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Wednesday, 19 December 2018

यू पी में कांग्रेसविहीन गठबंधन की संभावना ------ नदीम

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नई दिल्ली: पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस द्वारा किए गए शानदार प्रदर्शन से हर तरफ यह कयास लगाए जा रहें थे कि उत्तर प्रदेश में बनने वाले महागठबंधन में उसकी दावेदारी मजबूत हो गई है. लेकिन ऐसा दिखाई नहीं दे रहा है.


बता दें कि बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी ने लोकसभा चुनाव के लिए बनने वाले गठबंधन से कांग्रेस को बाहर करने का विचार बना लिया है. ये ही नहीं दोनों ही पार्टी में सीटों के बंटवारे का फ़ॉर्मूला लगभग तय माना जा रहा है. बताया जा रहा है कि इसका औपचारिक ऐलान बसपा सुप्रीमो मायावती के बर्थडे यानी 15 जनवरी के दिन किया जा सकता है.

सीट बंटवारे के इस फ़ॉर्मूले पर दोनों ही पार्टियों के नेताओं में आपसी सहमती :
आपको बता दें कि सीटों के बंटवारे के जिस फ़ॉर्मूले पर हामी बन पाई है उसके अनुसार इस गठबंधन में अजीत सिंह की रालोद को भी शामिल किया जा सकता है. लोकसभा चुनाव में भाजपा सरकार को सत्ता से हटाने के लिए बसपा 38, सपा 37 और रालोद तीन सीटों से चुनावी रण में उतर सकती है. ये ही नहीं सपा अपने कोटे की कुछ सीटें भी अन्य छोटी पार्टी जैसे निषाद पार्टी और पीस पार्टी को दे सकती है. कहा जा रहा है कि सीट बंटवारे के इस फ़ॉर्मूले पर दोनों ही पार्टियों के नेताओं में आपसी सहमती बन गई है.

राहुल के उम्मीदावर पद को लेकर सपा अध्यक्ष अखिलेश की न :

कहा जा रहा है कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को गठबंधन का पीएम चेहरा मानने से अखिलेश यादव ने साफ इंकार कर दिया है. अखिलेश का कहना है कि महागठबंधन को लेकर सिर्फ बात चल रहीं है. शरद पवार, ममता बनर्जी और चंद्रबाबू नायडू जैसे अन्य लोग भी इसकी कोशिश कर चुके है. ये जरूरी नहीं की सभी दलों के लोग एक ही नाम पर सहमत हों. फिलाहल महागठबंधन ने अभी कोई मूर्त रूप नहीं लिया है तो राहुल को पीएम कैंडिडेट बताने का प्रस्ताव  नहीं है.

बसपा सुप्रीमो मायावती का जन्मदिवस होगा खास 
बता दें कि मायावती का जन्मदिन लोकसभा चुनाव के लिहाज से काफी मुख्य साबित हो सकता है. मायावती का जन्मदिन 15 जनवरी को उस दिन गठबंधन का ऐलान किया जा सकता है. बसपा मायावती के जन्मदिवस को कल्याणकारी दिवस के रूप में मना सकती है.



https://news4social.com/no-coalition-for-congress-in-sp-and-bsp-for-seat-sharing-formula/

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 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Thursday, 28 December 2017

राहुल गांधी जी की गुजरात वाली गलती क्यो दुहराने पर आमादा हैं।अखिलेश जी! ------ Mahesh Donia

