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Tuesday, 15 May 2018

बिहार में भाजपा रुक जाएगी लेकिन उत्तर प्रदेश में ? ------ प्रशांत कनौजिया


 * बिहार में तेजस्वी बूथ और गांव लेवल पर  
* *   कांशीराम वाले बसपा की तरह काम नहीं  
* * *   अखिलेश सिर्फ फैंसी रैली करते हैं


Prashant Kanojiya
 बिहार में तेजस्वी बूथ और गांव लेवल पर : 
2019 में होने वाले चुनाव से पहले ही भाजपा 30 फीसदी काम पूरा कर चुकी है. उसने बूथ तक पहुँचने के लिए हर संभव प्रयास किया है. भाजपा जिस प्रकार चुनाव लड़ती है ये कबीले तारीफ है. नैतिकता की बात करने की जरूरत नहीं, क्योंकि राजनीति इसी का नाम है. 2019 लोकसभा चुनाव पर सबसे ज्यादा प्रभाव उत्तर प्रदेश और बिहार डालेंगे. बिहार में तेजस्वी जिस प्रकार गांव स्तर पर काम कर रहे हैं, यह कहने में मुझे कोई संकोच नहीं है कि भाजपा के अलावा अगर कोई दल बूथ और गांव लेवल पर काम कर रहा है, तो वो राजद है.

 कांशीराम वाले बसपा की तरह काम नहीं : 
अब रही बात उत्तर प्रदेश की. मायावती का अपना काडर और वोटबैंक हैं, उसे मेहनत अपने वोटबैंक को बढ़ाने के लिए करना होगा. लेकिन बसपा अब कांशीराम वाले बसपा की तरह काम नहीं कर रही तो ज्यादा कोई फर्क नहीं आपयेगा.

अखिलेश सिर्फ फैंसी रैली करते हैं  : 
अब आते हैं अखिलेश यादव पर. युवा मुख्यमंत्री होने के नाते युवा वर्ग में लोकप्रियता है पर उसे वोट में तब्दील करवाने की क्षमता नहीं है. 2019 का चुनाव नज़दीक है, लकिन पार्टी का बूथ तो छोड़ो विधानसभा पर कोई ठोस काम नहीं हो रहा है. 90 फीसदी जिला अध्यक्ष (सभी इकाई) के लखनऊ में पड़े रहते हैं. उन्हें अभी तक पता नहीं है कि भाजपा की सरकार में वो ठेकेदारी दिलाने या लेने का काम नहीं कर पाएंगे. पार्टी के 90 फीसदी लोग न लोहिया को जानते हैं और न ही समाजवाद का स.


अखिलेश के पास ख़राब सलाहाकारों की फौज है, जिसने डूबने में कोई कसर नहीं छोड़ा. अखिलेश कान के कच्चे हैं और खुद से परखने से ज्यादा सलाहकार कान में बताते हैं उसपर विश्वास करते हैं. शिवपाल की नाराजगी के बाद बूथ लेवल ध्वस्त है. अखिलेश सिर्फ फैंसी रैली करते हैं, गांव स्तर पर नहीं जाते. बूथ से ज्यादा ट्विटर पर भरोसा करते हैं. अखिलेश से कार्यकर्ताओं को मिलने के लिए बड़ा फ़िल्टर पार करना होता है. सामाजिक न्याय पर कंफ्यूज हैं. खुद को कोर वोटर नहीं है, वही वोटर है जो भाजपा और कांग्रेस के पास है.

मुलायम ग्राउंड के आदमी का सुझाव नकार कर चुनाव लड़ कर न जीत पाने वाले रामगोपाल यादव पर ज्यादा भरोसा है, जो ग्राउंड का 1 फीसदी काम भी नहीं जानते. बिहार में भाजपा रुक जाएगी लेकिन उत्तर प्रदेश में अभी हालात के हिसाब से नामुमकिन है.

