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Friday, 3 July 2020

शीला दीक्षित की राजनीति

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हमारे एक सहकर्मी रहे पद्मा शंकर पांडे जब  होटल मुगल , आगरा जाब करने आए तो डी एम आवास मे रहते थे। जिलाधिकारी श्री विनोद दीक्षित उनके बड़े भाई के साले साहब थे। श्री दीक्षित एमेर्जेंसी के समय गृह मंत्री रहे श्री उमा शंकर दीक्षित के पुत्र थे। पांडे जी से मिलने उनकी पत्नी श्रीमती शीला दीक्षित (दिल्ली की पूर्व  मुख्यमंत्री) अक्सर होटल मुगल आती रहती थी। वैसे महिला कार्यक्रमों और कांग्रेस के कार्यक्रमों मे भी आने पर वह पांडे जी से भेंट अवश्य करती थी। I A S से रिजायींन  करके वह कांग्रेस मे सक्रिय थी। एक बार पांडे जी के इन्तजार मे वह होटल की बाउंड्री दीवार पर बैठ गईं थी जिसे उनकी सादगी माना गया था।  जब दीक्षित जी बाराबंकी स्थानांतरित हो गए तो उन्होने वहा की सोमैया आर्गेनिक कंपनी  मे लाइजन आफ़ीसर के पद पर पांडे जी की नियुक्ति करा दी। पांडे जी का इंटरव्यू लेने अधिकारी होटल मुगल आया था। जब जनता सरकार मे दीक्षित जी गोरखपुर स्थानांतरित हो गए तो पांडे जी को हटा दिया गया था।
जब पूर्व सांसद संदीप दीक्षित (दिल्ली की पूर्व मुख्य मंत्री के पुत्र) 10 वर्ष के थे अपने बाबाजी उमाशंकर दीक्षित के साथ उसी रेल से यात्रा कर रहे थे जिसमे उनके पिता विनोद दीक्षित सरकारी यात्रा पर थे। बाबा-पोता घर पहुँच गए और विनोद दीक्षित का कोई अता-पता नहीं चला तो पूर्व गृह मंत्री अपने पुत्र को खोजने पुनः स्टेशन पहुंचे जहां पता चला कि विनोद दीक्षित बंद  टाइलेट मे मृत पाये गए।

उमाशंकर दीक्षित जी की मृत्यु के बाद से शीला दीक्षित ज्यादा सक्रिय हो गईं और तीन  बार दिल्ली की मुख्यमंत्री रहीं  एवं कामन वेल्थ खेलों मे उन पर कीचड़ भी उछला था  जिसे उनके तत्कालीन सांसद पुत्र संदीप ने अन्ना -आंदोलन मे मध्यस्थता करके अन्ना-जल से धो डाला था । कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति मे संदीप दीक्षित,शीला दीक्षित और मनमोहन सिंह जी उस तरफ थे जो सोनिया जी की अनुपस्थिति मे बनी 4 सदस्यीय कमेटी को नीचा दिखाना चाहते थे । इनही लोगों ने किरण बेदी,अरविंद केजरीवाल के माध्यम से अन्ना साहब को भूख हड़ताल करने को प्रेरित किया था जिससे घपले-घोटालों ,मंहगाई (पेट्रोल,डीजल,गैस की मूल्य वृद्धि से जो तब बढ़ायी गई जब बंगाल से बामपंथी शासन समाप्त हो गया),शोषण-उत्पीड़न,बेरोजगारी,किसानों की आत्म-हत्याओं ,पासको को उड़ीसा की उपजाऊ भूमी 50 वर्ष के लिए देने के गैर कानूनी कृत्य आदि से जनता का ध्यान हटाने मे इस गुट को भारी सफलता मिली जिसके लिए अमेरिका की कार निर्माता कंपनी  के फोर्ड फाउंडेशन ने खजाना खोल रखा था। कारपोरेट घरानों और साम्राज्यवादी हितों के संरक्षण मे अन्ना आंदोलन ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। ------