Mahesh Donia
28-12-2017
आप ही भ्रम में थे मित्रवर वरना अखिलेशजी ने तो हर जगह अपना हिंदुत्ववादी मुस्लिम-दलित विरोधी चेहरा दिखाया है. ये तो आप ही थे जो उनके भोलेपन पर लहालोट हुए जाते थे. आप ही क्यों कुछ समय पहले तो कुछ सो-कॉल्ड अम्बेडकरवादी यवा अखिलेश भैया से बहुजनो का नेतृत्व सँभालने के लिए मनुहारी कर रहे थे.
उधर लालू भी अपने कहते नहीं थकते की वो भी हिन्दू हैं.
आप लोग ग़लत दरवाजा खटखटा रहे हैं....अखिलेश जी!रेगिस्तान में तपती गर्मी में जैसे हिरन गर्मी की ऊष्मा से उपजे रेखाओं को पानी समझ दौड़ता रहता है पर वह पानी नही पाता वैसे ही आपके लिए हिंदुत्व मृग मरीचिका साबित होगा और आप 2019 एवं 2022 में हिंदुत्व रूपी मृग मरीचिका में झुलस के रह जाएंगे पर सत्ता रूपी पानी नही मिलेगी।.............................
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गजब हैं आप भी श्री अखिलेश यादव जी!
भाजपा के हिंदुत्व का मुकाबला आप सपाई हिंदुत्व से करेंगे?
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क्या अखिलेश जी!आप भी हद कर देते हैं।अब आप भाजपा के हिंदुत्व का मुकाबला 2019 में सपाई हिंदुत्व से करेंगे?मैंने आपका यह बयान जनेश्वर मिश्र पार्क घूमते समय पढा।मै आपके इस बयान "हिंदुत्व की राह पर चलेगी सपा, भाजपा को साबित करेगी हिन्दू विरोधी" पढ़कर बड़ी देर तक हंसा फिर आंखे डबडबा गयीं कि आखिर क्या हश्र होने वाला है पिछड़ो/दलितों/अल्पसंख्यको की राजनीति का?क्या अब कोई दूसरा अम्बेडकर,कांशीराम,लोहिया,पेरियार, ललई सिंह यादव,फुले,छत्रपति शाहू जी,वीपी सिंह,रामस्वरूप वर्मा,जगदेव कुशवाहा आदि नही जन्मेगा?
क्या अब बहुजन की राजनीति करने वाले लोग आप जैसे ही होंगे?क्या अब आरक्षण,सामाजिक न्याय,भागीदारी का सवाल इतिहास बन जायेगा?क्या अब सत्ता के लिए सभी के सभी हिन्दू-हिन्दू ही रटेंगे?क्या अब विचारधारा के लिए कोई जोखिम उठाने की जहमत नही मोल लेगा?क्या कोई अब अम्बेडकर की तरह "आरक्षण" {अनुच्छेद 340,341,342,15(4),16(4)} के प्राविधान जैसा कुछ करने वाला न होगा?क्या अब सवर्ण लोहिया की तरह कोई यह न बोलेगा कि "सोशलिस्टों ने बांधी गांठ,पिछड़े पावें सौ में साठ"?क्या अब कोई कांशीराम की तरह यह नही कहेगा कि "जिसकी जितनी संख्या भारी,उसकी उतनी हिस्सेदारी"?क्या अब कोई वीपी सिंह की तरह "मण्डल" जैसा कोई कानून लागू करने की हिम्मत नही करेगा?
अखिलेश जी! आप विदेश में उच्च शिक्षा प्राप्त कर इंजीनियर व्यक्ति हैं पर आप बिल्ली के रास्ता काटने से डर जांय, सत्ता जाने के डर से नोएडा न जांय,खुद को सबसे बड़ा हनुमान भक्त बताये,हिंदुत्व की डगर अपनाएं,गोभक्त बन जांय तो मुझे लगता है कि अब समाजवाद,लोहियावाद का यह सबसे बुरा दिन होगा।
अखिलेश जी!आप हिंदुत्व की राह चलेंगे पर जब आप मुख्यमंत्री आवास खाली करेंगे तो वह आप जैसे हिन्दू के रहने से अपवित्र होने के कारण गंगाजल व गोमूत्र से उसे धुला जाएगा।क्या आपको अभी भी हिंदुत्व में कुछ शेष बचा दिख रहा है क्या?
अखिलेश जी!आप हिंदुत्व की राह चलेंगे।जानते हैं हिंदुत्व मतलब क्या होता है?हिंदुत्व का मतलब प्रभु वर्ग के लिए सुरक्षा,सम्मान,सम्पत्ति,शिक्षा,ब्यापार,सत्ता आदि की गारन्टी।
अखिलेश जी!आपने अपनी पिछली 5 साल की सरकार में हिंदुत्व पर चलने में कोई कोर-कसर छोड़ा था क्या?आपने हिंदुत्व के लिए सम्पूर्ण पिछड़ों को समाजवादी पेंशन,लैपटॉप,कन्या विद्याधन,जनेश्वर मिश्र व लोहिया गांव व आवास में आरक्षण से विरत कर सामान्य कटेगरी में डाल दिया था।आपने हिंदुत्व को खुश रखने के लिए पिछडो के पीसीएस में त्रिस्तरीय आरक्षण को खत्म कर दिया था।आपने हिंदुत्व की हिफाजत के लिए पदोन्नति में आरक्षण की ऐसी की तैसी कर डाली थी।आपने सरकारी खर्चे से तीर्थयात्राएं करवायीं थीं।पिछडो की बैक लाग नियुक्ति नही की गई।सिद्धार्थ विश्वविद्यालय-सिद्धार्थनगर में सारी नियुक्तियां ब्राह्मण की कर दी गईं।आरक्षित पदों में 1.5 या इससे आगे 1.99 तक को 2 की बजाय एक ही पद मानने का सर्कुलर आपकी सरकार ने ला दिया था। अयोध्या,मथुरा,बनारस,कुम्भ आदि में सरकारी धन हिंदुत्व हित मे पानी की तरह बहाया था लेकिन अखिलेश जी! आपको अभिजात्य वर्गो ने कितना वोट दिया?आपने पिछडो और दलितों का जितना नुकसान अपने सरकार में किया उससे लाभान्वित कितना अगड़ा आपको वोट दिया?क्या इतना सब करने के बावजूद आप अहीर से कुछ और बन सके?
अखिलेश जी!आपने अभिजात्य समाज को 5 साल सर पर बिठाए रखा,अभी भी आपके अगल-बगल मौजूद ये अभिजात्य लोग आपको हिंदुत्व की राह चल करके सत्ता दिलाने का स्वप्न दिखा रहे हैं।अखिलेश जी! आप मृग मरीचिका से वाकिफ होंगे क्योंकि लायन सफारी बनाने वाले लायन के डियर डीयर की कहानी जरूर सुने होंगे।अखिलेश जी!रेगिस्तान में तपती गर्मी में जैसे हिरन गर्मी की ऊष्मा से उपजे रेखाओं को पानी समझ दौड़ता रहता है पर वह पानी नही पाता वैसे ही आपके लिए हिंदुत्व मृग मरीचिका साबित होगा और आप 2019 एवं 2022 में हिंदुत्व रूपी मृग मरीचिका में झुलस के रह जाएंगे पर सत्ता रूपी पानी नही मिलेगी।
अखिलेश जी! मैंने सुना है कि लोग गलतियों से सीखते हैं पर आप पता नही क्यो गलतियों से सीखने की बजाय उसे ही दुहराते जा रहे हैं।अखिलेश जी!आपने 5 साल की अपनी सरकार में पिछड़ा शब्द का नाम तक नही लिया,दलित को अपने दरवाजे से खदेड़ दिया,अल्पसंख्यको के मसायल को हल करने से बचते रहे लेकिन क्या आप यह सब करने के बावजूद 2012 में सरकार बनाने के बाद शहरों में अधिकाधिक अभिजात्य वर्गो की उपस्थिति वाले नगर निकाय चुनावों में कुछ कर पाए,2014 लोकसभा चुनाव में अभिजात्य वर्गो का दुलारा बन पाए,2017 विधानसभा चुनाव में सवर्ण परस्ती की हद करने के बावजूद सवर्ण वोट पाए या अभी 2017 में सम्पन्न नगर निकाय चुनाव में इन अभिजात्य वर्ग के वोटों को अपने पाले में अपनी सवर्ण परस्ती,नोटबन्दी,जीएसटी आदि के बावजूद अपनी तरफ ला पाए?
अखिलेश जी! अभी गुजरात चुनाव सम्पन्न हुआ है।राहुल गांधी जी गुजरात मे हिंदुत्व का काट हिंदुत्व से करने चले थे।राहुल जी के मंदिर-मन्दिर परिक्रमा तथा नोटबन्दी,जीएसटी,व्यवसायिक मंदी आदि के बावजूद भाजपा का हिंदुत्व जीत गया क्योंकि हिंदुत्व का पेटेंट अहीर,चमार या पारसी/ईसाई आदि से जन्मे स्वयम्भू जनेऊधारी राहुल गांधी जी के पास नही है,वह नागपुर के सावरकर/गोलवरकर व भागवत को प्राप्त है।
अखिलेश जी!आप भाजपा को हिंदुत्व विरोधी साबित करेंगे?क्या है आपके पास?कोई वैचारिक पाठशाला है आपके पास?कोई कैडराइज फोर्स है आपके पास सिवाय दिशाहीन जवानी कुर्बान गैंग के?बालू की भीत पर बिना विचार,कैडर के चले हैं भाजपा को हिंदुत्व विरोधी सिद्ध करने आप?
अखिलेश जी!आप जान रहे होंगे कि भाजपा के पास कट्टर 10 करोड़ हिन्दू सदस्य हैं।केंद्र के साथ 19 राज्यो में उनकी सरकार है।प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति,उपराष्ट्रपति,सभी राज्यपाल,लोकसभा/राज्यसभा सभापति उनके कैडराइज हिन्दू स्वयंसेवक हैं।भाजपा के पास 1631 विधायक,283 सांसद हिंदुत्व वाले हैं।भारतीय जनता पार्टी की मातृ संस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हिंदुत्व की यूनिवर्सिटी है जिसके पास भारतीय मजदूर संघ,राष्ट्रीय सेविका समिति,सेवा भारती,दुर्गा वाहिनी,बजरंग दल,अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद,विश्व हिंदू परिषद,स्वदेशी जागरण मंच,सरस्वती शिशु मंदिर, विद्या भारती,बनवासी कल्याण आश्रम,मुस्लिम राष्ट्रीय मंच,अनुसूचित जाति मोर्चा,लघु उद्योग भारती,भारतीय विचार केंद्र,विश्व सम्बाद केंद्र,गायत्री पीठ,सन्त अखाड़ा परिषद,सिख संगठन,विवेकानन्द केंद्र,महिला मोर्चा आदि सैकड़ो अनुसांगिक संगठन हैं अफलेटेड महाविद्यालयों की तरह हैं।
अखिलेश जी!भाजपा के पास 28500 सरस्वती विद्या मंदिर,2 लाख 80 हजार आचार्य,49 लाख छात्र,600 प्रकाशन समूह,1लाख पूर्व सैनिक,6 लाख 90 हजार कारसेवा करने वाले जंगजू बजरंगी व विहिप के सदस्य हैं।भाजपा के पास 4000 अविवाहित पूर्णकालिक/ईमानदार/मिशनरी हिंदुत्व को समर्पित स्वयंसेवक हैं जिन्होंने अपना सारा जीवन भाजपा/संघ को दान दे रखा है।भाजपा की मातृ संस्था रोजाना सुबह हथियार सहित निश्चित ड्रेस में पूर्ण अनुशासन के साथ 56 हजार 859 शाखाये लगाती है जहां 55 लाख 20 हजार स्वयंसेवक रोजाना भाजपा/संघ के लिए मरने-जीने की कसमें खाते हैं।
अखिलेश जी!देश भर के लाखों मंदिरों के समस्त साधु,सन्त,महात्मा,शंकराचार्य,जगतगुरु भाजपा के साथ हैं।सारी प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया,सभी उद्योगपति भाजपा के साथ हैं।देश का सम्पूर्ण सवर्ण,प्रभु वर्ग,अभिजात्य तबका भाजपा के साथ है फिर आप किस गफलत के शिकार हैं?कौन आप जैसे "अहीर" के हिंदुत्व की बात सुनेगा।किसके जरिये भाजपा के इस जाल से आप मुकाबला करेंगे?
अखिलेश जी! मुझे समझ नही आता है कि आप राहुल गांधी जी की गुजरात वाली गलती क्यो दुहराने पर आमादा हैं।अखिलेश जी! आपको मेरी बात कितनी अच्छी लगेगी यह तो मैं नही जानता हूँ लेकिन मुझे आप के वैचारिक दरिद्रता पर रोना आता है।जिसके सवर्ण पुरखो ने हिंदुत्व के मुकाबले सोशल जस्टिश,भागीदारी,आरक्षण जैसे अकाट्य,अमोघ हथियार दे रखे हो वह हिंदुत्व का काट हिंदुत्व में ढूंढ रहा हो तो रोना ही आएगा।
अखिलेश जी!2019 मे भाजपा को शिकस्त देना जरूरी है जो सामाजिक न्याय के एजेंडे से ही पूरा होगा।जातिवार जनगढ़ना, आबादी के अनुपात में आरक्षण,प्राइवेट सेक्टर में आरक्षण,उच्च न्यायपालिका में आरक्षण,पदोन्नति में आरक्षण आदि सवाल जब बलवती तरीके से उठेंगे तो सवर्ण हकमार हिन्दुओ को छोड़ करके 85 प्रतिशत पिछड़ा/दलित हिन्दू तथा अल्पसंख्यक खुद ब खुद हिंदुत्व की ऐसी की तैसी कर डालेगा।
अखिलेश जी!अपनी इन बयानबाजियों से सेक्युलर व सोशल जस्टिश समर्थक ताकतों को निराश न करिए बल्कि बहुजन बुद्धिजीवियों को बुलाइये,परामर्श कीजिये और कम्युनल/अनजस्टिश लोगो से बचिए वरना वे खुद तो नही डूबेंगे पर आपको और समस्त बहुजन नेतृत्व व उनके वर्गीय हितों को नेस्तनाबूद कर डालेंगे।
https://www.facebook.com/mahesh.donia/posts/1182776255188544















Friday, 20 January 2017

ध्रुवीकरण का नया समीकरण ------ नीरजा चौधरी

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 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Monday, 2 January 2017

यह लोकतंत्र की लड़ाई है पिता के सम्पत्ति की नहीं ------ रजनीश कुमार श्रीवास्तव

लेकिन जब शरीर और दिमाग दोनों थक जाएँ लेकिन राजनीतिक वासना पहले से भी ज्यादा लोलुप हो जाए तो परिणाम मुलायम हो ही जाता है।किसी बड़ी मजबूरी के तहत मुलायम सिंह यादव का रिमोट किसी और के पास चला गया है।वो समाजवादी पार्टी का निर्विवादित भूत तो हैं लेकिन वर्तमान और भविष्य कतई नहीं।............................अखिलेश यादव को विष का पान कर महादेव बनने का अवसर मिल गया है।राजनीति में नेता वही है जिसके साथ जनता है।अखिलेश को आसुरी शक्तियों का विनाश करना ही चाहिए।ये आगे बढ़ने का समय है।



Rajanish Kumar Srivastava

समाजवादी पार्टी का संघर्ष वास्तव में एक लोकप्रिय मुख्यमंत्री और एक भटके एवं भ्रमित पार्टी अध्यक्ष के सही गलत फैसलों से सम्बन्धित है उसे पिता और पुत्र के पारिवारिक संघर्ष के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
दरअसल राजनीति ही एकमात्र ऐसा पेशा है जिसमें रिटायरमेंट की कोई उम्र ही नहीं होती।लेकिन जब शरीर और दिमाग दोनों थक जाएँ लेकिन राजनीतिक वासना पहले से भी ज्यादा लोलुप हो जाए तो परिणाम मुलायम हो ही जाता है।किसी बड़ी मजबूरी के तहत मुलायम सिंह यादव का रिमोट किसी और के पास चला गया है।वो समाजवादी पार्टी का निर्विवादित भूत तो हैं लेकिन वर्तमान और भविष्य कतई नहीं।
सारी दिक्कत दो पृथक मुद्दों को पृथक रूप से नहीं देख पाने के कारण हो रही है।यह भारतीय राजनीति में पहली बार हुआ है कि ठीक चुनाव के पहले एक लोकप्रिय मुख्यमंत्री को एक पार्टी अध्यक्ष ने पार्टी से निष्कासित कर दिया हो। जबकि हर सर्वे में अखिलेश की लोकप्रियता अपनी पार्टी से लगभग दोगुनी है।यह उसी तरह है कि एक पिता खुद पुत्र का विवाह तय करे और बारात के दिन जिद्द करे कि बारात पुत्र के बिना जाएगी।एक मुख्यमंत्री लगातार गुहार लगा रहा था कि इस चुनाव में चूँकि जनता मेरे कार्यों का मुल्याँकन करने जा रही है इसलिए उत्तरपुस्तिका मुझे लिखने दी जाए।लेकिन निष्ठुर पिता और स्वयं से निर्णय कर पाने में असमर्थ पार्टी अध्यक्ष ने अपने मुख्यमंत्री को बिना उत्तरपुस्तिका दिए ही परीक्षा में बैठाने की जिद्द पकड़ रखी थी।लोकतंत्र में अलग पार्टी वो बनाता है जिसे पार्टी में बहुमत प्राप्त ना हो। यह पूरा मसला लोकतंत्र और राजनीति का है।यह पूरी लड़ाई एक मुख्यमंत्री और एक पार्टी अध्यक्ष के सही गलत फैसलों की है ना कि कोई पारिवारिक विरासत की।लोकतंत्र में बहुमत ही निर्णायक होता है और चुने सांसदों तथा विधायकों तथा पार्टी कार्यकर्ताओं में 90% का बहुमत अखिलेश के पास है।अलग पार्टी मुलायम सिंह यादव को बनानी पड़ेगी।यह लोकतंत्र की लड़ाई है पिता के सम्पत्ति की नहीं।
https://www.facebook.com/photo.php?fbid=1769884630002810&set=a.1488982591426350.1073741827.100009438718314&type=3




क्या मुलायम सिंह यादव का रिमोट प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी के हाथ में है? सभ्य और शिष्ट तथा विकास के नाम पर चुनाव लड़ने की घोषणा करने और बाहुबलियों को टिकट ना देने की भरपूर कोशिश करने वाले अपने ही लोकप्रिय मुख्यमंत्री को पार्टी से निकालने का दुस्साहस भला कोई यूँ ही कर सकता है।मुलायम सिंह यादव किसी बहुत बड़ी मजबूरी में ऐसा विनाश काले विपरीत बुद्धि वाला निर्णय ले सकते हैं । लेकिन सारे सर्वे यही बताते हैं कि लोकप्रिय युवा मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव को अपनी समाजवादी पार्टी से भी ज्यादा लोकप्रियता हासिल है।यकीन मानिए मुलायम सिंह यादव का रिमोट किसी और के पास है वरना कोई यूँ ही अपने पैर पर कुल्हाडी नहीं मार लेता है।

समुद्र मंथन में पहले विष निकला था बाद में अमृत।अमृत के लिए राक्षस और देवता लड़ मरे थे लेकिन विष का पान कर मानवता को जिसने बचाया था वह गरलकंठ महादेव कहलाए थे।अखिलेश यादव को विष का पान कर महादेव बनने का अवसर मिल गया है।राजनीति में नेता वही है जिसके साथ जनता है।अखिलेश को आसुरी शक्तियों का विनाश करना ही चाहिए।ये आगे बढ़ने का समय है।
https://www.facebook.com/photo.php?fbid=1768165316841408&set=a.1488982591426350.1073741827.100009438718314&type=3

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02-01-2016 

Friday, 11 November 2016

उत्तर प्रदेश की जनता की ज़रूरत है सपा / भाजपा विरोधी संयुक्त मोर्चा ------ विजय राजबली माथुर

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* जिनहोने भाजपा ऊमीद्वार पूर्व प्रधानमंत्री को सपा प्रत्याशी के तौर पर चुनावी चुनौती दी थी जब उनकी ही यह पीड़ा है तब औरों का क्या कहना ?
** 11 नवंबर 2016 के हिंदुस्तान, लखनऊ अंक के पृष्ठ 02 पर समाचार छ्पा है कि, सपा किसी पार्टी से गठबंधन नहीं करेगी जिसको विलय करना हो वह सपा में विलय कर सकता है। 
*** वस्तुतः 2017 का चुनाव 2012 की तर्ज़ पर और 2019 का चुनाव 2014 की तर्ज़ पर लड़ा जाएगा। अगर सपा का अन्य दलों से गठबंधन होता तब यह फार्मूला कैसे लागू हो पाता ? आर एस एस को भाजपा के अलावा दूसरे दलों में स्थित (बैठाये हुये ) अपने समर्थकों पर पूर्ण भरोसा है और उनका लाभ संविधान संशोधन के वक्त उठाना है। 

**** यह तो भाजपा विरोधी दलों का कर्तव्य है कि, वे आपसी टांग - खिंचाई छोड़ कर एकजुट हों तथा भाजपा को उसके समर्थकों सहित पराजित करने हेतु जनता के समक्ष मजबूत विकल्प दें। यदि वास्तव में लक्ष्य भाजपा को परास्त करना होगा तब कांग्रेस,बसपा,वामपंथी दलों समेत सभी जंतान्त्रिक दलों का गठबंधन सपा/भाजपा गठजोड़ के विरुद्ध सामने आयेगा वरना तो होइहें वही जे आर एस एस रची राखा।
https://www.facebook.com/photo.php?fbid=1223776617684312&set=a.154096721318979.33270.100001559562380&type=3&permPage=1

("**** यह तो भाजपा विरोधी दलों का कर्तव्य है कि, वे आपसी टांग - खिंचाई छोड़ कर एकजुट हों तथा भाजपा को उसके समर्थकों सहित पराजित करने हेतु जनता के समक्ष मजबूत विकल्प दें। यदि वास्तव में लक्ष्य भाजपा को परास्त करना होगा तब कांग्रेस,बसपा,वामपंथी दलों समेत सभी जंतान्त्रिक दलों का गठबंधन सपा/भाजपा गठजोड़ के विरुद्ध सामने आयेगा वरना तो होइहें वही जे आर एस एस रची राखा।")

लेकिन अब प्रश्न यह है कि, क्या ऐसा होगा? अथवा भाजपा को हटाने/हराने का नारा सिर्फ नारा ही है केवल दिखावे का ढोंग है ढोंग !
सबसे पुरानी पार्टी आज 1925 में स्थापित  'भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ' ही है क्योंकि उससे पूर्व  1885  में स्थापित दो बैलों की जोड़ी वाली  'इंडियन नेशनल कांग्रेस ' 1969 में कांग्रेस (ओ ) व कांग्रेस ( आर ) में विभाजित हो गई थी एवं  चरखा चलाती महिला वाला उसका संगठन पक्ष 1977 में 'जनता पार्टी ' में विलीन हो गया था।  गाय -बछड़ा वाली कांग्रेस ( आर ) बाद में विभाजित हो कर 'पंजा ' वाली ' कांग्रेस ( आई )' बनी जो आज सोनिया/राहुल गांधी के नेतृत्व में चल रही है और अनधिकृत रूप से 131 वर्ष पुरानी कांग्रेस होने का दावा कर रही है। और क्यों न करे जब अब सबसे पुरानी भाकपा का  ब्राह्मण वादी नेतृत्व ही अपने दावे को सामने लाने से कतराता है। 
डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी कहते थे- इंडिया दैट इज़ भारत दैट इज़ उत्तर प्रदेश - 1925 में स्थापित आर एस एस का दूसरा राजनीतिक संस्करण भाजपा इसी सिद्धान्त पर चल कर 1991 में यू पी में पूर्ण बहुमत की सरकार बना चुका है। तभी 1998 से 2004 एवं पुनः 2014 से केंद्र की सत्ता में आ सका है। 
लेकिन 1925 में स्थापित भाकपा के लिए उत्तर प्रदेश का कोई महत्व नहीं है। जबकि रघुवीर सहाय 'फिराक गोरखपुरी ' का विश्लेषण काफी सटीक है कि, मेरठ/ कानपुर डायगनल से शुरू आंदोलन विफल रहे हैं चाहे वे 1857 की प्रथम क्रांति हों अथवा किसान आंदोलन। एवं आगरा  / बलिया डायगनल से प्रारम्भ आंदोलन पूरे उत्तर प्रदेश में फैल कर राष्ट्रीय आंदोलन बने और सफल रहे हैं। चाहे 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन हो अथवा अन्य कोई। 
1992 में आगरा में सम्पन्न प्रदेश भाकपा के सम्मेलन के बाद बजाए भाकपा के प्रसार के 1994 में विभाजन हो गया। क्यों? क्योंकि ब्राह्मण वादी मानसिकता का नेतृत्व  पिछड़ा वर्ग से संबन्धित मित्रसेन जी यादव / राम चंद्र बख्श सिंह जी को स्वीकार नहीं कर सका और उनको हटना पड़ा। उसी मानसिकता ने कौशल किशोर जी  के नेतृत्व में दलित वर्ग को भाकपा से अलग किया। दो- दो विभाजनों के बाद भी 2015 में पिछड़ा व दलित वर्ग से संबन्धित पूर्व भाकपा विधायक प्रत्याशियों को पार्टी से अलग होना पड़ा । क्यों? क्योंकि, ब्राह्मण वादी मानसिकता के नायक का कथन है कि, पिछड़े व दलित कामरेड्स से सिर्फ काम लिया जाये उनको कोई पद न सौंपा जाये। 
भारत का सर्व हारा वर्ग दलित समुदाय से ही संबन्धित है जिसका भाकपा में कोई  सम्मानित स्थान नहीं है। बगैर सर्व हारा के समर्थन व सहयोग के 'मास्को रिटर्न ' ब्राह्मण वादी  नेतृत्व 'आर्थिक आधार ' पर सफलता की कपोलकल्पित मृग मरीचिका में विचरण करते हुये 2017 के चुनाव में मात्र 200 सीटों पर चुनाव लड़ कर व्यवस्था परिवर्तन का थोथा दावा कर रहा है जबकि, पूर्ण बहुमत हेतु 202 विधायकों के समर्थन की आवश्यकता होती है। नौ नवंबर की वामपंथी रैली से लखनऊ वासी राष्ट्रीय सचिव कामरेड अतुल अंजान को दूर रखा गया व उनके स्थान पर डी राजा साहब से अङ्ग्रेज़ी में भाषण दिलवा कर हिन्दी प्रदेश की जनता को उपेक्षित किया  गया है। क्या ब्राह्मण वादी / मोदीईस्ट इन गतिविधियों के बल पर भाजपा / सपा  गुप्त - गठजोड़ को सत्ता से अलग रखा जा सकता है? यह विशेष विचारणीय विषय है।  


    संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Tuesday, 9 August 2016

क्या ऐसा होगा? ------ विजय राजबली माथुर

स्पष्ट रूप से पढ़ने के लिए इमेज पर डबल क्लिक करें (आप उसके बाद भी एक बार और क्लिक द्वारा ज़ूम करके पढ़ सकते हैं )




 क्या ऐसा होगा?
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अयोध्या के बाबरी प्रकरण के बाद उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा गठबंधन की सरकार का अस्तित्व आया था। काशीराम जी को अपने गृह जनपद इटावा से मुलायम सिंह जी ने सांसद तक बनवाया था। यदि यह गठबंधन कायम रहता तो सदा-सर्वदा के लिए उत्तर प्रदेश से भाजपा का अस्तित्व समाप्त हो जाता। अतः संघप्रिय गौतम के माध्यम से मायावती जी को मुलायम सिंह जी के विरुद्ध करके वह सरकार गिरा दी गई। भाजपा के समर्थन से कई बार मायावती जी मुख्यमंत्री बनीं किन्तु उनकी सरकार भाजपा द्वारा ही हर बार गिरा दी गई। इसके बावजूद गुजरात नर-संहार के बाद 2002 में मायावती जी ने अटल व मोदी के साथ भाजपा का वहाँ प्रचार किया था।


2014 के लोकसभा चुनावों से काफी पहले  व्हाईट हाउस में बराक हुसैन ओबामा द्वारा एक अंतर्राष्ट्रीय गोपनीय बैठक की गई थी जिसमें भारत से भी कई दलित कहे जाने वाले चिंतक शामिल हुये थे जिनमें से एक लखनऊ के विद्वान भी थे। वहीं पर मुस्लिमों के विरुद्ध विश्व व्यापी मुहिम चलाये जाने और उसमें प्रत्येक देश के दलित माने जाने वाले लोगों का सहयोग लेने की रूप रेखा तय की गई थी। उसी अनुसार 2014 के लोकसभा चुनावों में समस्त दलित कहे जाने वाले वर्ग का वोट बसपा के बजाए भाजपा को गया था और बसपा का एक भी सांसद न जीत सका था। उसी मुहिम का परिणाम है बसपा से हाल ही में हुई टूटन। मायावती जी को उनके खास लोगों ने उसी अंदाज़ में उनको झटका दिया है जिस अंदाज़ में 1995 में उन्होने खुद मुलायम सिंह जी को झटका दिया था तब उनको भी भाजपा का समर्थन हासिल था जिस प्रकार अब उनको झटका देने वालों को हासिल हुआ है।
2017 के आसन्न चुनावों में यदि बसपा-सपा गठबंधन बना कर चुनाव लड़ा जाये तो अब भी भाजपा के मंसूबों को ध्वस्त किया जा सकता है वरना अभी तो भाजपा बसपा को ध्वस्त करने के लिए गोपनीय समर्थन देकर सपा सरकार फिर से बनवा देगी लेकिन उसके बाद सपा को उसी प्रकार तोड़ेगी जिस प्रकार अभी बसपा को तोड़ा है। मायावती जी व मुलायम सिंह जी दूरदर्शिता का परिचय दें तो दीर्घकालीन मजबूत गठबंधन बना कर न केवल उत्तर प्रदेश में वरन सम्पूर्ण देश में भाजपा को परास्त कर सकते हैं। लेकिन क्या ऐसा होगा?
https://www.facebook.com/vijai.mathur/posts/1137504919644816
 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Friday, 25 September 2015

सपा और भाजपा के बीच गुप्त गठजोड़ --- रिहाई मंच

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RIHAI MANCH
For Resistance Against Repression
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मोदी और अमित शाह से गुप्त बैठक के बाद महागठबंधन से अलग हुए मुलायम-रिहाई मंच :
मोदी और अमित शाह से मुलायम और राम गोपाल की मुलाकात पर क्यों चुप हैं आजम खान रामगोपाल के बेटे अक्षय यादव और बहू रिचा यादव को यादव सिंह ने पहुंचाया लाभ जेल जाने के डर से मुलायम का कुनबा भाजपा  को बिहार में कर रहा है मदद। 
लखनऊ 13 सितम्बर 2015 : रिहाई मंच ने मीडिया में आई इन रिपोर्टाें को सपाका भाजपा के साथ गुप्त तालमेल साबित करने वाला बताया है जिसमें तथ्यों केसाथ यह बताया गया है कि बिहार चुनाव में राजद, जदयू और कांग्रेस के महागठबंधन से अलग होने का निर्णय मुलायम सिंह ने मोदी और अमित शाह सेगुप्त मुलाकात के बाद लिया है।
रिहाई मंच के अध्यक्ष मोहम्मद शुऐब ने जारी प्रेस रिलीज में कहा है किजिस तरह मीडिया में आई रिर्पोटें यह बता रही हैं कि 27 अगस्त को मुलायमसिंह यादव और उनके भाई रामगोपाल यादव ने नरेंद्र मोदी से एक घंटे तक बंदकमरे में बैठक की और उसके बाद ही बिहार चुनाव के लिए महागठबंधन की तरफ से30 अगस्त को होने वाली स्वाभिमान रैली में खुद शामिल न होने सम्बंधित बयान दिया और रैली में शिवपाल यादव के शामिल होने के ठीक दूसरे दिन 31अगस्त को फिर रामगोपाल यादव और अमित शाह के बीच एक घंटे तक मुलाकात केबाद, 2 सितम्बर को जिस तरह सपा ने महागठबंधन से अपने को अलग कर लिया वहसपा और भाजपा के रिश्ते को उजागर करने के लिए पर्याप्त है।
रिहाई मंच नेता ने कहा कि जिस तरह रिपोर्ट में यह बताया गया है कि अमितशाह और रामगोपाल यादव के बीच 31 अगस्त को हुयी बैठक अमित शाह और बिहारचुनाव में उसके गठबंधन के दूसरे सहयोगी दलों लोजपा, हिंदुस्तान अवाममोर्चा, आरएलसपी के नेताओं के साथ दोपहर के भोजन से ठीक पहले खत्म हुयीवह यह भी साबित करता है कि भाजपा और उसके घटक दल सीटों के बंटवारे में सपा की अपने पक्ष मंे भूमिका निभा पाने की क्षमता को भी ध्यान में रख रहेहैं। रिहाई मंच नेता ने कहा कि मुलायम और भाजपा के बीच गुप्त गठजोड़ पर सपा के मुस्लिम चेहरे आजम खान को अपना पक्ष रखना चाहिए और यह बताना चाहिएकि बहुत ज्यादा बोलने वाली उनकी जबान इस मसले पर खुद अपनी मर्जी से खामोशहै या फिर मुलायम परिवार के दबाव मंे खामोश है।
रिहाई मंच नेता राजीव यादव और शाहनवाज आलम ने कहा कि महागठबंधन से अलगहोने की वजह सपा के नेता यह बता रहे हैं कि उन्हें गठबंधन में उनकीहैसियत से कम सीटें दी जा रही थीं। जबिक वे यह नहीं बता रहे हैं कि उनकीवहां कोई हैसियत ही नहीं है और 2010 के चुनाव में सपा ने जिन 146 सीटांेपर चुनाव लड़ा था उन सबमंे उसकी जमानत जब्त हो गई थी। रिहाई मंच नेताओंने कहा कि गुजरात में भी मुलायम सिंह सभी सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारकरभाजपा को इसी तरह मदद पहंुचाते रहे हैं। रिहाई मंच नेताओं ने कहा किबिहार चुनाव में चाहे जीत जिसकी हो यूपी में मुलायम और उनके परिवार कीमुस्लिम के प्रति भीतरघात वाली राजनीति का खात्मा अब तय है क्योंकि अबमुसलमान उनके असली भगवा चेहरे को पहचान चुका है और वह अब सपा के लिएमुस्लिम वोटों का जुगाड़ करने वाले उसके मुस्लिम चेहरों की भी सच्चाई जानचुका है जो विधानसभा में भारी तादाद में होने के बावजूद आज तक मुसलमानोंसे किये गये चुनावी वादों पर एक शब्द तक नहीं बोलते हैं।
रिहाई मंच नेताओं ने कहा कि मीडिया में आया यह रहस्य उद्घाटन कि रामगोपाल यादव के बेटे और फिरोजाबाद से सांसद अक्षय यादव और उनकी पत्नी रिचा यादवको यादव सिंह के करीबी राजेश कुमार मनोचा की कम्पनी एनएम बिल्डवेल और मैक्काॅन इंफ्रा के मालिक जिसकी डायरेक्टर यादव सिंह की पत्नी कुसुमलताभी रह चुकी हैं में रजिस्ट्रार आॅफ कम्पनीज (आरओसी) के मुताबिक दस हजारशेयर हैं और जिसकी जांच आयकर विभाग कर रहा है, साफ करता है कि मुलायमसिंह यादव का पूरा कुनबा भ्रष्टाचार में आकंठ डूबा हुआ है और इसीलिए यादवसिंह मामले की सीबीआई जांच के अदालती आदेश के खिलाफ वह सुप्रीम कोर्ट तकमें जाती है। यादव परिवार जेल जाने की डर से भाजपा को चुनावी लाभपहंुचाने के लिये बिहार में प्रत्याशी खड़े कर रही है। रिहाई मंच नेताओंने कहा कि संगठन जल्द ही सपा और भाजपा के बीच पिछले दो दशकांे से चल रहे गुप्त गठजोड़ और उसके द्वारा संघ परिवार के मुस्लिम विरोधी एजंेडे को आगे बढ़ाने की कोशिशों पर दस्तावेज जारी करेगा।




 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश