसानो में रोष व्याप्त है।
गन्ने का समर्थन मूल्य 450 रुपया कुंतल दिया जाए तथा गन्ने की बकाया राशि ब्याज के साथ दिया जाय। देवकली पम्प कैनाल व शारदा सहायक परियोजनाओं की अधिकांश नहरें पट गयी हैं,इनके टेल तक सफाई कराकर पानी पहुंचाया जाए। 
नन्दगंज ,रसड़ा ,छाता,देवरिया ,शाहगंज चीनी मिलों को चालू कराया जाय। स्वामीनाथ रिपोर्ट को लागू किया जाय। फसलों के लाभकारी मूल्य में 50 प्रतिशत लाभ जोड़कर दिया जाय। फसल बर्बादी एवम फसल बीमा का पैसा किसानों को तत्काल दिया जाय।
रेल बजट की तरह किसान बजट भी संसद में प्रस्तुत किया जाय। जो किसान नहरी एरिया से बाहर हैं उनको 80 प्रतिशत सब्सिडी पर सोलर सबमर्सिबल बिजली पम्प अथवा डीजल इंजन दिये जायं। पदेश की छोटो नदियों में डैम बनाकर पानी का संचय किया जाय।

मांगो को लेकर आज किसान सभा ने कलेक्ट्रेट में सभा किया।
Rajendra Yadav Ex Mla

https://www.facebook.com/groups/794417660591110/permalink/1175955229104016/




मछली शहर - विश्व नाथ शास्त्री जी , पूर्व सांसद 




संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Friday, 22 April 2016

किसानों का उत्तर प्रदेश विधानसभा पर विशाल प्रदर्शन : कामरेड अतुल अंजान का आह्वान

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12 अप्रैल 2016 को सरजू पांडे पार्क,गाजीपुर में किसानसभा के राष्ट्रीय महासचिव कामरेड अतुल अंजान का सम्बोधन 



तरवान बाज़ार में,22 अप्रैल को कामरेड विश्वनाथ शास्त्री,पूर्व सांसद का सम्बोधन 

किसानसभा के राष्ट्रीय महासचिव एवं भाकपा के राष्ट्रीय सचिव  कामरेड अतुल अंजान ने 10 अप्रैल 2016 से 'किसान जागरण यात्रा ' का प्रारम्भ किया है जो 20 मई को विधान सभा पर  लखनऊ में सम्पन्न होगी। 


 इस क्रम में 12 अप्रैल को गाजीपुर   जिला मुख्यालय स्थित सरजू पांडेय पार्क में  बड़ी संख्या में किसानों ने प्रदर्शन किया। धरने  को संबोधित करते हुये  कामरेड अंजान  ने  कहा कि यूपी का सरकारी अमला जूताखोर हो गया है। उन्हें महाराष्ट्र के जल संकट से सबक लेना चाहिए। अफसर सरकार की नीतियों को अमल में नहीं ला रहे हैं। सीएम को उन पर कार्रवाई करनी चाहिए।

उन्होंने कहाकि सरकारों की नजर में विजय माल्या देशभक्त हैं, जो जनता को शराब पिलाकर सरकारों को विदेशी मुद्रा देता है। शायद यही कारण है कि खेती के लिए सरकारी बैंक से मामूली कर्ज लेने वाले किसान की जमीन कर्ज चुकता न कर पाने पर कुर्क कर ली जाती है, जबकि वि‍जय माल्या देश का सात हजार करोड़ रुपए कर्ज के रुप में लेकर फरार हो जाता है। लेकिन सरकार उस पर कार्रवाई नहीं करती है।

कामरेड  अतुल अंजान ने कहाकि सरकार अपने - अपने बजट को किसानों का बजट बता रही है। लेकिन किसानों को लाभ पहुंचाने वाली योजनाएं और कार्यक्रम नजर नहीं आ रहे हैं।


उन्होने कहा कि केंद्र सरकार 1922 तक किसानों की आमदनी दोगुना करने की बात कर रही है। लेकिन यह बता पाने में असमर्थ है कि यह होगा कैसे ? भारत के विकास का नारा चंद कारपोरेट घरानों के लिए है। देश की 65 से 70 प्रतिशत आबादी के लिए नहीं है। इन लोगों के विकास के बिना तरक्की का नारा पूर्ण रुप से बेइमानी है।  उन्होने  किसानों व आम जनता का आह्वान किया  कि, 20 मई को लखनऊ विधानसभा के सामने प्रदर्शन में अधिक से अधिक संख्या में एकत्र  हों  जिससे प्रदेश और देश की सरकारों  के कानों पर जूं रेंगे और हमारी मांगे पूरी हों।

15 अप्रैल 2016 को मधुबन में कामरेड अतुल अंजान 


रानीपुर में कामरेड अर्चना उपाध्याय 


 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Thursday, 14 April 2016

"जिंदल ने मेरी ज़मीन छीनी,मार दिया भाई को, तार तार करदी आबरू मेरी" ------ तारिका

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"जिंदल ने मेरी ज़मीन छीनी,मार दिया भाई को, तार तार करदी आबरू मेरी"

 0   Abdullah Jan   April 12, 2016

यह कहानी रायगढ़ क्षेत्र की तारिका कि है। तारिका की ज़ुबानी सुनिए कि जिंदल समूह ने उनकी ज़मीन .. हथियाने के लिए उनपर किस किस प्रकार के ज़ुल्म ढाये और तत्कालीन सरकारी तंत्र ने कैसे इस पाप में भागीदारी ली



मेरे पापा सरकारी अधिकारी थे। 1998 में उनका देहांत हो गया। हमारी जमीन गांव से तीन किमी दूर है। वर्ष 2000 में जिंदल दो साथियों के साथ जमीन लेने आए थे, लेकिन तब मां ने मना कर दिया, क्योंकि वो पापा के निधन के बाद उस जमीन से हम दो भाई-बहिनों को संभाल रही थीं। हमें गांव तक बिजली लाने के लिए रिश्वत देनी पड़ी थी, लेकिन राज्य का निर्माण हमारे लिए दुखद दिन था। बिजली वायर चोरी हो गए। इसकी शिकायत की, लेकिन कार्रवाई नहीं हुई।

2003 में पता चला कि हमारी जमीन का अधिग्रहण होगा। सरपंच से पता चला कि पूंजीपथरा में जमीनों के अधिग्रहण को लेकर कोई ग्राम सभा नहीं हुई। कोटवार और एक आरक्षक ने मां को बताया कि हमारी जमीन अधिग्रहण दायरे में है, मुआवजा लेने आओ। मां ने आपत्ति की तो दबाव का खेल शुरू हुआ। एक रोज घर के बाड़े को तोड़ा जा रहा था, तब मां जो स्वयं सरकारी मुलाजिम थी, वह घरघोड़ा के एसडीएम सुनील जैन के पास सूचना देने गईं। मां शुगर और बीपी की मरीज है, लेकिन उन्हें वहां बंधक बना लिया गया। एक तरफ मां कैद थी तो दूसरी तरफ मैं अपने पति और भाई के साथ अपनी जमीन पर खड़ी थी। हम विरोध कर रहे थे कि जमीन पर बुलडोजर नहीं चलने देंगे।

उधर एसडीएम दफ्तर में मां को धमकी दी जा रही थी कि जमीन नहीं दोगी तो बच्चों पर बुलडोजर चढ़ा देंगे। दफ्तर के बाहर डीके भार्गव और राकेश जिन्दल, जो जिन्दल के दलाल थे, वे बैठे हुए थे। जब यह तय हो गया कि हम पर बुलडोजर चल जाएगा, तब मां ने हमें एसडीएम दफ्तर बुला लिया। हम चार घंटे तक वहां थे, हमारी जमीन पर बुलडोजर चल चुका था। आम-काजू के पेड़ बरबाद हो गए। वहां कच्ची सडक़ बन गई और गाडिय़ां आने-जाने लगीं।

भाई की हत्या को दुर्घटना में बदल दिया
मां ने सहमति पत्र पर हस्ताक्षर नहीं किए, पुलिसवाले मेरे भाई प्रवीण पर दबाव बनाने लगे। वे उसे हर दूसरे-तीसरे रोज थाने ले जाते थे, धूप में खड़ा रखते, मुर्गा बनाते। एक अप्रैल 2007 को भाई अपने दोस्तों के साथ तराईमाल गया। 2 अप्रैल की सुबह खबर मिली कि उसका एक्सीडेंट हो गया। मैं घटनास्थल पर पहुंची तो प्रवीण के साथ उसके दोस्तों की भी मौत हो चुकी थी। कहीं से भी नहीं लग रहा था कि वह एक एक्सीडेंट है। शासन-प्रशासन ने उनकी हत्या को एक्सीडेंट साबित कर दिया। हमारी आधी जमीन पर कब्जा हो चुका था। शिकायत करनी चाही तो मां पर ही शांति भंग का प्रकरण दर्ज कर दिया।

...और वो भयानक दिन
31 मई 2015 को मां के साथ पूंजीपथरा में थी। रात में तेज बुखार आया। सुबह अकेली ही इलाज के लिए घर से निकली। सडक़ पर खड़ी होकर बस का इन्तजार कर रही थी, तभी एक फोरव्हीलर आकर रुकी। ड्राइवर ने पूछा कि क्या तमनार जाना है। मैं गाड़ी में बैठ गई। मुझे पता नहीं चला, क्या हुआ...। होश आया तो कुछ आवाजें सुनीं। मेरे दोनों हाथ पलंग पर बंधे थे। कुछ लोग एक-दूसरे को मैनेजर-डायरेक्टर बोलकर बात कर रहे थे।

मैं चिल्लाई तो एक आदमी आया और उसने मेरे कंधों को पकडक़र कहा कि तुम्हारी जमीन हमारे कब्जे में है। तुम कलक्टर को लिख दो कि हम जमीन छोडक़र जा रहे हैं। जब उसने मुझे झकझोरा, तब मुझे पता चला कि मेरे शरीर पर एक भी कपड़ा नहीं था। मेरी आंखों पर पट्टी बंधी थी। वो जानवर मेरे हाथों में अपना गुप्तांग पकड़ा रहे थे। चिल्लाना चाहती थी लेकिन चिल्ला नहीं पा रही थी। इन जल्लादों की बात अगर मैं कहूं तो आप सभी अपना सिर शर्म से नीचे कर लेंगे। जब मेरी आंखों की पट्टी खुली तो मैंने कपड़े पहने। जल्लादों ने मुझे वहीं छोड़ दिया, जहां से लेकर आए थे। हम तीन जून को तमनार थाने गए तो मुंशी ने शिकायत रख ली। पांच जून को पुलिसवालों ने घर आकर मेरे पति को धमकाया कि ज्यादा नेतागिरी करोगे तो नक्सली बनाकर मार देंगे। मेरी कम्पलेन फाड़ दी।

जिंदा हूं, तब तक लडूंगी...
मैंने अपने छह साल के बच्चे को बाहर पढऩे भेज दिया। यह फैसला बेहद कठिन था। 2014 में तय किया कि मैं लड़ाई लडूंगी। सुप्रीम कोर्ट गई तो मेरा केस रजिस्ट्रार के पास ही खारिज हो गया। सात अप्रैल 2015 को मेरा केस फिर सुप्रीम कोर्ट में लगा। जो वकील जिन्दल के पक्ष में खड़े थे, वे कार्यक्रम में मौजूद हैं। उन्हें देखकर बेहद तकलीफ हुई। मेरी ओर से एक-दो वकील। और उसके लिए 20-20 वकील। कैसे मिलेगा साधारण इंसान को न्याय। जब मैं वहां से गुहार लगाकर लौटी तो कलक्टर ने मुझे दोबारा ज्वाइनिंग नहीं दी। ट्रांसफर कर दिया। वेतन नहीं दी जा रही। एफआईआर तक दर्ज नहीं, लेकिन मैं लड़ाई लडूंगी। जब तक मैं जिन्दा रहूंगी अपनी लड़ाई लडूंगी।

ऑल इंडिया लॉयर्स यूनियन के सचिव शौकत अली कहते हैं, तारिका हयूमन राइट लॉ नेटवर्क के माध्यम से कार्यक्रम में पहुंची थी। उसने कानूनविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के सामने जो कुछ बयां किया वह दिल को दहला देने वाला था। उसकी एक-एक बात अकल्पनीय है। तारिका ने सबके सामने जो कुछ कहा, वही पूंजीपथरा का सच है। हम उसके साथ हैं ၊ इस खबर को कवर किया है श्री राजकुमार सोनी  catchnews से



हिंदी उस्ताद कैच न्यूज़, पत्रिका न्यूज़ और हिमांशू कुमार का ख़ास धन्यवाद करता है


Sunday, 10 April 2016

लेखकीय सत्य ------ माता प्रसाद , पूर्व राज्यपाल

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 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Monday, 4 April 2016

इन्टरनेट से सावधानी और हिम्मत की दीवानी

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 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Saturday, 2 April 2016

वरना कल बहुत देर हो जायेगी! जो आग ये लगा रहे हैं, उसमें हमारे घर, हमारे लोग भी झुलसेंगे

देशभक्त यादगारी अभियान
देश कागज़ पर बना नक्शा नहीं होता…
सच्चे देशभक्तों को याद करो! नयी क्रान्ति की राह चुनो!

भाइयो! बहनो!

जब भी हम देशभक्ति के बारे में सोचते हैं, तो जो पहला नाम हमारे दिमाग़ में आता है वह है शहीदे-आज़म भगतसिंह और उनके साथियों राजगुरू, सुखदेव, चन्द्रशेखर आज़ाद, अशफ़ाक-उल्ला, बिस्मिल का नाम। अंग्रेज़ों की गुलामी और किसानों और मज़दूरों के शोषण के ख़ि‍लाफ़ इन्होंने एक महान लड़ाई लड़ी और उसके लिए बहादुरी के साथ अपने प्राण त्याग दिये।

शहीदे-आज़म भगतसिंह की देशभक्ति

भगतसिंह का मानना था कि देश का अर्थ कोई काग़ज़ी नक्शा नहीं। देश को मातृभूमि या पितृभूमि कहने का अर्थ कोई हवाई सोच नहीं है। माँ या पिता वे होते हैं जो बच्चे को भोजन, वस्त्र और शरण देते हैं। ऐसे में देश और देशभक्ति का अर्थ क्या है? देश के सच्चे माँ और पिता कौन हैं? वे जो देश को रोटी, कपड़ा और मकान मुहैया कराते हैं। ये लोग हैं इस देश के 84 करोड़ मज़दूर, मध्यवर्ग और ग़रीब किसान जो कि महँगाई, बेरोज़गारी, सूखे, अम्बानियों-अदानियों की लूट और सरकारी दमन का शिकार हो आत्महत्याएँ करने को मजबूर हैं। ये वे लोग हैं जो देश में सुई से लेकर जहाज़ तक बना रहे हैं। अगर ‘देश’, ‘राष्ट्र’, ‘भारत माता’, ‘हिन्द’, ‘भारत’ जैसे विशाल शब्दों का कोई सच्चा अर्थ है, तो वह ये ही लोग हैं! भगतसिंह का मानना था की देश का अर्थ ये ही मज़दूर, आम मेहनती लोग और किसान हैं। ऐसे में देशभक्ति का अर्थ क्या हुआ? यह कि इस अन्नदाता, वस्त्रदाता, शरणदाता आबादी को ग़रीबी, बेरोज़गारी, महँगाई और पूँजीपतियों की गुलामी से मुक्ति मिले। शहीदे-आज़म भगतसिंह ने इसीलिए कहा था कि हमारे लिए आज़ादी का मतलब केवल अंग्रेज़ों से आज़ादी नहीं है, बल्कि इस देश के मज़दूरों और किसानों को हर प्रकार की लूट और शोषण से आज़ादी दिलाना है।

संघ परिवार व मोदी के “राष्‍ट्रवाद” की नौटंकी

​आज पूरे देश में कुछ ताक़तें देशभक्ति और राष्ट्रवाद की ठेकेदार बने हुई हैं। ये देशभक्ति की नयी परिभाषा रच रही हैं। इनके अनुसार, जो मोदी सरकार और आर.एस.एस. की आलोचना करे, वह देशद्रोही है। लेकिन दोस्तो ज़रा सोचिये कि भाजपा और संघ परिवार के ये लोग देशभक्ति के ठेकेदार कब से बन गये? क्या आपको याद है कि भाजपा के मन्त्रियों ने कारगिल युद्ध के बाद मारे गये भारतीय सैनिकों के लिए ताबूत की ख़रीद में भी घोटाला कर दिया था? क्या आप भूल गये कि सेना के लिए ख़रीद में दलाली और रिश्वत खाते हुए भाजपा के अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण पकड़े गये थे? क्या आपको याद नहीं कि भाजपा के एक नेता दिलीप सिंह जूदेव कैमरा पर रिश्वत लेकर यह बोलते हुए पकड़े गये थे कि ‘पैसा खुदा नहीं तो खुदा से कम भी नहीं!’ क्या आपको याद नहीं है कि भाजपा की सरकार ने देश में पहली बार सरकारी नौकरियों को ख़त्म करने के लिए विनिवेश मन्त्रलय बनाया था? क्या हम भूल सकते हैं कि 1925 में अपनी स्थापना से 1947 में आज़ादी मिलने तक आर.एस.एस. ने हमेशा आज़ादी की लड़ाई विरोध किया था और इनके नेताओं ने भगतसिंह की शहादत को ‘बेकार की कुर्बानी’ बताया था? क्या आप भूल सकते हैं कि जिस समय भगतसिंह और उनके साथी अंग्रेज़ी हुकूमत से फाँसी की बजाय गोली मारे जाने की माँग करते हुए शहादत को गले लगा रहे थे, उस समय हिन्दू महासभा के सावरकर अण्डमान जेल से अंग्रेज़ी सरकार से माफ़ी माँगते हुए और कभी भी अंग्रेज़ों के विरुद्ध कोई गतिविधि न करने का वायदा करते हुए माप़फ़ीनामे पर माफ़ीनामे लिख रहे थे? क्या आपको पता है कि 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन में जब देश के नौजवान उतर पड़े थे, तो अटलबिहारी वाजपेयी ने आन्दोलन में शामिल लोगों की मुखबिरी अंग्रेज़ों से की थी? आज़ादी के बाद जब कांग्रेस की इन्दिरा गाँधी की सरकार ने नौजवानों और मज़दूरों के आन्दोलन को दबाने के लिए एमरजेंसी लगायी तो आर.एस.एस. के नेता देवरस इन्दिरा गाँधी के नाम मा(फ़ीनामा लिख रहे थे और उन्हें देवीतुल्य बता रहे थे? क्या आपको पता है कि मोदी सरकार ने अपने दो बजटों में देश के 5 फीसदी अमीर लोगों के लिए नीतियाँ बनाते हुए टाटाओं, बिड़लाओं, अम्बानियों, अदानियों को पिछले दस साल में दी गयी 42 लाख करोड़ रुपये की कर माफी को जारी रखा है? वह भी उस समय जब देश में पिछले दो वर्षों में कर्ज़ तले दबकर लाखों ग़रीब किसानों ने आत्महत्याएँ की हैं? क्या आपको पता है कि मोदी सरकार ने शिक्षा के ख़र्च को आधा कर दिया है जिससे कि स्कूलों और कॉलेजों की फीसें इतनी बढ़ जायेंगी कि आप और हम अपने बच्चों को उसमें पढ़ाने का सपना भी नहीं देख पायेंगे? खाने के सामान पर सब्सिडी को मोदी सरकार ने लगभग 10,000 करोड़ रुपया कम कर दिया है; स्वास्थ्य व परिवार कल्याण पर करीब 6000 करोड़ रुपये की कटौती की गयी है, यानी आपको अब सरकारी अस्पताल में दवा और इलाज पहले से दुगुना महँगा मिलेगा; बड़ी-बड़ी देशी-विदेशी कम्पनियों का 1.14 लाख करोड़ रुपये का बैंक कर्ज सरकार ने माफ़ कर दिया है और दूसरी तरफ़ हमारी जेब पर डकैती डालते हुए सारे अप्रत्यक्ष कर बढ़ा दिये गये हैं, जिससे की महँगाई तेज़ी से बढ़ी है; अम्बानियों-अदानियों का 70,000 करोड़ रुपये का पेण्डिंग टैक्स भी माफ़ कर दिया गया है; दूसरी तरफ़ मोदी की “देशभक्त सरकार” ने खाने के सामानों में वायदा कारोबार की इजाज़त देकर सट्टेबाज़ी के दरवाज़े खोल दिये हैं, जिसके कारण दाल 170 रुपया किलो बिक रही है! छोटे व्यापारियों की पार्टी कहलाने वाली भाजपा ने खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की इजाज़त देकर सारे छोटे उद्यमों को तबाह करने का रास्ता खोल दिया है; यहाँ तक कि इन्होंने रक्षा क्षेत्र तक में विदेशियों को घुसने की इजाज़त दे दी है! ये ही लोग पहले प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के विरोध की नौटंकी कर रहे थे क्योंकि इन्हें मध्यवर्ग का वोट चाहिए था। क्या यही है देशभक्ति? क्या यही है राष्ट्रवाद?
सच्चे देशभक्तों को याद करो! नकली “देशभक्तों” की असलियत को पहचानो!

खुद सोचिये भाइयो और बहनो! कहीं ‘देशभक्ति’, ‘राष्ट्रवाद’, ‘भारत माता’ का शोर मचाकर संघ परिवार और मोदी सरकार देश से ग़द्दारी करने के अपने पुराने इतिहास और जनता के ख़ि‍लाफ़ टाटा-बिड़ला-अम्बानी की दलाली करने की अपनी असलियत को ढँकने की कोशिश तो नहीं कर रहे हैं? कहीं ये असली मुद्दों से हमारा ध्यान भटकाने के लिए ये हल्ला तो नहीं मचा रहे हैं? कहीं संघ परिवार और मोदी सरकार इस शोर में महँगाई दूर करने, बेरोज़गारी से आज़ादी दिलाने, सभी खातों में 15 लाख रुपये डालने आदि के वायदे को भुला तो नहीं देना चाहते? सीधे कहें तो अपने आप से पूछिये भाइयो और बहनो-क्या आपको बेवकूफ़ तो नहीं बनाया जा रहा है? सोचिये! आपके असली दुश्मन कौन हैं? इस नफ़रत की सोच से अलग हटकर, ठहरकर एक बार सोचिये कि 2 लाख करोड़ रुपये का व्यापम घोटाला करने वाले, घोटाले के 50 गवाहों की हत्याएँ करवाने वाले, विधानसभा में बैठकर पोर्न वीडियो देखने वाले, विजय माल्या और ललित मोदी जैसों को देश से भगाने में मदद करने वाले देशभक्ति और राष्ट्रवाद का ढोंग करके आपकी जेब पर डाका और घर में सेंध तो नहीं लगा रहे? कहीं ये ‘बाँटो और राज करो’ की अंग्रेज़ों की नीति हमारे ऊपर तो नहीं लागू कर रहे ताकि हम अपने असली दुश्मनों को पहचान कर, जाति-धर्म के झगड़े छोड़कर एकजुट न हो जाएँ? सोचिये साथियो, वरना कल बहुत देर हो जायेगी! जो आग ये लगा रहे हैं, उसमें हमारे घर, हमारे लोग भी झुलसेंगे। इसलिए सोचिये!

क्रान्तिकारी अभिवादन के साथ,

फ़ासीवाद का एक इलाज – इंक़लाब ज़ि‍न्दाबाद!

http://naubhas.in/archives/574
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