Wednesday, 28 January 2015

सुमन कल्याणपुर : संगीत-राजनीति का निर्मम शिकार --- ध्रुव गुप्त






 जन्मदिन पर  विशेष -----
साभार : 

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यूं ही दिल ने चाहा था रोना रुलाना
तेरी याद तो बन गई एक बहाना !


सुमन कल्याणपुर, मुबारक बेगम और शमशाद बेगम हिंदी सिनेमा के सुनहरे दौर की उन बेहतरीन गायिकाओं में थीं जो अपनी आवाज़ और अदायगी की बेपनाह नेमतों के बावजूद उस दौर की संगीत-राजनीति का निर्मम शिकार हो गईं| सुमन जी की रेशमी, कांपती आवाज़ रूमानी और विरह गीतों के लिए सबसे उपयुक्त आवाज़ थी, लेकिन उन्हें अपना जादू चलाने के पर्याप्त मौके नहीं मिले| उन्होंने लता जी और आशा जी की तुलना में बहुत कम गीत गाए, लेकिन बावजूद इसके उनके पचासों गीत हमारी अनमोल संगीत-धरोहर का मूल्यवान हिस्सा है |1954 में अपनी फिल्मी पारी की शुरूआत करने वाली सुमन जी के कुछ कालजयी एकल और युगल गीत हैं - न तुम हमें जानो न हम तुम्हें जानें, दिल गम से जल रहा है जले पर धुआं न हो, यूं ही दिल ने चाहा था रोना रुलाना, मेरे महबूब न जा आज की रात न जा, बुझा दिए हैं खुद अपने हाथों मुहब्बतों के दीये जला के, तुम अगर आ सको तो आ जाओ, सावरिया रे अपनी मीरा को भूल न जाना, ज़िंदगी ज़ुल्म सही ज़बर सही गम ही सही, इतने बड़े ज़हां में अपना भी कोई होता, जूही की कली मेरी लाडली, बहना ने भाई की कलाई पे प्यार बांधा है, शराबी शराबी ये सावन का मौसम, तुम्ही मेरे मीत हो, ना ना करते प्यार तुम्ही से कर बैठे, अजहू न आए बालमा सावन बीता जाए, तुमने पुकारा और हम चले आए, चुरा ले न तुमको ये मौसम सुहाना, दिल ने फिर याद किया बर्क सी लहराई है, अंखियों का नूर है तू अंखियों से दूर है तू, आपसे हमको बिछड़े हुए एक ज़माना बीत गया, आजकल तेरे मेरे प्यार के चर्चे हर जुबान पर, दिल एक मंदिर है, इतना है तुमसे प्यार मुझे मेरे राजदार, तुझे प्यार करते हैं करते रहेंगे, मेरा प्यार भी तू है ये बहार भी तू है !

जन्मदिन पर सुमन कल्याणपुर के लंबे, स्वस्थ और सृजनात्मक जीवन की शुभकामनाएं !

Friday, 23 January 2015

राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय धन का समान बंटवारा हो --- नेताजी सुभाष चंद्र बोस

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 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Thursday, 8 January 2015

मीठी-मीठी बातों से बचना :Nanda

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Nanda was born in a Maharashtrian 8 January 1938 show-business family to Vinayak Damodar Karnataki (Master Vinayak), a successful Marathi actor-director. Her father died when Nanda was a child. The family faced hard times. She became a child artiste and helped them by working in films like Jaggu in the early 1950s. She was tutored at home by renowned schoolteacher and Bombay Scouts commissioner, Gokuldas V. Makhi. Her brother is Marathi film director Jaiprakash Karnataki and Jayashree Talpade is her sister-in-law.
Nanda's paternal uncle V. Shantaram gave Nanda a big break by casting her in a successful brother-sister saga Toofan Aur Diya (1956). She received her first Filmfare Award nomination as Best Supporting Actress for Bhabhi (1957); she claims that the reason she didn't win was because there was lobbying involved. She then played supporting roles to stars like Dev Anand in Kala Bazar, and did small roles in big films like Dhool Ka Phool.
She played the title role in L.V. Prasad's Chhoti Bahen (1959). The movie was a big hit, making her a star. She then played lead roles, such as one of Dev Anand’s heroines in Hum Dono (1961) and Teen Deviyan. Both films were acclaimed as 'hits'. She was the heroine in B R Chopra's Kanoon (1960), a film that was very unusual back then, because it had no songs. She won the Filmfare Best Supporting Actress Award for Anchal (1960).
Nanda was known to encourage newcomers. She signed 8 films with Shashi Kapoor at a time when he was yet to become successful in Hindi Cinema. Their first 2 films as a pair - the critically acclaimed romantic film Char Diwari (1961) and "Mehndi Lagi Mere Haath" (1962) - did not work but the rest were successful at the box office. Shashi, who though had achieved success in English films in 1963 and in 2 Hindi films in 1965, had 5 flops as solo lead hero from his debut in 1961 till 1965 in Hindi films. In Jab Jab Phool Khile (1965), Nanda played a westernised role for the first time and it helped her image. Her favorite song that was famously picturized on her in the film was "Yeh Samaa." Shashi would later declare that Nanda was his favorite heroine. Nanda, too, declared Kapoor as her favourite hero. In early seventies, it was Nanda who suggested Rajendra Kumar, co-producer of The Train, to take Rajesh Khanna as the main lead.
A poster of the Hit film Jab Jan phhol khile starring Nanda and Shashi kapoor
She had another hit film in 1965 with Gumnaam, which helped put her in the top league of heroines.With Manoj Kumar, she further worked in Mera Kasoor Kya Hai. She played heroine roles throughout the 1960s but offers dried up in early 70s. She signed with new leading man Rajesh Khanna in the songless suspense thriller Ittefaq (1969) for which she received a Filmfare nomination as Best Actress. After Khanna became a super-star, he signed two more films with her: the thriller The Train (1970) and a comedy Joroo Ka Ghulam (1972) which became hits. Jeetendra, too, had some hit films with her like Parivar, Dharti Kahe Pukarke Ke; with Sanjay Khan, she had a hit in Beti.
After a small role in Manoj Kumar's Shor (1972), Nanda did few more films such as Chhalia (1973), Naya Nasha (1974), which flopped and she then stopped acting. In 1982, she came back with three successful films, all coincidentally having her play Padmini Kolhapure's mother in Ahista Ahista, Mazdoor and Raj Kapoor's Prem Rog. Then she permanently retired from acting career.
She died in Mumbai on 25 March 2014 at her Versova residence, aged 75, following a heart attack,



Sunday, 4 January 2015

प्रेम और विरह के यशस्वी गीतकार गोपाल दास नीरज ----- ध्रुव गुप्त


जन्मदिन / नीरज (4 जनवरी):
फूलों के रंग से, दिल के कलम से तुझको लिखी रोज पाती !
प्रेम और विरह के यशस्वी गीतकार गोपाल दास नीरज के गीतों के श्रृंगार ने कभी हमारे युवा सपनों को आसमान और परवाज़ बख़्शा था। उनके गीतों में बड़ी खामोशी से चीखती विगत प्रेम की वेदना और टीस कभी हमारी नम आंखों के लिए रूमाल हुआ करती थी। हिंदी कविता के पूर्वग्रहग्रस्त वामपंथी आलोचकों द्वारा निरंतर हाशिए पर रखे गए नीरज जी ने हिंदी गीतों और ग़ज़लों को समृद्ध करने के अलावा मेरा नाम जोकर, गैम्बलर, तेरे मेरे सपने, पहचान, नई उमर की नई फसल, पतंगा, चा चा चा, दुनिया, शर्मीली, प्रेम पुजारी, छुपा रुस्तम जैसी फिल्मों के गीतों को जो तेवर, कोमलता, विचार और संस्कार दिए, वह अभूतपूर्व था। अगाध प्रेम और शाश्वत विरह के इस महाकवि के जन्मदिन पर उनके लंबे और सृजनशील जीवन की अशेष शुभकामनाएं, उन्हीं की पंक्तियों के साथ !

 "प्यार अगर थामता न पथ में ऊंगली इस बीमार उमर की
हर पीड़ा वेश्या बन जाती, हर आंसू आवारा होता !

मन तो मौसम सा चंचल है, सबका होकर भी न किसी का
अभी सुबह का कभी शाम का, अभी रुदन का अभी हंसी का
और इसी भौरे की गलती क्षमा न यदि ममता कर देती
ईश्वर तक अपराधी होता, पूरा खेल दुबारा होता !

हर घर-आंगन रंगमंच है, औ' हर एक सांस कठपुतली
प्यार सिर्फ वह डोर कि जिसपर नाचे बादल, नाचे बिजली
तुम चाहे विश्वास न लाओ लेकिन मैं तो यही कहूंगा
प्यार न होता धरती पर तो सारा जग बंजारा होता !
"

Thursday, 25 December 2014

Bharat Ratna awards ---Markandey Katju

https://www.facebook.com/justicekatju/posts/888746391165908?pnref=story

Bharat Ratna awards
The media are full of the award of Bharat Ratna to Pt. Madan Mohan Malviya and Atal Behari Vajpayi. Many people have applauded it.
I regret I cannot join in this adulation. In my opinion neither of them deserved the award.
What was there so great about Vajpayee ? And what was there in Malviya ? It is said that he set up the Benaras Hindu University. But how can a University be Hindu or Muslim ? A University is something universal. In fact setting up Aligarh Muslim University and Benares Hindu University was part of the British policy of divide and rule.
The persons who in my opinion should be awarded Bharat Ratna are :
(1) Mirza Ghalib
When I first spoke of this some people said : why not to Gautam Buddha and Ashoka ? My answer is : Ghalib is modern, not ancient or medeival, and he has taken literature to the highest pinnacle. Also, posthumous awards have frequently been given, e.g. to Dr. Ambedkar and Sardar Patel.
(2) Dr. Dwarkanath Kotnis, for his outstanding sacrifice to help the Chinese people when they were fighting the Japanese invaders. This brought laurels to India, showing that we are not a people concerned only about ourselves, but also think of the welfare of other nations
(3) Sharat Chandra Chattopadhyaya, for his powerful attack against the caste system and womens' oppression in his stories and novels
(4) Subramania Bharti, for his nationalism and powerful support for womens' emancipation in his poetry
(5) P. Sainath, for his courageous journalism, exposing the truth of the social and economic realities in India, e.g. farmers suicides.
But who cares for my opinion ?

Tuesday, 23 December 2014

वैचारिक सैद्धांतिक लोग मनमानी तो होने नही देंगे -----अरविन्द विद्रोही

पुराने समाजवादियों का जुटान नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार के छह माह के कार्यकाल में किये गए कार्यों के विरोध स्वरुप / वायदाखिलाफी के विरोध में हुआ । इसी लोकसभा चुनावों में कुछ समाजवादी नेताओं ने अपने बडबोलेपन से खूब फायदा पहुँचाया था भाजपा और नरेन्द्र मोदी को । उनके दावे - बडबोलेपन के विपरीत देश की जनता ने मोदी को अपना प्रतिनिधी चुना ।।
समाजवादियों को जो सक्रीय राजनीति में हैं , चुनावी दंगल में आजमाइश करते हैं उनको सोचना होगा कि मोदी ने ऐसा क्या किया कि वे चारो खाने चित्त हो गए थे ? और यह भी कि उनके अपने पाले में खड़े अन्य खिलाडी की चाल कहीं उनको ही पटखनी तो नही दे रही है ?
एक यथार्थ जान और मान लीजिये कि भाजपा के लोगों की मेहनत से और बयानों से बहुसंख्यक हिन्दू समाज गोलबंद नही होता है , हिन्दू समाज गोलबंद होता है तो गैर भाजपाई दलों के द्वारा अल्पसंख्यकों के प्रति प्रदर्शित अतिरेक समर्पण- अपनत्व भाव से ।
खैर अभी भी समझना मुश्किल है क्यूंकि राज्यों में सत्ता के सिंघासन पर आरुढ़ समाजवादी नेतृत्व समाजवादी विचारधारा के अनुपालन से अधिक अल्पसंख्यक तुष्टिकरण और सिर्फ और सिर्फ भाजपा - मोदी विरोध की दुंदुभी बजाने में तल्लीन है ।।

ध्यान रहे एक जुट हो रहे पुराने समाजवादी नेतृत्व को कि उनके अतिरिक्त भी समाजवादी सक्रीय राजनीति में हैं । जिनमे से कई भाजपा- मोदी के साथ हैं तो कई अभी ना उनके साथ हैं और ना ही भाजपा- मोदी के । वैसे भी वर्तमान परिवेश में पलड़ा भारी है भाजपा- मोदी का और वो अपने साथ सबका जुटान बनाने में लगें हैं और पुराना जनता परिवार क्या एक साथ हो पायेगा ??
क्या वैचारिक दृष्टि से समृद्ध डॉ लोहिया के पुराने नए लोगों के लिए कोई स्थान है इस हो रहे जुटान में ?? वैचारिक सैद्धांतिक लोग मनमानी तो होने नही देंगे इसलिए उनको अंगीकार करना दुष्कर है , है ना दुष्कर ??

भाजपा- मोदी की दृष्टि बहुत पैनी है और कार्य कुशलता और लगन भी । बयानों की धार के साथ पुनः जनता को आकर्षण में बाँधने की योजना भी और आपकी तैयारी क्या है ??
अब तो योग्य व्यक्तियों को सत्ता और संगठन की जिम्मेदारी सौंपनी चाहिए समाजवादी नेतृत्व को -----
अरविन्द विद्रोही

https://www.facebook.com/arvind.vidrohi/posts/793298554039730 

Friday, 19 December 2014

Om Prakash (19 December 1919 – 21 February 1998) ---Sanjog Waltar


Om Prakash (19 December 1919 – 21 February 1998) was an character actor. He was born in Jammu as Om Prakash Chibber. He used to play the role of Kamla in the stage play by the famous Dewan Mandir Natak Samaj Koliwada. Starting his career in 1942, he was a popular supporting actor from the 1950s until the 1980s. He was one of the elite of the film industry. Some of his performances were so memorable that the lead actor in the film attributed the success of the film to him.
Om Prakash played the leading man in films like Dus Lakh, Annadata and Charandas 'Sadhu aur Shaitan'. His pivotal roles in the films Dil Daulat Duniya, Chupke Chupke, Julie, Joroo Ka Ghulam, Aa Gale Lag Jaa, Pyar Kiye Jaa and Buddha Mil Gaya are considered to be among his best along with Daddu in Namak Halaal and De Silva in Zanjeer. His roles in 'Sharabi', 'Bharosa', 'Tere Ghar Ke Samne', 'Mere Humdum Mere Dost', 'Loafar', 'Dil Tera Diwana' were also appreciated.He is known for his roles in comedy films. One of his best performances in his later years were Naukar Biwi Ka, Sharaabi (1984) and Chameli Ki Shaadi, where he played a role that was pivotal for the movie.Om Prakash Chibber was born in Jammu on 19 December 1919. He was fascinated by theatre, music and films. He started taking lessons in classical music when he was just twelve and was recognised as a master in no time.He joined All India Radio in 1937 on a monthly salary of Rs 25. He was known as “Fateh Din”, a radio personality and his programmes made him popular all over Lahore and Punjab.
He was regaling people at a wedding one day when the well-known film-maker Dalsukh Pancholi spotted him and asked to see him in his Lahore office. Pancholi gave Prakash his first break as an actor in a film called Daasi. He was paid only Rs 80 but the film earned him the kind of recognition that would give him a means of livelihood for a lifetime. It was his first major role; he had played a bit role in Sharif Badmash, a silent film. He followed his good work in Daasi with Pancholi’s Dhamki and Aayee Bahar and became a force to reckon with.
Soon after the Partition he came to Delhi and then to Bombay (now Mumbai). Baldev Raj Chopra noticed his talent when he was a film journalist and critic; he urged Prakash to carry on with his acting career. He was sure Om Prakash had the talent to prove himself as a versatile actor. The actor had to face some struggle initially. He got his first big break in Bombay as a villain in a film called Lakhpati. It won him acclaim and got him more “meaty” roles in films like Lahore, Char Din and Raat Ki Rani. It was during this phase in his career that he did Azaad with Dilip Kumar, Sargam with Raj Kapoor and Miss Mary, Bahar, Pehli Jhalak, Asha and Manmauji with Kishore Kumar followed by Howrah Bridge with Ashok Kumar and then Tere Ghar Ke Samne with Dev Anand. He was marked out for his performance in both films in spite of the presence of powerful star personas like Dilip Kumar, Raj Kapoor, Ashok Kumar, Kishore Kumar and Dev Anand. He had developed a style of his own, a style which was going to take him places, make him a big name in the world of film entertainment for the next forty years.
Om Prakash soon became a household name. He was good in almost every character he played. He was the comedian, the family man burdened with problems, the munshi, the alcoholic fallen on bad days because of the evil designs of the villain, the nagged husband, the old man in love, the wily politician and the big brother with a heart of gold. He played an assortment of characters with the same ease and had some of the best directors opting for him every time they had a role which they felt only he could play.
Om Prakash was versatile actor with 307 films to his credit. One can never forget his comic performances in Howrah Bridge, Dus Lakh (he won his first major award for this performance), Pyar Kiye Jaa, Padosan, Sadhu Aur Shaitaan, Dil Daulat Duniya, Chupke Chupke, Namak Halaal, Gol Maal and Chameli Ki Shaadi. His performance as Dilip Kumar’s elder brother in Gopi gave his career a new impetus. He proved that he could play mature roles with the same ease, the same depth: Films like Chacha Zindabad, Khandan, Haryali Aur Raasta, Dil Apna Aur Preet Paraayi, Pati Patni, Neend Hamari Khwab Tumhare, Mere Hamdam Mere Dost, Annadata, Ek Shriman Ek Shrimati, Doli, Chirag, Amar Prem, Aankh Micholi, Ek Hasina Do Diwane, Anuraag, Zanjeer, Sagina, Aa Gale Lag Jaa, Loafer, Roti, Julie, Khushboo, Lawaaris, Bandish, Sharaabi and Chameli Ki Shaadi.
Om Prakash had special rapport with Amitabh Bachchan and both worked in many successful fims spanning from Parwana to Sharaabi.He lived in Union Park, Chembur, a suburb of Mumbai. The actor who was always so full of life was still full of life till just two days before his death. He knew he was not well. He knew he was suffering from complications but he never gave up his zest for life till his heart betrayed him. He kept calling friends to play a game of rummy or just chat. He had an office at the Roop Tara Studios which was only used for “rummy sessions” and “chat sessions”. Then, some years ago, he shifted his office to the suburbs to make it more convenient for his friends.He attended this office regularly till his health started failing. He was confined to his bungalow, where he suffered a heart attack. He was taken to the Lilavati Hospital, Mumbai, suffered a second heart attack and went into a coma from which he did not recover. He died on 21 February1998, aged 78.

Wednesday, 17 December 2014

माओवादी भाजपा की मदद कर रहे हैं -----Jagadishwar Chaturvedi

''अभद्र वामलेखकों'' का कुवाम-खेल

                     
            मैं रायपुर साहित्यमेला में शामिल क्या हुआ,हिन्दी के ''अभद्र वामलेखक'' बागी हो गए! जो लेखक रायपुर गए उनके बारे में फेसबुक पर ये ''अभद्र वामलेखक'' अतार्किक और असभ्य बातें लिखने लगे,  असद जैदी-मंगलेश डबराल आदि ने तो लेखकीय गरिमा को नरक के हवाले कर दिया !सारी शिष्टता-भद्रता की सीमाएं तोड़ दीं। फेसबुक पर गालियां दीं,अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया। हम बलिहारी हैं उन महान सभ्य जनवादी लेखकों के जिन्होंने इस तरह की असभ्यता को अपनी फेसबुक वॉल पर प्रश्रय दिया,प्रच्छन्न और प्रत्यक्ष समर्थन दिया !!
     गालियां देना,अश्लील,अशालीन भाषा में लिखना ''अभद्र वामलेखकों '' की विशेषता है। इस '' अभद्र वामलेखकों '' के सहयोगी हैं ''भद्रवाम लेखक'', जो ''अभद्रलेखकों'' की अभद्रता को मौन समर्थन दे रहे हैं। फेसबुक पर अभद्रता का 'वाम-खेल' असल में वाम के लिए नुकसानदेह साबित हुआ है । इससे हिन्दी लेखकसमाज कलंकित हुआ है।   ''अभद्र वामलेखक'' ,अपनी 'कु-कलम' से रायपुर साहित्य मेला में शामिल होने वाली मैत्रेयी पुष्पा,रमणिका गुप्ता आदि को सरेआम अपमानित कर रहे हैं । जो लेखक रायपुर गए उनमें से अधिकांश का लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष लेखन में महत्वपूर्ण योगदान है। इनमें से अधिकांश का साम्प्रदायिकता आदि के खिलाफ लेखन के स्तर पर शानदार रिकॉर्ड  है । किसी भी लेखक ने रायपुर साहित्य मेला में आरएसएस और उसकी विचारधारा का पक्ष नहीं लिया,किसी के पैनल में कोई संघी लेखक शामिल नहीं था,तकरीबन सभी बड़े लेखकों ने खुले तौर पर अपनी बातें कहीं,संघ की भी आलोचना की।  इससे भाजपा और संघ को वैधता नहीं मिलती। बल्कि हमारा यह मानना है कि लेखकों को देश में सभी स्थानों पर बोलने-लिखने और प्रतिवाद करने की आजादी होनी चाहिए और जहां पर यह आजादी नहीं है या बाधित होती है वहां पर प्रतिवाद किया जाना चाहिए।  
    किसी भी साहित्यिक आयोजन में आना-जाना लेखक का लोकतांत्रिक हक है, इस हक को कुत्सा प्रचार के जरिए छीनने का किसी को हक नहीं है।लेखक की विचारधारा कुछ भी हो ,लेकिन लोकतंत्र में लेखक के हकों को छीनने या उस पर हमला करने का किसी को हक नहीं है, जिस तरह लोकतंत्र में प्रतिवाद करने का हक है ,उसी तरह लोकतंत्र में शिरकत करने और शिरकत करके प्रतिवाद करने का भी हक है।
    शिरकत करके प्रतिवाद करना लोकतंत्र का आदर्श प्रतिवादी रुप है,इसके आदर्श हैं संसद और मजदूर आंदोलन। मसलन् ,संसद में विभिन्न दलों के सांसद शिरकत करके प्रतिवाद करते हैं,मजदूर आंदोलन में आरएसएस के मजदूर संगठन के साथ वाम मजदूर संगठन मिलकर प्रतिवाद करते हैं, वे जब मिलकर प्रतिवाद करते हैं तो यह नहीं सोचते कि संघ फासिस्ट है, उसके संगठन के साथ मिलकर लडाई नहीं लड़ेंगे। हाल ही में कई देशव्यापी हड़तालें वाम मजदूर संगठनों ने संघ संचालित भारतीय मजदूर संघ के साथ मिलकर की हैं।
   सवाल यह है  संघ के मजदूर संगठन के साथ वाम क्यों जाता है ? कम से कम हमारे लेखकों को संसद और मजदूर आंदोलन से सीखना चाहिए कि किस तरह अपने से भिन्न विचारधारा के लोगों के साथ आचरण करें ।वाम मजदूर संगठन कभी संयुक्त लड़ाई में अन्य संगठन के शामिल न होने पर उस पर  हमले नहीं करते। उस संगठन के नेता का चरित्रहनन नहीं करते, गालियां नहीं देते। लेकिन अफसोस है ये ''अभद्र वामलेखक'' गालियां देते हैं, गालियां लिखते हैं,लेखक का अपमान करते हैं। गालियां देना ,अपमान करना लेखक की नहीं, लंपटों की प्रवृत्ति है। मैं कई सालों से फेसबुक पर हूँ और असदजैदी-मंगलेश डबराल की तरह कभी असभ्यभाषा का किसी के खिलाफ इस्तेमाल नहीं किया। मैं हमेशा सम्मान के साथ पेश आता हूँ और संवाद करता हूँ। अपने विरोधी का सम्मान करना और उसके साथ शिरकत करना,यह मैंने जेएनयू में राजनीति करते हुए सीखा। लेकिन दुर्भाग्यजनक है कि असदजैदी टाइप "असभ्यलेखक" जेएनयू में रहकर भी सभ्यता नहीं सीख पाया, उसने वहां से गालियां सीखीं ,अहंकार में रहना सीखा, मेल-मिलाप की संस्कृति की बजाय असभ्यभाषा का सार्वजनिक मीडियम में प्रयोग करना सीखा। मैं असद जैदी को उस समय से जानता हूँ वह जब जेएनयू में एमए उर्दू में पढ़ते थे, वे जिस संगठन के सदस्य थे ,मैं उसकाअध्यक्ष हुआ करता था और यह नेतृत्व मैंने अवसरवादी तरीकों से नहीं बल्कि संघर्षों में शिरकत करके हासिल किया था। जनाब मंगलेश डबराल को मैं लेखक के नाते जानता हूँ लेकिन असभ्यलेखक के रुप में मैंने उनको पहलीबार फेसबुक पर रायपुर मेले के प्रसंग में देखा है। मंगलेश डबराल जिस तरह के लेखक हैं,उनका असभ्य आचरण अक्षम्य अपराध है,मैं आसानी से असद जैदी-मंगलेश डबराल टाइप लेखकों को गालियां दे सकता हूँ ,लेकिन मजबूर हूँ कि मैं असभ्य नहीं हूँ। असभ्य होना आसान है,सभ्य होना और आचरण में  सभ्यता को बचाए रखना बेहद मुश्किल काम है।मंगलेश डबराल-असद जैदी टाइप लेखक जब गालियां देने लगें तो समझो कहीं बहुत गहरे तक लंपटसमाज ने हमारे लेखकों को अपनी असभ्यता से प्रभावित कर लिया है। हमें इस समस्या की जड़ों को खोजना चाहिए।
    लेखक के नाते हम ध्यान रखें फेसबुक बेहद ताकतवर माध्यम है,यह कम्युनिकेशन का माध्यम है, यह असामाजिकता और लंपटई का माध्यम नहीं है। जिन असभ्य लेखकों को असभ्यता दिखाने की आदत है वे जरा प्रिटमीडिया में किसी लेखक पर गालियां लिखकर दिखाएं ,मैं फिर कह रहा हूँ मंगलेश डबराल-असद जैदी जैसे लेखक किसी अखबार में किसी लेखक को गालियां लिखकर दें . फिर देखते हैं उस संपादक की क्या गति होती है और इन कलमलंपटों का क्या हश्र होता है ! फेसबुक पर असभ्यभाषा में लिखना सामाजिक अपराध है।
              ''अभद्र वाम लेखक'' की लाक्षणिक विशेषता है  वह न तो मजदूरों से सीखता है और न बुर्जुआजी से सीखता है, उसका प्रेरणा स्रोत तो लंपटसमाज है। लंपटसमाज में गालियां देना अलंकार है,शेखी बघारना ,अहंकार में रहना, अन्य लेखकों को हेय दृष्टि से देखना, असभ्य भाषायी पदबंधों में गरियाना उसकी नेचर है। फतबे जारी करना,कौन लेखक है और कौन लेखक नहीं है,यह तय करना वस्तुतः लंपटसमाज से उधार ली गयी साहित्यिक दादागिरी है। लंपटसमाज में लंपटों के छोटे-छोटे समूह होते हैं और वे तय इलाकों में सक्रिय रहते हैं। ठीक यही दशा''अभद्र वाम लेखकों'' की है। ''अभद्र वाम लेखक'' अपने लघुसमाज को 'साहित्य समाज'कहते हैं, असल में यह साहित्य समाज न होकर ''लंपट साहित्य समाज'' है , दलाली ,अवसरवाद,चमचागिरी इसके सामान्य लक्षण हैं। इन ''अभद्र वामलेखकों'' को सहज ही कांग्रेस -भाजपा के नेताओं के चैम्बरों में राजनीतिक चरण चुम्बन लेते सहज ही देखा जा सकता है। यहां तक प्रमाण है कि इण्डियन एक्सप्रेस की एक जमाने में हड़ताल तुड़वाने में ये ''अभद्रवामलेखक'' अग्रणी भूमिका निभा चुके हैं।
   दुखद बात यह है कि ''वाम अभद्रलेखक'' जब गाली देते हैं तो ''भद्र वामलेखक''चुपचाप रहते हैं, गालियां सुनकर चुप रहना,गाली देने वाले की निंदा न करना भी प्रच्छन्न अभद्रता है। ये वे लोग हैं जो लेखक संघ चला रहे हैं!  हम अभी तक समझ नहीं पाए हैं कि यह कौन सा जनवाद है जो लेखकों को गाली देने को प्रश्रय देता है। अपमानित करने को महानता समझता है।लेखकों पर निजी हमले की रक्षा में यदि लेखक संघ के नेतागण खड़े रहेंगे तो यह तय है कि इससे जनवादी लेखक संघ-प्रगतिशील लेखक संघ भी कलंकित होंगे। मेरा जनवादी लेखक संघ में काम करने का शानदार रिकार्ड रहा है ,स्थापना के समय मैं जेएनयू शाखा का सचिव था, कोलकाता आने पर कोलकाता जिला सचिव रहा हूँ,इस संगठन को लाखों रुपये चंदा भी एकत्रित करके दिया है,पचासों लेखकों को इस संगठन से जोड़ा है। लेकिन मैंने कभी अपनी आँखों के सामने किसी लेखक को अपमानित नहीं होने दिया। किसी को असभ्यता नहीं करने दी। हमने यह नहीं सीखा कि जो असहमत हो उसे गालियां दो, जो हमारी न माने उसके बारे में मूल्य-निर्णय करो।
   जनवादी लेखक संघ बुनियादी तौर पर लेखकों के हकों के लिए प्रतिबद्ध संगठन है,वह राजनीतिक संगठन नहीं है, वह माकपा की राजनीतिक लाइन के अनुरुप लिखने-पढ़नेवालों का संगठन नहीं है, उसमें विभिन्न विचारधारा के लेखक हैं। रायपुर साहित्यमेला के प्रसंग में '' अभद्र वामलेखकों” के नजरिए की जनवादी लेखक संघ के कुछ लेखकों ने जिस तरह हिमायत की है वह जनवादी लेखक संघ के बुनियादी लक्ष्य का उल्लंघन हैं। यदि हमारी बात कोई लेखक न माने तो उस पर निजी हमले करो। इसे साहित्यिक गुण्डागर्दी कहते हैं।लोकतंत्र में यह संभावना सब समय रहती है कि लेखकों के अलग-अलग नजरिए हों और वे अलग-अलग ढ़ंग से एक ही मसले पर सोचें और आचरण करें,उनके वैचारिक सरोकारों में भी अंतर हो सकता है, लेकिन यह किस तरह का जनवाद है जो जनवादी लेखक संघ ,प्रगति लेखक संघ और जसम के लेखक संगठन के कुछ सदस्य फेसबुक पर व्यक्त कर रहे हैं कि जो रायपुर गया वह भाजपा का हो गया, भाजपा की दलाली करने लगा।
      देखें सच क्या है ? मसलन् मोदी के आगमन को लेकर फेसबुक पर लोकसभा चुनाव के दौरान और उसके बाद जितनी  पोस्ट मैंने संघपरिवार और मोदी की आलोचना में लिखी हैं,संभवतः किसी और लेखक ने नहीं लिखीं। अब आप जरा इन दोनों लेखकों ( मंगलेश डबराल और असद जैदी) या जनवादी लेखक संघ या प्रगतिशीललेखक संघ के नामी लेखकों की फेसबुक वॉल पर जाएं और देखें कि इनका फेसबुक पर मोदी के प्रति क्या रवैय्या  है ? मोदी एंड कंपनी जब इंटरनेट से बमबारी कर रही थी,मंगलेश डबराल-असदजैदी चुपचाप बैठकर आनंद ले रहे थे। यह सवाल तो उठता ही है कि लेखक के नाते मोदी के हमलों के खिलाफ इन लेखकों ने फेसबुक पर क्यों नहीं लिखा ? जब जनता पर मोदी एंड कंपनी हमला कर रही थी उस समय चुप रहना ,उसके उठाए मुद्दों पर न बोलना लोकतंत्र की मदद करना है या मोदी की मदद करना है ? यह अचानक नहीं है कि जिन इलाकों या राज्यों में माओवादी सक्रिय हैं वहां पर वामपंथी आंदोलन सबसे ज्यादा क्षतिग्रस्त हुआ है और कांग्रेस-भाजपा सबसे ज्यादा लाभान्वित हुए हैं। पश्चिम बंगाल में नक्सलबाडी आंदोलन से सबसे ज्यादा लाभ कांग्रेस को मिला ,माकपा नुकसान में रही। छत्तीसगढ़ में भाजपा लाभान्वित हो रही है,आंध्र में कांग्रेस लाभान्वित हुई,यह अचानक नहीं है कि छत्तीसगढ़ में कोई बड़ा भाजपानेता माओवादियों का शिकार नहीं बना,स्थिति यह है कांग्रेसनेता दिग्विजय सिंह ने माओवादियों से कांग्रेस में शामिल होने की अपील की है।
    यह नियम है अराजकता का ,शासकवर्ग हमेशा अपने पक्ष में इस्तेमाल करता है। माओवादी हिंसा और अराजकता की भी यही मूल परिणति है, इसलिए रमन सरकार को माओवादियों से बुनियादी तौर पर कोई परेशानी नहीं है,क्योंकि समग्रता में माओवादी भाजपा की मदद कर रहे हैं। माओवादी हिंसा और राजनीति की किसी भी तर्क से हिमायत संभव नहीं है। मूलतःऐसे किसी भी संगठन की हिमायत नहीं की जा सकती जिसका हमारे देश के संविधान में विश्वास न हो। हमें इस सवाल पर सोचना चाहिए कि माओवादी राजनीति से क्या वामपंथ का विकास होगा या वामपंथ क्षतिग्रस्त होगा ? अब तक का अनुभव बताता है कि माओवादी राजनीति से वामपंथ क्षतिग्रस्त हुआ है। उनके राजनीतिक एक्शन बुर्जुआदलों की मदद करते रहे हैं और लोकतांत्रिक आंदोलन को कमजोर करते रहे हैं। पश्चिम बंगाल में माओवादी सीधे माकपा को निशाना बनाते रहे हैं।नक्सलबाड़ी से लेकर लालगढ़ का अनुभव इसकीपुष्टि करता है। 
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Tuesday, 16 December 2014

अच्‍छा इंसान होना बिलकुल दूसरी बात ---Manisha Pandey

एक दिन मां ने फोन पर कहा कि फला अंकल आए थे। वो कह रहे थे कि मनीषा फेसबुक पर लेफ्ट के खिलाफ लिखती रहती है। कुछ शिकायती अंदाज में कि भला बताइए कॉमरेड, आपकी बेटी ही ऐसा लिख रही है।
पापा ने जवाब दिया, "लेफ्ट के खिलाफ नहीं, लेफ्टिस्‍टों के खिलाफ लिखती है। मुझे पता है उसके विचार नहीं बदले। वो मेरी बेटी है।"
इतना गर्व। बात चाहे पॉलिटिकल कमिटमेंट की हो या मेरी लाइफ स्‍टाइल की। पापा हमेशा मेरा बचाव करते हैं और मेरे पक्ष में खड़े रहते हैं। कोई कुछ भी बोले। ये मुमकिन नहीं है कि वो किसी की बातों में आ जाएं। "जनाब, आप कितना जानते हैं उसे। वो मेरी बेटी है। मैं उसकी पैदाइश के दिन से उसे जानता हूं।"
मैं भी पापा की नहीं, बल्कि अपनी पैदाइश के दिन से तो उन्‍हें जानती ही हूं। मुझे पूरा लेफ्ट संसार कितना भी चिरकुट लगे, मैं पापा से यही कहती हूं कि I still believe in this ideology. वजह साफ है। ऐसा नहीं कि पूरी दुनिया में इस विचारधारा का क्‍या हो रहा है, क्‍या लिखा जा रहा है, क्‍या प्रैक्टिस चल रही है, सब मुझे पता है। मैं सब पढ़ रही हूं या काफी अपडेट हूं। नहीं। मुझे कुछ भी नहीं मालूम। अपडेट रहने का वक्‍त नहीं है मेरे पास। मेरी चिंताएं, सवाल दूसरे हैं। मेरी ऊर्जा फिलहाल कहीं और खर्च हो रही है। लेकिन मैं पापा से हर बार यही कहती हूं कि क्‍योंकि मैं उनका दिल नहीं तोड़ना चाहती। मुझे मालूम है कि 65 साल के उस बूढ़े शख्‍स को जिंदा रहने के लिए ये विश्‍वास चाहिए कि लेफ्ट इररेलेवेंट नहीं हुआ है। न्‍याय की विचारधारा जिंदा है। कि ये दुनिया सुंदर होगी एक दिन। लोग काम कर रहे हैं इसके लिए। बदलाव के कारखाने चालू हैं। मुझे भी लगता है, ठीक ही होगा, जो होगा।
लेकिन मेरी जिंदगी का सबक फिलहाल ये है कि राइट-लेफ्ट होना और बात है और अच्‍छा इंसान होना बिलकुल दूसरी बात। वाम मार्ग से तनिक भी सो कॉल्‍ड विचलन देखकर आपका घर-खानदान, जीवन गालियों से तौल देने वाले वाम सिपाही भी बहुत क्रूर, तंगदिल मनुष्‍य हो सकते हैं। बल्कि हैं ही। उनकी पॉलिटिक्‍स जो भी हो, मुझे ऐसे लोगों से सिर्फ डर लगता है।
मेरे लिए एक ही बात के मायने हैं फिलहाल। कि मेरे पिता का दिल न टूटे। प्‍यार का भरोसा बना रहे। कि सबके दिलों की परवाह की जाए। थोड़ा उदार हों, थोड़ा अच्‍छे, थोड़े मानवीय रहें, केंद्र में चाहे जिसकी भी सरकार रहे। कांग्रेस की रहे या बीजेपी की। पापा की, लेफ्ट की विचारधारा ने मुझे जिंदा नहीं रखा है। इस विश्‍वास ने रखा है कि वो मुझसे प्‍यार करते हैं। मेरे साथ खड़े हैं।
मेरी मां भी लेफ्टिस्‍ट नहीं हैं। मुझे सबसे ज्‍यादा प्‍यार करने वाली, हर संकट में मेरा हाथ पकड़ने वाली सहेलियां भी लेफ्टिस्‍ट नहीं हैं। लेकिन अच्‍छी हैं, प्‍यारी हैं। दिल का ख्‍याल रखती हैं। वो मेरे और और मैं उनके दिल का। बाकी लेफ्ट का क्‍या हो रहा है, क्‍या होने वाला है, पता नहीं। पता करने की फुरसत भी नहीं है मेरे पास। मैं तो ये सोच रही हूं कि कल पल्‍लवी आएगी तो उसके लिए गाजर का हलुआ बनाऊंगी।

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