प्रशांत कनौजिया

साभार : 
https://www.facebook.com/photo.php?fbid=2044759595553106&set=a.196023523760065.53567.100000572560879&type=3

Friday, 20 January 2017

ध्रुवीकरण का नया समीकरण ------ नीरजा चौधरी

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 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Monday, 16 January 2017

चुनाव की अग्नि परीक्षा ------ शशि शेखर

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 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Monday, 2 January 2017

यह लोकतंत्र की लड़ाई है पिता के सम्पत्ति की नहीं ------ रजनीश कुमार श्रीवास्तव

लेकिन जब शरीर और दिमाग दोनों थक जाएँ लेकिन राजनीतिक वासना पहले से भी ज्यादा लोलुप हो जाए तो परिणाम मुलायम हो ही जाता है।किसी बड़ी मजबूरी के तहत मुलायम सिंह यादव का रिमोट किसी और के पास चला गया है।वो समाजवादी पार्टी का निर्विवादित भूत तो हैं लेकिन वर्तमान और भविष्य कतई नहीं।............................अखिलेश यादव को विष का पान कर महादेव बनने का अवसर मिल गया है।राजनीति में नेता वही है जिसके साथ जनता है।अखिलेश को आसुरी शक्तियों का विनाश करना ही चाहिए।ये आगे बढ़ने का समय है।



Rajanish Kumar Srivastava

समाजवादी पार्टी का संघर्ष वास्तव में एक लोकप्रिय मुख्यमंत्री और एक भटके एवं भ्रमित पार्टी अध्यक्ष के सही गलत फैसलों से सम्बन्धित है उसे पिता और पुत्र के पारिवारिक संघर्ष के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
दरअसल राजनीति ही एकमात्र ऐसा पेशा है जिसमें रिटायरमेंट की कोई उम्र ही नहीं होती।लेकिन जब शरीर और दिमाग दोनों थक जाएँ लेकिन राजनीतिक वासना पहले से भी ज्यादा लोलुप हो जाए तो परिणाम मुलायम हो ही जाता है।किसी बड़ी मजबूरी के तहत मुलायम सिंह यादव का रिमोट किसी और के पास चला गया है।वो समाजवादी पार्टी का निर्विवादित भूत तो हैं लेकिन वर्तमान और भविष्य कतई नहीं।
सारी दिक्कत दो पृथक मुद्दों को पृथक रूप से नहीं देख पाने के कारण हो रही है।यह भारतीय राजनीति में पहली बार हुआ है कि ठीक चुनाव के पहले एक लोकप्रिय मुख्यमंत्री को एक पार्टी अध्यक्ष ने पार्टी से निष्कासित कर दिया हो। जबकि हर सर्वे में अखिलेश की लोकप्रियता अपनी पार्टी से लगभग दोगुनी है।यह उसी तरह है कि एक पिता खुद पुत्र का विवाह तय करे और बारात के दिन जिद्द करे कि बारात पुत्र के बिना जाएगी।एक मुख्यमंत्री लगातार गुहार लगा रहा था कि इस चुनाव में चूँकि जनता मेरे कार्यों का मुल्याँकन करने जा रही है इसलिए उत्तरपुस्तिका मुझे लिखने दी जाए।लेकिन निष्ठुर पिता और स्वयं से निर्णय कर पाने में असमर्थ पार्टी अध्यक्ष ने अपने मुख्यमंत्री को बिना उत्तरपुस्तिका दिए ही परीक्षा में बैठाने की जिद्द पकड़ रखी थी।लोकतंत्र में अलग पार्टी वो बनाता है जिसे पार्टी में बहुमत प्राप्त ना हो। यह पूरा मसला लोकतंत्र और राजनीति का है।यह पूरी लड़ाई एक मुख्यमंत्री और एक पार्टी अध्यक्ष के सही गलत फैसलों की है ना कि कोई पारिवारिक विरासत की।लोकतंत्र में बहुमत ही निर्णायक होता है और चुने सांसदों तथा विधायकों तथा पार्टी कार्यकर्ताओं में 90% का बहुमत अखिलेश के पास है।अलग पार्टी मुलायम सिंह यादव को बनानी पड़ेगी।यह लोकतंत्र की लड़ाई है पिता के सम्पत्ति की नहीं।
https://www.facebook.com/photo.php?fbid=1769884630002810&set=a.1488982591426350.1073741827.100009438718314&type=3




क्या मुलायम सिंह यादव का रिमोट प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी के हाथ में है? सभ्य और शिष्ट तथा विकास के नाम पर चुनाव लड़ने की घोषणा करने और बाहुबलियों को टिकट ना देने की भरपूर कोशिश करने वाले अपने ही लोकप्रिय मुख्यमंत्री को पार्टी से निकालने का दुस्साहस भला कोई यूँ ही कर सकता है।मुलायम सिंह यादव किसी बहुत बड़ी मजबूरी में ऐसा विनाश काले विपरीत बुद्धि वाला निर्णय ले सकते हैं । लेकिन सारे सर्वे यही बताते हैं कि लोकप्रिय युवा मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव को अपनी समाजवादी पार्टी से भी ज्यादा लोकप्रियता हासिल है।यकीन मानिए मुलायम सिंह यादव का रिमोट किसी और के पास है वरना कोई यूँ ही अपने पैर पर कुल्हाडी नहीं मार लेता है।