 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Wednesday, 24 January 2018

एक्सीडेंटल पी एम का खिताब मनमोहन सिंह जी को देना गलत है ------ विजय राजबली माथुर

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फिल्म बनाना और मनोरंजन करना तो एक अलग बात है लेकिन मनमोहन सिंह जी को एक एक्सीडेंटल प्रधानमंत्री कहना सच्चाई पर पर्दा डालना ही है। उनके पूर्व सलाहकार महोदय ने पुस्तक ज़रूर किसी निश्चित उद्देश्य के लिए लिखी होगी और वैसे ही उद्देश्य की पूर्ती यह फिल्म भी करेगी। 
बहुत पुरानी बात नहीं है कोई 27 वर्ष पूर्व जब पूर्व पी एम राजीव गांधी की निर्मम हत्या कर दी गई तब सहानुभूति के आधार पर उनकी कांग्रेस को संसद में अधिक सीटें मिल गई थीं और उस अचानक की परिस्थिति में पूर्व आर एस एस कार्यकर्ता पी वी नरसिंहा  राव साहब को पी एम बनने का मौका मिल गया था। उनके द्वारा रिज़र्व बैंक, वर्ल्ड बैंक और आई एम एफ से सम्बद्ध रहे डॉ मनमोहन सिंह जी को वित्तमंत्री बनाया गया था जिनकी आर्थिक नीतियों को भाजपा नेता एल के आडवाणी ने न्यूयार्क में  जाकर उनकी अर्थात भाजपा की नीतियों को चुराया जाना  बताया था। स्पष्ट है कि , मनमोहन जी ने उदारीकरण की जिन नीतियों को कांग्रेस सरकार से लागू करवाया था वे तो जनसंघ और आर एस एस की पुरानी मांग पर आधारित थीं। वर्ल्ड बैंक / आई एम एफ अर्थात अप्रत्यक्ष रूप से यू एस ए भी उन नीतियों का ही समर्थक था इसलिए कहा तो यह जाना चाहिए था कि , मनमोहन जी जनसंघ / आर एस एस / विश्व कारपोरेट की ख़्वाहिश पर वित्तमंत्री बनाए गए थे और इस प्रकार राजनेता के तौर पर स्थापित किए जा रहे थे। 
नरसिंहा  राव साहब ने  पदमुक्त होने के बाद अपने उपन्यास  THE INSIDER में यह रहस्योद्घाटन किया था कि , ' हम स्वतन्त्रता के भ्रमजाल में जी रहे हैं। '  एक विद्वान , कुशल प्रशासक  और संगठक द्वारा महज मज़ाक में ऐसा नहीं लिखा गया होगा। यह एक वास्तविक सच्चाई रही होगी। हालांकि उनको मनमोहन जी का राजनीतिक गुरु बताया जाता है किन्तु उनको स्थापित करना उनकी मजबूरी भी रही होगी। 
जब सोनिया जी ने 2004 में उनको  पी एम पद के लिए प्रस्तावित किया होगा तब उनके समक्ष भी  नरसिंहा  राव साहब  सदृश्य मजबूरी ही रही होगी। किन्तु जब सोनिया जी ने 2012 में मनमोहन जी को राष्ट्रपति बना कर प्रणव मुखर्जी साहब को पी एम बनाना चाहा था तब जापान यात्रा से लौटते वक्त विमान में दिये साक्षात्कार में उन्होने कहा था कि , वह जहां हैं वहीं संतुष्ट हैं बल्कि तीसरे मौके के लिए भी बिलकुल फिट हैं। 

जब मनमोहन जी को एहसास हो गया कि उनको तीसरा मौका नहीं मिलने जा रहा है तब उनका प्रयास हज़ारे आदि के माध्यम से भाजपा को सशक्त करने के लिए हुआ जिसके परिणाम स्वरूप आज भाजपा की मोदी सरकार सत्तारूढ़ है। 

पुस्तक और फिल्म एक ध्येय को लेकर मनमोहन जी को एक्सीडेंटल पी एम सिद्ध करने का प्रयास करते हैं  जो वास्तविकता से ध्यान हटाने का उपक्रम ही है। 


संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Thursday, 20 August 2015

जयंती पर एक स्मरण : राजीव गांधी




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 मणि शंकर अय्यर साहब ने पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी जी के जन्मदिवस पर एक भावपूर्ण लेख द्वारा उनका सही ही स्मरण किया है। परंतु उनके राजनीतिक पक्ष को शायद जान बूझ कर ही छोड़ दिया गया है। निष्पक्ष विश्लेषण हेतु उनके कुछ ऐसे निर्णयों का उल्लेख करना भी समीचीन होगा जिनके परिणाम स्वरूप आज देश में सांप्रदायिकता की पक्षधर और कारपोरेट हितैषी सरकार सत्तारूढ़ है। 
हालांकि 1980 में सत्ता में पुनर्वापिसी को आतुर उनकी माँ इंदिरा जी ने ही आर एस एस के गुप्त समझौते व समर्थन को हासिल करके नेहरू जी द्वारा स्थापित 'धर्म निरपेक्षता' की नीति के परित्याग की नींव डाल दी थी। किन्तु राजीव जी ने शाहबानों केस की प्रतिक्रिया में  1989 में विवादित स्थल का ताला खुलवा कर पूजा शुरू करवा कर सांप्रदायिकता की विष- बेल को सिंचित किया था। जबकि 1949 में उप-प्रधानमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल द्वारा राम मंदिर/बाबरी मस्जिद  पर ताला लगवा कर विवाद का पटाक्षेप कर दिया गया था। आडवाणी की विध्वंस यात्रा और 1992 का ढांचा -ध्वंस जिसके परिणाम स्वरूप मुंबई दंगे /गोधरा कांड आदि विभाजनकारी घटनाएँ हुईं । इसी ध्रुवीकरण का दुष्परिणाम है केंद्र में सांप्रदायिक / फासिस्ट सरकार की ताजपोशी। 
इसके अतिरिक्त केंद्र सरकार का कार्पोरेटीकरण  भी राजीव शासन द्वारा ही प्रारम्भ किया गया था। शिक्षा मंत्रालय को मानव संसाधन विकास मंत्रालय में परिणित किया जाना उसका जीता जागता प्रमाण है। वाया मनमोहन सिंह जी मोदी साहब का सरकार को कारपोरेट संस्थानों के हित में चलाया जाना 'जनतंत्र'' से 'जन ' का खात्मा करके फासिस्ट तानाशाही में बदलने की प्रक्रिया का प्रारम्भ राजीव शासन से ही हुआ है। इस तथ्य को भी नहीं भुलाया जाना चाहिए। 


संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Monday, 6 July 2015

घर जमाई बन जाइए --- मनमोहन सिंह

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 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Thursday, 28 May 2015

वित्तमंत्री मनमोहन सिंह के उदारीवाद की उपज है मोदी सरकार --- विजय राजबली माथुर

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2011 से ही ब्लाग-पोस्ट्स के माध्यम से सूचित करता रहा हूँ कि मनमोहन सिंह जी ने अपने कार्यकाल में सोनिया जी व राहुल जी पर हज़ारे/केजरीवाल/रामदेव/RSS के सहयोग से भ्रष्टाचार संरक्षण आंदोलन चलवाया था जिसने मोदी साहब को सत्तासीन किया है। यह भेंट अगली कड़ियों पर अमल करने हेतु थी।
Jeevan Yadav यह निष्कर्ष बहुत सी बातों की प्रतीक्षा करेगा




 2011 से ही अपने ब्लाग http://krantiswar.blogspot.in/ के माध्यम से स्पष्ट करता रहा हूँ कि हज़ारे/केजरीवाल/रामदेव के कारपोरेट भ्रष्टाचार संरक्षण आंदोलन को कांग्रेस के मनमोहन सिंह गुट/RSS का समान समर्थन रहा है। जब मनमोहन जी को तीसरी बार पी एम बनाने का आश्वासन नहीं मिला तो मोदी को पी एम बनवा दिया गया है और मोदी के विकल्प के रूप में केजरीवाल को तैयार किया जा रहा है। RSS के कांग्रेस मुक्त भारत की परिकल्पना को अमेरिका प्रवास के दौरान जस्टिस काटजू साहब बखूबी संवार रहे हैं महात्मा गांधी,नेताजी सुभाष और जिन्नाह साहब के विरुद्ध विष-वमन करके। मनमोहन जी के विकल्प के रूप में मोदी व मोदी के विकल्प के रूप में केजरीवाल की ताजपोशी की रूप रेखा व्हाईट हाउस में बराक ओबामा के निर्देश पर तैयार की गई थी और निर्वाचन प्राणाली की खामियों तथा ई वी एम के करिश्मे के जरिये उस पर जनता की मोहर लगवा ली गई है। परंतु साम्यवादियों/वामपंथियों का केजरीवाल की परिक्रमा करना आत्मघाती तो है ही बल्कि देश के लिए भी अहितकर है।
http://krantiswar.blogspot.in/2015/03/blog-post_13.html 
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https://www.facebook.com/aquil.ahmed.7927/posts/458395827647852 


 http://krantiswar.blogspot.in/2015/02/aquil-ahmed.html
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अभी अभी मनमोहन सरकार के वरिष्ठ मंत्री वीरप्पा मोइली ने खुलासा किया है कि मनमोहन सिंह ने हड़बड़ी मे 'उदारवाद' अर्थात आर्थिक सुधार लागू किए थे जिनसे 'भ्रष्टाचार' मे अपार वृद्धि हुई है। 

तो यह वजह है कि मनमोहन सिंह जी ने आर एस एस को ताकत पहुंचाने हेतु अन्ना हज़ारे के आंदोलन को बल प्रदान किया था। सिर्फ और सिर्फ तानाशाही ही भ्रष्टाचार को अनंत काल तक संरक्षण प्रदान कर सकती है और इसी लिए इन आंदोलनकारियों ने लोकतान्त्रिक मूल्यों को नष्ट करने का बीड़ा उठा रखा है। राजनीति और राजनीतिज्ञों के प्रति नफरत भर कर ये लोग जनता को लोकतन्त्र से दूर करना चाहते हैं।
http://krantiswar.blogspot.in/2012/03/blog-post.html

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1962 मे चीनी आक्रमण मे भारत की फौजी पराजय के सदमे से नेहरू जी गंभीर रूप से बीमार पड़ गए तब 1963 मे राधाकृष्णन जी की महत्वाकांक्षा जाग्रत हो गई। के कामराज नाडार ,कांग्रेस अध्यक्ष जो उनके प्रांतीय भाषी थे से मिल कर उन्होने नेहरू जी को हटा कर खुद प्रधान मंत्री बनने और कामराज जी को राष्ट्रपति बनवाने की एक गुप्त स्कीम बनाई। परंतु उनका दुर्भाग्य था कि( वह नहीं जानते थे कि उनके एक बाड़ी गार्ड साहब जो तमिल भाषी न होते हुये भी अच्छी तरह तमिल समझते थे ) नेहरू जी तक उनकी पूरी स्कीम पहुँच गई जिसका खुलासा उस सैन्य अधिकारी ने अवकाश ग्रहण करने के पश्चात अपनी जीवनी मे किया है।..........................आज 48 वर्ष बाद कांग्रेस मे उस कहानी को दूसरे ढंग से दोहराया गया है अब कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया जी गंभीर बीमारी का इलाज करने जब अमेरिका चली गईं तो उनकी गैर हाजिरी मे उनके द्वारा नियुक्त 4 सदस्यीय कमेटी (राहुल गांधी जिसका महत्वपूर्ण अंग हैं)को नीचा दिखाने और सोनिया जी को चुनौती देने हेतु गैर राजनीतिक और अर्थशास्त्री प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह जी ने अपने पुराने संपर्कों(I M F एवं WORLD BANK) को भुनाते हुये फोर्ड फाउंडेशन से NGOs को भारी चन्दा दिला कर और बागी इन्कम टैक्स अधिकारी अरविंद केजरीवाल तथा किरण बेदी (असंतुष्ट रही पुलिस अधिकारी) के माध्यम से पूर्व सैनिक 'अन्ना हज़ारे' को मोहरा बना कर 'भ्रष्टाचार' विरोधी सघन आंदोलन खड़ा  करवा दिया।
http://krantiswar.blogspot.in/2011/09/blog-post.html

 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Friday, 8 August 2014

दुनिया को बेहतर बनाना चाहते हैं तो "घर-परिवार" को बेहतर बनाना होगा ---संजय सिन्हा

मेरे गांव के पांडे जी के घर की कहानी सुन लीजिए।
पांडे जी का बेटा मेरा दोस्त था। हम दोनों बचपन में साथ खेला करते थे। मैंने देखा था कि पांडे जी की पत्नी अपनी सास से बहुत चिढ़ती थीं। वो जब भी खाना पकातीं तो अपनी सास को एक रोटी देकर चुपचाप खिसक लेतीं। दूसरी रोटी के लिए उन्हें पूछती भी नहीं। और जब सास दूसरी रोटी का इंतजार करते-करते थक जातीं, तो चुपचाप थाली छोड़ कर उठ जातीं। ऐसे चलता रहा सास बहू का द्वंद्व।
कई साल बीत गए। सास बूढ़ी होकर मर गईं। तब तक पांडे जी की पत्नी भी बूढ़ी हो चली थीं, और उनके बेटे की शादी भी हो गई थी। मैं एक बार फिर गांव गया तब तक पांडे जी का निधन हो चुका था, तो मैंने देखा कि पांडे जी की पत्नी छत पर बने उसी कमरे में अकेली लेटी थीं, जिसमें कभी उन्होंने अपनी सास को रखा था। वही बिस्तर, वही खटिया, सबकुछ वही। मुझे पल भर को लगा कि मैं पांडे चाची से नहीं, उनकी सास से मिल रहा हूं। थोड़ी देर में उनकी बहू थाली में एक रोटी लेकर आई और उसने उनके आगे रख दिया।
बहू नीचे चली गई तो पांडे चाची ने मुझसे कहा कि बहू बहुत खराब मिल गई है। मुझे उपर ला कर अकेला छोड़ दिया है। एक रोटी दे जाती है, दूसरी मांगने का मौका भी नहीं देती।
मैं हैरान नहीं था। मैं सोच रहा था कि कह दूं कि यही आपका नर्क है। आपने जो किया था अपनी सास के साथ वो आपको जस का तस मिल रहा है। लेकिन मैं नहीं कह पाया।
मैं नीचे आया। मैं बहू यानी अपने दोस्त की पत्नी से बातें करने लगा। बहू ने बातचीत में बताया कि सास बहुत तकलीफ देती थी, इसीलिए उसे उपर शिप्ट कर दिया गया है।
मैं चाह रहा था कि उससे कह दूं कि तुम इस क्रम को तोड़ दो। तुम उस चक्र से मुक्त हो जाओ जिससे तु्‌म्हारी सास, उनकी सास, उनकी सास की सास बंधी रहीं। भूल जाओ उनके नर्क की बात, अपना स्वर्ग सुधार लो। पर पता नहीं क्यों नहीं कह पाया।
बहुत दिनों बाद मेरे दोस्त के बेटे की भी शादी हो गई। उसका बेटा पुणे के पास कहीं रहता है। सॉफ्टवेयर इंजीनियर है। खूब कमाता है। अपनी पसंद की लड़की से शादी की है, और मां के पास नहीं जाता। अभी कुछ दिन पहले फिर गांव गया तो अपने दोस्त की पत्नी से मिला। वो मुझे बहुत बीमार लग रही थी। बीमार से ज्यादा लाचार। मैंने उसकी आंखों में झांका, और देखा कि बेटे की जुदाई का गम उसे सता रहा है। उसका अकेलापन उसे खा रहा है। मैंने हिम्मत की, उससे पूछा कि कैसी हो तुम?
उसने भर्राए गले से कहा, एक ही बेटा था। अपनी खुशियों को छोड़ कर उसे पढ़ाया, इंजीनियर बनाया। अब वो ससुराल का हो गया है। सास को मां बुलाता है, ससुर को पापा। हम तो छूट ही गए। लानत है ऐसी औलाद पर।
मन में आया कि आज कह ही दूं कि ये आपका नर्क है। कुछ साल पहले ही तो आया था तुम्हारे घर, तुम्हारी बुढ़िया सास इस खाट पर लेटी थी, तुमने फेंक कर उसे रोटी दी थी। पर क्या कहता? मैं तो जानता था कि उस बुढ़िया को भी अपना नर्क भुगतना ही था।
और फिर उसी नर्क की अगली कड़ी में मेरे दोस्त की पत्नी को भी ये सब भुगतना ही था। उसका बेटा हर शनिवार गौशाला में जाकर गाय को रोटी खिलाता है, अपने हाथोें से गायों को बाल्टी भर भर कर पानी पिलाता है। किसी ने कह दिया है कि केतु नाराज है, तो सड़क के कुत्तों को दूध भी पिलाता है। लेकिन मां? नहीं मां को तो उसका नर्क मिल कर ही रहेगा।
फिर भी सोच रहा हूं कि जो अपने दोस्त की पत्नी से नहीं कह पाया उसे उसके बेटे की पत्नी से कह दूं। कह दूं कि तोड़ तो उस चक्र को। जो भी हो, अपना स्वर्ग ठीक कर लो।
मैं बहुत से लोगों को जानता हूं जो मेरे आसपास अपने अपने हिस्से का नर्क भुगत रहे हैं, भुगतने वाले हैं। उनकी औलादें गाय को रोटी खिला कर अपना पुण्य कमा लेंगी, लेकिन मां को नहीं खिलाएंगी। फिर भी मेरी गुजारिश है आप सबसे कि जिसने जो किया हो आपके साथ, आप उसे माफ कर दें। उसे इस बात के लिए माफ मत करें कि उसने आपके साथ क्या किया? उसे इस बात के लिए माफ कर दें कि आपके जीवन से उस पाप का चक्र छूट जाए।


साभार : 
https://www.facebook.com/manmohan998/posts/780975261954222

द्वारा :
https://www.facebook.com/sanjayzee/posts/10203799370601406

Saturday, 28 September 2013

राहुल का बयान :मध्यावधी चुनावों का संकेत ---विजय राज बली माथुर

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राहुल गांधी के बयान को आधार बना कर अरुण जेटली द्वारा पी एम साहब को स्तीफ़ा देने की ललकार एक बार फिर से सिद्ध करती है कि मनमोहन जी अंदर-अंदर भाजपा से मिलीभगत करके चलते रहे हैं। जब सोनिया जी अपने इलाज के वास्ते देश से बाहर थीं तो उन्होने हज़ारे/केजरीवाल को आगे करके 'कारपोरेट भ्रष्टाचार' के बचाव का आंदोलन खड़ा करा दिया था जिसमें 'राष्ट्र ध्वज'का घोर अपमान किया गया था। जब फिर सोनिया जी चेक अप के लिए गईं फिर विवाद खड़ा करा दिया। वह पार्टी अनुशासन से परे चलते रहे। पहली बार उनकी पार्टी ने उनको आईना दिखाया है। वह स्तीफ़ा न देकर 'मध्यावधी चुनाव' का रास्ता अख़्तियार कर सकते हैं।


 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त माथुर

Sunday, 8 September 2013

पी एम साहब का मनोरंजक बयान ---विजय राजबली माथुर

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 विशेष विमान में दिया गया पी एम साहब का बयान नितांत भ्रामक है जबकि कुरील साहब का बनाया गया कार्टून वास्तविकता का चित्रण कर रहा है। वस्तुतः सोनिया जी ने 2009 के चुनावों के बाद मनमोहन जी के बजाए प्रणव मुखर्जी साहब को पी एम बनाना चाहा था लेकिन सिंह साहब न हटने पर एड़ गए थे। फिर 2011 में भी उनके बदले मुखर्जी साहब की चर्चा उठने पर हज़ारे आंदोलन चलवा दिया गया जिसके दौरान स्वाधीनता दिवस पर ब्लैक आउट घोषित किया गया था। 2012 में उनके बदले जब फिर मुखर्जी साहब का नाम आया और उनको राष्ट्रपति पद पर प्रोन्नत करने की बात चली तब उस समय भी विदेश यात्रा से लौटते समय विमान में ही कहा था कि वह जहां हैं वहीं ठीक हैं एवं वह तीसरी बार भी पी एम बनने हेतु चुस्त-दुरुस्त हैं। 

अब अपने रिटायरमेंट का संकेत इसलिए दिया है कि सोनिया कांग्रेस को चुनावों में परास्त करने का मुक्कमल बंदोबस्त कर चुके हैं। इसमे भी 'राहुल गांधी' को पी एम बनाने का शगूफा भ्रमित करने के लिए इसलिए छोड़ा गया है क्योंकि वह बखूबी जानते हैं कि 'राहुल' की माता जी एवं ननिहाल के लोग राहुल को पी एम बनने ही नहीं देंगे तो चटकारा लेने में हर्ज ही क्या  है?

राष्ट्रपति महोदय अपने निर्वाचन के समय वेंकट रमण साहब द्वारा वी पी सिंह साहब को दिये आश्वासन    
 की भांति ही 'मुलायम सिंह जी' तथा 'ममता बनर्जी साहिबा' को आश्वासन दे चुके हैं कि स्पष्ट बहुमत न होने की दशा में वह इन लोगों को वरीयता देंगे। इन दोनों में से ही अगला पी एम बनने की संभावना है बाकी सभी मनोरंजन करने का काम कर रहे हैं।

 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त माथुर