समुद्र मंथन में पहले विष निकला था बाद में अमृत।अमृत के लिए राक्षस और देवता लड़ मरे थे लेकिन विष का पान कर मानवता को जिसने बचाया था वह गरलकंठ महादेव कहलाए थे।अखिलेश यादव को विष का पान कर महादेव बनने का अवसर मिल गया है।राजनीति में नेता वही है जिसके साथ जनता है।अखिलेश को आसुरी शक्तियों का विनाश करना ही चाहिए।ये आगे बढ़ने का समय है।
https://www.facebook.com/photo.php?fbid=1768165316841408&set=a.1488982591426350.1073741827.100009438718314&type=3

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फेसबुक कमेंट्स :
02-01-2016 

Wednesday, 13 August 2014

सरकार और व्यवहार :अरविंद विद्रोही व पंकज चतुर्वेदी जी की नज़रों से

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साभार : दैनिक हरिभूमि के सम्पादकीय पृष्ठ ४ पर प्रकाशित 'अरविंद विद्रोही' जी का  लेख सरकार और जन आकांक्षा दिनांक १२ अगस्त ,१४https://www.facebook.com/photo.php?fbid=728525607183692&set=p.728525607183692&type=1&theater


 Pankaj Chaturvedi
12 hrs · Edited ·
अखिेलेश यादव जी आप एक असफल, नाकाम अैर बेबस से मुख्‍यमंत्री हैं, अब समय आ गया है कि नेताजी खुद उप्र की कमान संभालें, उप्र की हकीकत और विकास के वादे कितने खोखले हैं देखना हो ते जरा किसी भी दिन शाम को छह बजे के आसपास दिल्‍ली में दिलशाद गार्डन से जीटी रोड होते हुए गाजियाबाद की तरुफ आने की योजना बनाएं, जहां दिल्‍ली की सीमा  खतम होती है वहीं से विक्रम आठ सीटर आटो की रेलमपेल, उनसे वसूली करते लंपट किस्‍म के लोग व दूर खडे मजा लेते पुलिस वाले 100 मीटर आगे बढने के लिए पंद्रह मिनट तक समय लगने पर निर्विकार मिलेगे आगे का रासत छह लेन रोड है लेकिन वहां ट्राफिक केवल एक ही लेन पर चलता है, बाकी पर ट्रकों की पार्किंग होती है जो हर दिन के हिसाब से थाने को पैसा देते हैं, धूल, गर्द, गलत दिशा  से आते वाहन व 16 टन लदे ट्रक, मोहन नगर तक का चार किलोमीटर का रास्‍ता एक घंटे में पार कर लो ताे गनीमत है यह बानगी है, दिल्‍ली के दरवाजे पर हताश उप्र की व्‍यवस्‍थाओं की,कभी अपने किसी भरोसेमंद को शाम को इस सडक पर चला कर देख लें फिर पता चलेगा कि यह उत्‍तर प्रदेश नहीं मुंलायम सिंह जी का ''पुत्‍तर प्रदेश'' बन कर रह गया है , यह तो बानगी है इससे जैसे आगे बढेंगे सडक की अराजकता और बढती जाएगी। 

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सातवें भाव (जो सहयोगियों,राजनीतिक साथियों एवं पार्टी नेतृत्व का है )का स्वामी मंगल चतुर्थ भाव (जो लोकप्रियता व मान-सम्मान का है )मे सूर्य की राशि मे स्थित है । यह स्थिति शत्रु बढ़ाने वाली है इसी के साथ-साथ सातवें भाव मे मंगल की राशि मे 'राहू' स्थित है जो कलह के योग उत्पन्न कर रहा है।ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार के मध्य काल तक पार्टी मे अंदरूनी कलह-क्लेश और टकराव बढ़ जाएँगे। ये परिस्थितियाँ पार्टी को दो-फाड़ करने और सरकार गिराने तक भी जा सकती हैं। निश्चय ही विरोधी दल तो ऐसा ही चाहेंगे भी।*****
 http://krantiswar.blogspot.in/2012/03/blog-post_16.html

 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश