Wednesday, 21 October 2015

सहज ही अपना बनाने की कला में सबसे आगे बिहार वाले --- -- -वीर विनोद छाबड़ा

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Vir Vinod Chhabra
20-10-2015 
सहज ही अपना बनाने की कला में सबसे आगे बिहार वाले। 
-वीर विनोद छाबड़ा 
कुछ देर पहले मेरे मित्र विजयराज बली  माथुर ने ईटीवी बिहार के हवाले से पोस्ट डाली है कि बिहार की एक रैली में अपेक्षित भीड़ नहीं जुटी। इससे खिसिया कर बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने बिहारियों को बेवकूफ़ कह डाला।
इस बयान का नफ़ा-नुक्सान कितना होगा यह तो चुनाव पंडित जानें। लेकिन मुझे बिहारियों को बेवकूफ कहने पर दिली तकलीफ़ हुई। मुझे तो लगता है बिहारियों से ज्यादा चतुर कोई और है ही नहीं। सत्तर के शुरुआती दशक में लखनऊ यूनिवर्सिटी में मेरा कई बिहारी छात्रों से साबका पड़ा। सबसे ज्यादा मुझे आकर्षित किया इनकी भोजपुरी भाषा ने। शीरीं ज़बान। इतनी मिठास तो उर्दू बोलने वाले भी नहीं घोल सके। दो बिहारियों को बोलते हुए सुनता था तो कभी मन नहीं हुआ कि ये चुप हों।
भोजपुरी का मैं सबसे पहली बार तब क़ायल हुआ जब १९६२ में 'गंगा मैया तोहे पियरी चढ़इबो' देखी थी। वो स्कूली दिन थे। उसके बाद कई भोजपुरी फ़िल्में देखीं। लेकिन पहली बार 'भोजपुरी लाईव' लखनऊ यूनिवर्सिटी में ही सुनी।
मैं इंदिरा नगर में अस्सी के दशक की शुरुआत में ही आ गया था। यह इलाका तब निर्मित हो रहा था। एशिया की सबसे बड़ी कॉलोनी कहा गया था तब इसे। साठ प्रतिशत श्रमिक बिहार के सासाराम आदि क्षेत्रों से ही संबंधित थे। मेरा घर बनाने वाले भी बिहार के थे। बगल में गोमती नगर भी इन्हीं बिहारियों की मेहनत से बना।
नौकरी शुरू की तो वहां भी बिहार से आये कर्मचारियों की खासी संख्या थी। अपने अड़ोस-पड़ोस में भी खासी संख्या में हैं। सब स्थाई निवासी हो गए हैं यहां के। मेरे पड़ोसी सासाराम से हैं। अपने घर का नाम भी सासाराम निवास रखे हैं। मैंने इनमें एक विशेषता देखी है कि किसी को सहज ही 'विधिवत' अपना बना लेते हैं। व्यवहार से भी और ज़बान से भी। इस मामले में पंजाबियों से ये निश्चित ही बीस हैं।
आप अगर उनके मित्र हैं तो संकट के समय दीवार बन जायेंगे। लड़ने-भिड़ने के साथ-साथ ज़रूरत पड़ने पर जान भी दे देंगे। मेरे पास आंकड़े नहीं हैं, लेकिन सुनी हुई बात है कि बिहार के लोग हिसाब-किताब में बहुत तेज होते हैं। कभी कहा जाता था कि आईएएस में बिहार के लोग ही ज्यादा हुआ करते थे। और इसके अलावा साहित्यिक पुस्तकें और पत्र-पत्रिकायें यहीं खरीदी और पढ़ी जाती थीं। सैकड़ों साल पहले शिक्षा का केंद्र यहीं नालंदा में ही तो था। कूटनीति सिखाने वाले चाणक्य की जन्मभूमि और कर्मभूमि बिहार ही तो है। यहीं के कौटिल्य ने ही अर्थशास्त्र पढ़ाया है। गणित के मर्मज्ञ आर्यभट्ट को भला कौन भूल सकता है।
यह बिहार ही है जहां बोलचाल में सबसे ज्यादा अंग्रेज़ी के शब्दों का प्रयोग होता है। दिवंगत शरद जोशी भी कह गए हैं कि अंग्रेज़ कौम और अंग्रेज़ी अगर ख़त्म भी हो जाए तो भी कब्र में लेटी अंग्रेज़ों की आत्मा को यह सुख रहेगा कि अंग्रेज़ी बिहार में ज़िंदा है। और फिर क्रांतियों का जनक तो बिहार रहा ही है। कई बार रथों के रास्ते भी रोके हैं और बदले हैं इसने।
यूं एनडीटीवी के रवीश के प्राईम टाईम को देखते हुए लगता है मैं उसे देख नहीं रहा हूं उनके साथ बिहार घूम रहा हूं। आदमी चाहे छोटा हो या बड़ा, ये बिहार वाले जहां भी जाते हैं, अपनी हाड़-तोड़ मेहनत और बौद्धिकता से उस प्रदेश और उस देश के नमक का हक़ ज़रूर अदा करते हैं। 

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२०-१०-२०१५


https://www.facebook.com/virvinod.chhabra/posts/1687131944853761



 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Monday, 19 October 2015

क्यों ये हमको उलझाए रखना चाहते हैं --- अरुण सेठी

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Arun Sethi 
18-10-2015 at 3:07pm
ज़रा गौर करिये. मालूम हो तो ठीक, नी तो पढ़िये समझीये. पीछे क्या चल रहा है देश में. क्यों ये खट्टर-पट्टर रोज हमको उलझाए रखना चाहते हैं.
खबर है जिस अमरीका की हम कसमें खाते हैं. उस अमरीका के कुछ लोगों ने ब्रिटेन की महारानी को लिखा है कि आप हमारे देश को अपने हाथ में ले लो. ये सच है आज अमरीका वो अमेरिका नहीं रहा है. आज के अमरीका के बारे में हिलेरी क्लिंटन ने दो साल पहले बोला था. चुनाव लड़ते नेता हैं लेकिन लड़वाते धन-माफिया हैं. रशिया ने हफ्ते भर में बता दिया कि ड्रग, आतंक, केमिकल के खिलाफ जो इराक, अफगान, सीरिया ओमान में हुआ उसके पीछे क्या था. अमरीका में आज तक क़ानून व्यवस्था कोर्ट चुस्त-दुरुस्त है. इसलिए दिखता नहीं है वरना वही सब कुछ हो रहा है. जो हमारे देश में आज बेखौफ खुल्लम-खुल्ला चल रहा है.
मेरी इनसे कोई पुश्तैनी दुश्मनी नहीं, ना इन्होंने कभी मेरे घर पर पत्थर फेंके, ना ये कोई मेरे बाजूवाले केमिस्ट से दवा लेते. ज़रा समझने की कोशिश करो.
इनकी जिद है. दुनियां में सिर्फ दो रहे. इम्प्लायर एंड इम्प्लाई, सेलर एंड बायर... बस. कोई किसान नहीं, कोई दुकानदार नहीं. जमीं इनकी, खेत इनके, दुकान इनकी, पानी इनका, नदी इनकी, पहाड़ इनका, बिजली इनकी, पेट्रोल इनका, गेस इनकी, रेल इनकी और सरकार भी इनकी. सब इनका
खबर है पानी में करोड़ों कमाए.. श्याम बिहारी अग्रवाल कांट्रेक्टर “रेल नीर” नें रेलवे में दस साल में पानी पिलाकर करोड़ों कमाए. घर में नोटों से भरी पेटियां ही पेटियां मिली है.
शायद इसीलिए रेल्वे मंत्री सुरेश प्रभु ने तीन दिन पहले कहा था. देश में रेल चलाना बहुत मुश्किल है. मतलब अब तो अदानी या अंबानी ही चला सकते है.
कुछ दिन पहले रेल्वे का डीजल का ठेका सरकार ने अंबानी को दे दिया कल पॉवर सप्लाई का ठेका अदानी को दे दिया. आप देखीये हमारे पैसों से खड़ी रेल हमारा देश, हमारा कोयले की खदानें, गेस की खदान, हमारी निकालने वाली ONGC, COAL INDIA, हमारी नेशनल थर्मल पॉवर, और सरकार डीजल और बिजली अंबानी और अदानी से लेगी. इन लोगों ने देश की कमाऊ पूत कंपनियों को पिछले दस-पन्द्रह सालों में सिस्टमेटिकली बरबाद किया फिर इनको तबाह किया. ताकि इन्हें बेचा और सस्ते में बेचा जा सके और ये ही इनके सब अदानी अंबानी खरीद कर हमको लूटें
आज की एक और खुश खबर :
उत्तर मध्य रेलवे ने चुनिंदा स्टेशनों को जिसमे आगरा ,इलाहबाद ,कानपूर से लेकर मुरैना ,और उरई तक शामिल रहेंगे ,को हवाई-अड्डों जैसी सुविधाएँ देने का प्लान बनाया है ! ये स्टेशन 45 साल के लिए लीज पर दिए जाएंगे ,ये सुविधाएँ वे देंगे जो स्टेशन को लीज पर लेंगे! ये सब बेवक़ूफ़ बनने के धंधे हैं ये कुछ नहीं देंगे. पानी साफ़, स्वच्छ मिलेगा पर क्या मिल रहा है पूछो खंडवावासियों से
शहडोल नगर में रिलायंस की तमाम मशीनें घूम रही हैं शहर आबादी के बीचों-बीच मीथेन गेस के लिए ड्रिलिंग हो रही है. धूल, धुंआ, आवाज शोर, गेस की स्मेल, आग की वजह से लोगों का जीना दूभर हो गया है कंपन और आग के कारण लोग दहशत में हैं लेकिन कोई नेता, कोई कलेक्टर, कोई पुलीस आफिसर की हिम्मत नहीं कि चुन भी कर ले क्यों...क्योंकि कंपनी विकास के पापा की जो है
दोस्तों गर आप बिजनेसमेन हो तो बैंक से ली लिमिट पर आपको 12.30 से 12.70% रेट ऑफ इंटरेस्ट चार्ज होता है किसानों की तो हर तरफ से मरण है उनको 16% लेकिन कार पर 10% रेडूय्सींग. क्यों? क्योंकि कार बनाने वाला हमको पलका के कर्जे में करने वाला देश पर अहसान कर रहा है. इसलिए अम्बानियों को अदानियों को कर्जे मे, इंटरेस्ट में, टेक्स में, जमीनों में सरकार छूट देती है और नुक्सान हो जाये तो हमारे से टेक्स में वसूले पैसों से उनके नुक्सान की भरपाई करती है.
ये है इनके सबका साथ; सबका विकास का नारा 
अब सब में कौन-कौन हैं. ये आप समझ सकते हो. और विकास तो देख ही रहे है किस किस का हो रहा है. रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड नें इस साल रिकार्ड कमाई करी पहली बार पर गेलन क्रूड से पेट्रोल निकालने में ऐसी भारी कमाई हुई है. लेकिन पेट्रोल डीजल वहीँ खड़े हैं या बड रहे हैं. बाजार, किरसान रो रहा है ये हंस रहे हैं.


संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Sunday, 18 October 2015

आज़ादी और विवेक के पक्ष में : -- कौशल किशोर


Kaushal Kishor
17-10-2015 
प्रिय मित्र,
पांच लेखक-संगठनों -- प्रलेस, जलेस, जसम, दलेस और साहित्य-संवाद -- ने दिल्ली में बैठक कर लेखकों की ओर से जारी प्रतिरोध पर एक साझा बयान जारी किया है, साथ ही इस महीने की 20 और 23 तारीख के लिए साझा कार्यक्रम भी तय किये हैं. आप यह बयान और कार्यक्रम की घोषणा देख सकते हैं. -- कौशल किशोर, अध्यक्ष, जन संस्कृति मंच , उत्तर प्रदेश
आज़ादी और विवेक के पक्ष में :
प्रलेस, जलेस, जसम, दलेस और साहित्य-संवाद का साझा बयान
और आगामी कार्यक्रमों की सूचना
देश में लगातार बढ़ती हुई हिंसक असहिष्णुता और कट्टरपंथ के ख़िलाफ़ पिछले कुछ समय से जारी लेखकों के प्रतिरोध ने एक ऐतिहासिक रूप ले लिया है. 31 अगस्त को प्रोफेसर मल्लेशप्पा मादिवलप्पा कलबुर्गी की हत्या के बाद यह प्रतिरोध अनेक रूपों में प्रकट हुआ है. धरने-प्रदर्शन, विरोध-मार्च और विरोध-सभाएं जारी हैं. इनके अलावा बड़ी संख्या में लेखकों ने साहित्य अकादमी से मिले अपने पुरस्कार विरोधस्वरूप लौटा दिए हैं. कइयों ने अकादमी की कार्यकारिणी से इस्तीफ़ा दिया है. कुछ ने विरोध-पत्र लिखे हैं. कई और लेखकों ने वक्तव्य दे कर और दीगर तरीक़ों से इस प्रतिरोध में शिरकत की है.
दिल्ली में 5 सितम्बर को 35 संगठनों की सम्मिलित कार्रवाई के रूप में प्रो. कलबुर्गी को याद करते हुए जंतर-मंतर पर एक बड़ी प्रतिरोध-सभा हुई थी. इसे ‘विवेक के हक़ में’ / ‘इन डिफेन्स ऑफ़ रैशनैलिटी’ नाम दिया गया था. आयोजन में भागीदार लेखक-संगठनों – प्रलेस, जलेस, जसम, दलेस और साहित्य-संवाद -- ने उसी सिलसिले को आगे बढाते हुए 16 सितम्बर को साहित्य अकादमी के अध्यक्ष विश्वनाथ प्रसाद तिवारी को एक ज्ञापन सौंपा जिसमें उनसे यह मांग की गयी थी कि अकादमी प्रो. कलबुर्गी की याद में दिल्ली में शोक-सभा आयोजित करे. विश्वनाथ त्रिपाठी, मुरली मनोहर प्रसाद सिंह, चंचल चौहान, रेखा अवस्थी, अली जावेद, संजय जोशी और कर्मशील भारती द्वारा अकादमी के अध्यक्ष से मिल कर किये गए इस निवेदन का उत्तर बहुत निराशाजनक था. एक स्वायत्त संस्था के पदाधिकारी सत्ता में बैठे लोगों के खौफ़ को इस रूप में व्यक्त करेंगे और शोक-सभा से साफ़ इनकार कर देंगे, यह अप्रत्याशित तो नहीं, पर अत्यंत दुखद था. अब जबकि अकादमी की इस कायर चुप्पी और केन्द्रीय सत्ता द्वारा हिंसक कट्टरपंथियों को प्रत्यक्ष-परोक्ष तरीके से दिए जा रहे प्रोत्साहन के खिलाफ लेखकों द्वारा पुरस्कार लौटाने से लेकर त्यागपत्र और सार्वजनिक बयान देने जैसी कार्रवाइयां लगातार जारी हैं, यह स्पष्ट हो गया है कि लेखक समाज इन फ़ासीवादी रुझानों के विरोध में एकजुट है. वह उस राजनीतिक वातावरण के ख़िलाफ़ दृढ़ता से अपना मत प्रकट कर रहा है जिसमें बहुसंख्यावाद के नाम पर न केवल वैचारिक असहमति को, बल्कि जीवनशैली की विविधता तक को हिंसा के ज़रिये कुचल देने के इरादों और कार्रवाइयों को ‘सामान्य’ मान लिया गया है.
विरोध की स्वतःस्फूर्तता और व्यापकता से साफ़ ज़ाहिर है कि इस विरोध के पीछे निजी उद्देश्य और साहित्यिक ख़ेमेबाज़ियाँ नहीं हैं, भले ही केन्द्रीय संस्कृति मंत्री ऐसा आभास देने की कोशिश कर रहे हों. इस विरोध के अखिल भारतीय आवेग को देखते हुए मंत्री का यह आरोप भी हास्यस्पद सिद्ध होता है कि विरोध करने वाले सभी लेखक एक ही विचारधारा से प्रेरित हैं, कि वे सरकार को अस्थिर करने की साज़िश में शामिल हैं. सब से दुर्भाग्यपूर्ण है उनका यह कहना कि लेखक लिखना छोड़ दें, फिर देखेंगे. लेखक लिखना छोड़ दें -- यही तो दाभोलकर, पानसरे और कलबुर्गी के हत्यारे भी चाहते हैं. केंद्र सरकार इन हत्याओं की निंदा नहीं करती, लेकिन प्रतिरोध करने वाले लेखकों की निंदा करने में तत्पर है. इससे यह भी सिद्ध होता है कि मौजूदा राजनीतिक निज़ाम के बारे में लेखकों के संशय निराधार नहीं हैं. ये वही संस्कृति मंत्री हैं, जिन्होंने दादरी की घटना के बाद हत्यारी भीड़ को चरित्र का प्रमाणपत्र इस आधार पर दिया था कि उसने हत्या करते हुए शालीनता बरती थी और एक सत्रह साल की लडकी को छुआ तक नहीं था. लम्बे अंतराल के बाद, स्वयं राष्ट्रपति के हस्तक्षेप करने पर, प्रधानमंत्री ने चुप्पी तोड़ी भी तो उसमें उत्पीड़क और पीड़ित की शिनाख्त नहीं थी. उसमें सबके लिए शांति के उपदेश के सिवा और कुछ न था. सत्तारूढ़ राजनीतिक पार्टी के अध्यक्ष बिहार के चुनावों के दौरान लगातार बयान दे रहे हैं कि दादरी के तनाव का असली कारण पुलिस की 'एकतरफ़ा' कार्रवाई है. यह सुनियोजित भीड़ द्वारा की गयी हत्या के लिए मृतक को ज़िम्मेदार ठहराने की कोशिश नहीं तो और क्या है!
लेखकों ने बार बार कहा है कि उनका विरोध किसी एक घटना या एक संस्था या एक पार्टी के प्रति नहीं है. उनका विरोध उस राजनीतिक वातावरण से है जिसमें लेखकों को, और अल्पसंख्यकों तथा दलितों समेत समाज के सभी कमज़ोर तबकों को, लगातार धमकियां दी जाती हैं, उन पर हमले किए जाते हैं, उनकी हत्या की जाती है और सत्तातंत्र रहस्यमय चुप्पी साधे बैठा रहता है. कुछ ही समय पहले तमिल लेखक पेरूमल मुरुगन को इन्हीं परिस्थितियों में विवश हो कर अपनी लेखकीय आत्महत्या की घोषणा करनी पड़ी थी. ऐसे में साहित्य अकादमी जैसी स्वायत्त संस्थाओं की ज़िम्मेदारी है कि वे आगे आयें और नागरिक आज़ादियों के दमन के इस वातावरण के विरुद्ध पहलक़दमी लें. हम लेखक-संगठन लेखकों के इस विरोध अभियान के प्रति अपनी एकजुटता व्यक्त करते हैं. हम साहित्य अकादमी से मांग करते हैं कि वह न केवल इस दुर्भाग्यपूर्ण वातावरण की कठोर निंदा करे, बल्कि उसे बदलने के लिए देश भर के लेखकों के सहयोग से कुछ ठोस पहलकदमियां भी ले.
लेखकों-संस्कृतिकर्मियों के इस विरोध की एकजुटता को अधिक ठोस शक्ल देने के लिए हमने आनेवाली 20 तारीख को ‘आज़ादी और विवेक के हक़ में प्रतिरोध-सभा’ करने का फ़ैसला किया है. प्रतिरोध-सभा उस दिन अपराह्न 3 बजे से प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया के सभागार में होगी. 23 तारीख को, जिस दिन साहित्य अकादमी की कार्यकारिणी की बैठक है, हम बड़ी संख्या में श्रीराम सेन्टर, सफ़दर हाशमी मार्ग से रवीन्द्र भवन तक एक मौन जुलूस निकालेंगे और वहाँ बैठक में शामिल होने आये सदस्यों को अपना ज्ञापन सौंपेंगे, ताकि अकादमी की कार्यकारिणी मौजूदा सूरते-हाल पर एक न्यायसंगत नज़रिए और प्रस्ताव के साथ सामने आये.
मुरली मनोहर प्रसाद सिंह (जनवादी लेखक संघ)
अली जावेद (प्रगतिशील लेखक संघ)
अशोक भौमिक (जन संस्कृति मंच)
हीरालाल राजस्थानी (दलित लेखक संघ)
अनीता भारती (साहित्य संवाद)

Thursday, 15 October 2015

बाल वीरांगना मुद्दू तीर्थाहल्ली ने पुरस्कार वापिस कर दिग्गजों को पछाड़ा

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http://navbharattimes.indiatimes.com/state/other-states/other-cities/class-11-girl-to-return-karnataka-literary-award/articleshow/49346597.cms?utm_source=facebook.com&utm_medium=referral&utm_campaign=Award141015

नवोदित साहित्यकार  11 वीं कक्षा की छात्रा  मुद्दू तीर्थाहल्ली ने  इन चर्चाओं के बीच कि  पुरस्कार वापसी व्यर्थ है बेझिझक साहित्य अकादमी का पुरस्कार लौटा कर अपने ' शौर्य  ' को दिखा दिया है। अब बुज़ुर्गों को इस बालिका से प्रेरणा लेकर इस अभियान में आगे आना चाहिए। 


(संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश)

मुलायम का बयान साफ करता है कि वे हैं आरएसएस के एजेंट --- मोहम्मद शोएब

केंद्र सरकार के इशारे पर मानवाधिकार आयोग सदमे से मरे किसान की मौत को
बता रहा स्वाभाविक मौत- रिहाई मंच

बिना किसान के घर गए मानवाधिकार आयोग ने लगा दी रिपोर्ट
मुलायम का बयान साफ करता है कि वे हैं आरएसएस के एजेंट
मैनपुरी के मुस्लिम विरोधी हिंसा के मास्टरमाइंड संजीव यादव का सपा से
निलम्बन न होना मुलायम के बयान को सही साबित करता है
दलितों और मुसलमानों के हत्यारे रणवीर सेना के संस्थापक के बेटे को बिहार
में सपा द्वारा चुनाव लड़ाना शर्मनाक


लखनऊ 14 अक्टूबर 2015। रिहाई मंच ने केंद्र सरकार पर किसान विरोधी होने
का आरोप लगाते हुए कहा है कि सरकार किसानों की आत्महत्या के मामलों की
जांच में लीपा-पोती में लिप्त है और किसानों की फसल बर्बाद हो जाने के
बाद हुई मौतों को प्राकृतिक साबित करने पर तुली हुई है। मंच ने बिहार
चुनाव में बिहार के सैकड़ों दलितों और मुसलमानों के हत्यारे रणवीर सेना
के संस्थापक बरमेश्वर मुखिया के बेटे इंदू भूषण सिंह को सपा द्वारा तरारी
विधान सभा सीट से चुनाव लड़ाने को सपा के दलित और मुसलमान विरोधी राजनीति
का ताजा उदाहरण बताया है।

रिहाई मंच द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति में मंच के नेता राजीव यादव ने
कहा है कि 14 अप्रैल 2014 को आजमगढ़ के पल्हनी ब्लाक के सराय सादी गांव
के किसान रामजन्म राजभर की तुफान और ओला वृष्टि के कारण फसल नुकसान होने
पर सदमे से हुई मौत पर केंद्र सरकार अधिकारीयों से झूठे रिपोर्ट लगवा रही
है कि किसान की मौत प्राकृतिक कारणों से हुई। उन्होंने बताया कि इस घटना
पर रिहाई मंच के प्रवक्ता शाहनवाज आलम द्वारा सवाल उठाने पर राष्ट्रीय
मानवाधिकार आयोग द्वारा इसकी जांच कृष्ण कांत नामक अधिकारी से कराई और
संगठन को अपनी रिपोर्ट भी भेजी है। जिसमें मौत को प्राकृतिक बताई गई है।
राजीव यादव ने कहा कि रिपोर्ट आ जाने के बाद जब इंसाफ मुहिम के तहत
किसानों की बदहाली का सवाल उठाने वाले मसीहुद्दीन संजरी के नेतृत्व में
विनोद यादव, अनिल यादव और तारिक शफीक ने पीडि़त परिवार के घर का दौरा
किया तो पीडि़त परिवार के लोगों ने आश्चर्य व्यक्त किया कि यहां तो कोई
भी जांच करने आया ही नहीं था तो रिपोर्ट कैसे लगा दी गई। उन्होंने सवाल
उठाया कि किसान रामजनम की मौत के बाद स्थानीय मजिस्ट्रेट के कोश से दो
लाख रुपए की लिखित आर्थिक सहायता का आश्वासन देने के बावजूद आज तक अखिलेश
यादव सरकार द्वारा सहायता न देना सरकार के किसानों को ठगने की नीति को
उजागर करता है।

रिहाई मंच के अध्यक्ष मोहम्मद शुऐब ने मुलायम सिंह के इस बयान कि सपा और
भाजपा की विचारधारा देशभक्ति के सवाल पर बिल्कुल एक जैसी है को मुलायम
सिंह द्वारा सच्चे दिल से दिया गया बयान बताया है। उन्होंने कहा कि उम्र
के इस पड़ाव पर जो सच उन्होंने सार्वजनिक तौर पर स्वीकार किया है उसको
जनता पहले से जानती है कि वे संघ परिवार के एजंेट हैं और इसीलिए बाबरी
मस्जिद को तोड़ने और मुसलमानों की हत्याओं को देशभक्ति बताने वाले भाजपा
नेताओं लालकृष्ण आडवाणी, उमा भारती और मुरली मनोहर जोशी को उनकी पिछली
सरकार ने रायबरेली कोर्ट में हलफनामा देकर कहा था कि इन तीनों की बाबरी
मस्जिद ढ़हाने में कोई भूमिका नहीं थी। उन्होंने कहा कि मुसलमानों को
राष्ट्रविरोधी मानने और उनके कत्लेआम को देशभक्ति बताने वाली संघ परिवार
की विचारधारा में यकीन रखने के कारण ही शायद उन्होंने कानपुर में हुई
मुस्लिम विरोधी हिंसा के मास्टरमाइंड रहे तत्कालीन एसएसपी एसी शर्मा
जिनकी उस घटना में संल्पितता की जांच के लिए जस्टिस माथुर कमीशन बनाया
गया था कि रिपोर्ट को उन्होंने लगातार सिर्फ दबाए ही नहीं रखा बल्कि
कानपुर के मुसलमानों के इस हत्यारे को डीजीपी भी बना दिया।

रिहाई मंच अध्यक्ष ने कहा कि पिछले दिनों मैनपुरी के तीनी करहाल इलाके
में गोकशी के झूठे अफवाह के बाद हुई मुस्लिम विरोधी हिंसा में मुख्य
भूमिका निभाने वाले नगर पंचायत अध्यक्ष और सपा नेता संजीव यादव का अभी तक
सपा से निलम्बन न होना और पुलिस की तहरीर में सपा नेता के भाई टीटू
द्वारा किरोसिन तेल और डीजल लाकर मुस्लिमों और पुलिस की गाड़ीयों को
जलाने की बात आना भी साबित करता है कि सपा मुखिया की संघी मार्का
देशभक्ति मुसलमानों की सुरक्षा के लिए खतरा बनती जा रही है। मोहम्मद शुऐब
ने कहा कि मुलायम सिंह के पैतृक क्षेत्र में उनके नगर पंचायत अध्यक्ष और
इस मुस्लिम विरोधी हिंसा के मास्टरमाइंड संजीव यादव द्वारा 2012 में
चुनाव के दौरान खुलेआम यह घोषणा करना कि उसे मुसलमानों का वोट नहीं
चाहिए, भी मुलायम सिंह द्वारा भाजपा से अपनी वैचारिक नजदीकी के कबूलनामे
को सही साबित करता है। रिहाई मंच अध्यक्ष ने कहा कि सपा के तथाकथित
मुस्लिम चेहरे आजम खान को मुलायम सिंह के इस बयान पर अपनी स्थिति स्पष्ट
करनी चाहिए।

द्वारा जारी-
शाहनवाज आलम
(प्रवक्ता, रिहाई मंच)
09415254919

Wednesday, 14 October 2015

क़लम के मज़दूर हैं मुद्रा राक्षस --- -वीर विनोद छाबड़ा

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क़लम के मज़दूर हैं मुद्रा राक्षस। :
-वीर विनोद छाबड़ा 
आज यूपी बैंक इम्प्लॉईज़ यूनियन ने आल इंडिया बैंक इम्प्लॉईज़ यूनियन के प्रेरणा स्त्रोत कामरेड प्रभात कार की १०६वीं जन्मतिथि के अवसर पर स्मृति जन-सम्मान समारोह २०१५ आयोजित किया।
इस अवसर पर जनपक्षधर लेखक मुद्राराक्षस जी को सम्मानित किया जाना था। परंतु दुर्भाग्यवश समारोह शुरू होने से ठीक पहले मुद्राजी अस्वस्थ हो गए। उन्हें कार में ही सम्मानित करके तुरंत अस्पताल में भर्ती करा दिया गया।
मुद्राजी की अस्वस्था के दृष्टिगत कार्यक्रम को संक्षिप्त करते हुए अध्यक्ष सुभाष बाजपाई ने कहा कि बैंक यूनियन का यह सौभाग्य है कि एक चिंतक के जन्मदिन के अवसर पर मुद्राजी चिंतक, ट्रेड यूनियन लीडर और बहुआयामी जनपक्षधर लेखक को सम्मानित किया गया है।
मुद्राजी के साथ विगत लंबे समय से जुड़े दूरदर्शन के पूर्व निदेशक और सुप्रसिद्ध रंगकर्मी विलायत जाफ़री ने बताया कि १९४७ में जब पार्टीशन हुआ तो हालात बहुत ख़राब थे। मज़हब को आधार बनाते हुए बच्ची का एडमिशन नहीं हो पा रहा था। ऐसे आड़े वक़्त में मुद्राजी बहुत काम आये। वो क्रांतिकारी थे ,शायद ही कोई रहा हो जिनसे उनका झगड़ा न हुआ हो। लेकिन मुझसे कभी नहीं हुआ। जब मैं लखनऊ आया तो उनसे बहुत मुलाक़ातें हुई। दूरदर्शन के लिए बहुत काम किया उन्होंने। जब आंदोलन में कहीं जाते तो मुझे एक पर्ची पकड़ा देते - मेरे परिवार का ख्याल रखना। अच्छा इंसान ही अच्छा लेखक होता है। आज मुद्राजी को सम्मानित करके बहुत ख़ुशी हुई।
मुद्राजी से पिछले लगभग चालीस वर्षों से जुड़े सुप्रसिद्ध समालोचक वीरेंद्र यादव को आपातकाल का वो दौर आया जब उत्पीड़ित होकर मुद्राजी लखनऊ आये थे। वो मेरे जैसे लेखकों के निर्माण का दौर था। मुद्रा जी को अपने बीच पाना बड़ी उपलब्धि थी। उनकी आत्मीय प्रवृति ने पीढ़ियों का अंतर मिटा दिया। शायद ही कोई दिन गुज़रता हो जब उनसे भेंट न होती हो। आपातकाल को लेकर उन्होंने एक उपन्यास लिखा -शांतिभंग। अन्याय और चिंतन के हर मौके पर वो हस्तक्षेप वाली स्थिति में मिले। प्रतिरोध में रहे सदैव। इसी कारण बहुत नुकसान और कष्ट में रहे। वो क़लम के मज़दूर थे। रोज़ कुआं खोदो और पानी पियो वाली स्थिति रही उनकी।
यूपी बिजली कर्मचारी संघ के अध्यक्ष कामरेड सदरूदीन राणा बैंक इम्प्लॉईज़ यूनियन को बधाई देते हुए कहा आज मुल्क में सांस्कृतिक और साहित्यिक हालात बहुत खराब हैं। ऐसे में मुद्राजी को सम्मानित करके बैंक यूनियन ने बहुत दिलेरी का काम किया है। एक शेर है - मौत से बचने की एक तरकीब है, लोगों के ज़हन में ज़िंदा रहो।
वरिष्ठ कहानीकार शकील सिद्दीकी ने मुद्राजी के साथ बिताये पलों को याद किया। जब-जब मुद्राजी लखनऊ आये तो मैं ट्रेड यूनियन और प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़ा था। जल्द ही मुद्राजी से भी जुड़ गया। मुद्राजी ने हर क्षेत्र में जितने साहसिक क़दम उठाये, उतने किसी ने नहीं। उनमें प्रतिरोध की ज्वाला कभी कम नहीं हुई। उन्होंने ज़ुल्मों की मुख़ालफ़त की, रहनुमाई की, धरने दिए। ज़िस ऊर्जा और आदर्शों को लेकर वो दिल्ली से लखनऊ आये थे उससे सभी को बहुत फ़ायदा हुआ।
कार्यक्रम का संचालन बैंक यूनियन के मंत्री डॉ वीके सिंह ने करते हुए कहा कि मुद्राजी ने एक कथा में कहा है बैंक में एक मशीन होगी जिसे चलाने के लिए एक आदमी होगा और रखवाली के लिए एक कुत्ता होगा।
अंत में सभी ने मुद्राजी के शीघ्र स्वस्थ होने की कामना की।
समारोह में जनसंदेश टाइम्स के संपादक सुभाष राय, कौशल किशोर, डॉ विजयबली माथुर आदि अनेक गणमान्य लेखक,साहित्यप्रेमी व चिंतक मौजूद थे। 

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१३-१०-२०१५


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(यह वीर विनोद भाई साहब का स्नेह हो सकता है जो उन्होने मेरे नाम के पूर्व डॉ लिख दिया है। हालांकि मैंने उनसे तो अपने 'आयुर्वेदरत्न' होने व वैद्य के रूप में भी रजिस्टर्ड होने तक का ज़िक्र  नहीं किया है।  --- विजय राजबली माथुर )

Monday, 12 October 2015

नवरात्र नौ औषद्धियों द्वारा स्वास्थ्य रक्षा का पर्व --- विजय राजबली माथुर

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कल से शुरू होने वाले नवरात्र में इन नौ औषद्धियों के प्रयोग से शरीर को नीरोग रखने का प्राविधान  था किन्तु 'विकास' के इस पूंजीवादी युग में 'पूंजी' की 'पूजा' होने लगी है। इन नौ दिनों में कान-फोडू भोंपू बजा कर ध्वनि प्रदूषण फैलाया जाएगा। लोगों को गुमराह करके व्यापारी वर्ग के हित साधे जाएँगे। पुजारी वर्ग जो ब्राह्मण जाति से आता है इन व्यापारियों का महिमा-मंडन करेगा। 'ढ़ोंगी' व 'एथीस्ट ' मिल कर इस पोंगा पंथ को 'धर्म ' की संज्ञा से नवाजेंगे । जनता उल्टे उस्तरे से मूढ़ी जाएगी उसका शोषण जारी रहेगा। कोई 'सत्य ' बोलना नहीं चाहता बल्कि सत्य कहने वाले का उपहास ज़रूर उड़ाते हैं खास तौर पर ढ़ोंगी व एथीस्ट।

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वस्तुतः ऋतु परिवर्तन के समय प्राचीन मनीषियों ने चार नवरात्र का प्राविधान किया था जिनमें से दो को ब्राह्मणों ने अपने लिए 'गुप्त' रूप से मनाने के लिए  सुरक्षित कर लिया था। शेष जनता के लिए  ग्रीष्म व शरद काल  के नवरात्र सार्वजनिक रूप से बताए गए थे। कल दिनांक 13 अक्तूबर से प्रारम्भ ये शरद कालीन नवरात्र हैं। ढ़ोंगी-पाखंडी पद्धति से ये मनाए जा रहे हैं। जगह-जगह रास्ता रोक कर 'देवी जागरण' के नाम पर जनता को ठगा जा रहा है। कुंवारी कन्याओं के पूजने का आडंबर किया जाता है परंतु समाज में उनकी स्थिति इस ढ़ोंगी पूजा की पोल खोल देती है। 

क्या होना चाहिए :

वास्तव में हवन-यज्ञ पद्धति ही पूजा की सही पद्धति है। क्यों? क्योंकि 'पदार्थ- विज्ञान ' (MATERIAL SCIENCE ) के अनुसार  हवन की आहुती  में डाले गए   पदार्थ अग्नि द्वारा  परमाणुओं  (ATOMS ) में विभक्त कर दिये जाते हैं। वायु  इन परमाणुओं को प्रसारित  कर देती है। 50 प्रतिशत परमाणु यज्ञ- हवन कर्ताओं को अपनी नासिका द्वारा शरीर के रक्त में प्राप्त हो जाते हैं। 50 प्रतिशत परमाणु वायु द्वारा बाहर प्रसारित कर दिये जाते हैं जो सार्वजनिक रूप से जन-कल्याण का कार्य करते हैं। हवन सामग्री की जड़ी-बूटियाँ औषद्धीय रूप से सार्वजनिक स्वास्थ्य रक्षा का कार्य सम्पन्न करती हैं। यह   हवन 'धूम्र चिकित्सा' का कार्य करता है। अतः ढोंग-पाखंड-आडंबर-पुरोहितवाद छोड़ कर अपनी प्राचीन हवन पद्धति को अपना कर नवरात्र मनाए जाएँ तो व्यक्ति, परिवार, समाज, देश व दुनिया का कल्याण संभव है। काश जनता को जागरूक किया जा सके !

 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

विभ्रम के दौर में विवेक वांछित है --- विजय राजबली माथुर

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'सूर्या' की पूर्व संपादक के पुत्र के नाम से छपा यह लेख RSS की किसी चाल का हिस्सा भी हो सकता है कि असंतुष्टों को वरुण के पक्ष मे लामबंद करके उनके प्रतिरोध की वास्तविक 'धार' को 'कुंद' कर दिया जाये। 
या यह भी हो सकता है कि वरुण और उनकी माता को अब भाजपा में वांछित लक्ष्य प्राप्त होने की संभावना न दीख रही हो और वे भविष्य के लिए उससे अलगाव की भूमिका बना रहे हों। यदि ये वास्तव में उनके विचार परिवर्तन का संकेत हो तो वे सोनिया कांग्रेस में प्रविष्ट होकर जनता को आकृष्ट करने में सफल भी हो सकते हैं। किन्तु यह नहीं भूलना चाहिए कि 'तुर्कमान गेट कांड' व 'आपात काल' वरुण के पिता की दिमागी उपज थे।



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जिस समाचार-पत्र के संस्थापक संपादक महात्मा गांधी रहे हों जिनहोने ;सविनय अवज्ञा आंदोलन' का सूत्रपात किया था उसी पत्र का समपादकीय अब 'चारण विरुदावली' गा रहा है तो स्पष्ट है कि, 'विकास' का दावा करने वाले 'चारित्रिक पतन' को प्राप्त हो चुके हैं।
सत्ता पर फर्क पड़े न पड़े परंतु 'विरोध' तो दर्ज हो ही रहा है।


 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Thursday, 8 October 2015

कथा सम्राट प्रेमचंद के संबंध में डॉ रामविलास शर्मा ने क्या कहा ?

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10 अक्तूबर को जन्में  विचारक-आलोचक डॉ राम विलास शर्मा जी ने कथा सम्राट प्रेमचंद जी के संबंध में जो विचार व्यक्त किए वे 08 अक्तूबर प्रेमचंद जी की पुण्यतिथि पर इस स्कैन कापी के माध्यम से प्रस्तुत हैं। 

प्रेमचंद जी गांधीवाद से साम्यवाद की ओर अग्रसर हुये थे जबकि डॉ रामविलास शर्मा जी साम्यवादी चिंतक व विचारक ही नहीं थे वरन सेंट जोन्स कालेज , आगरा  के अध्यापक व भाकपा के सक्रिय सदस्य भी थे। लेकिन सुंदर होटल, राजा-की-मंडी स्थित भाकपा  कार्यालय में उनके विचारों का विरोध व्यक्त करने के लिए उनके ऊपर साईकिल की चेन से घातक प्रहार किए गए थे। उन हमलावरों में से एक  लगातार 9-9 वर्षों  तक दो बार जिलामंत्री रहे और दूसरे 3 वर्षों तक। डॉ रामविलास शर्मा को अपनी ज़िंदगी बचाने हेतु आगरा छोड़ कर दिल्ली में बसना पड़ा था। 

यह विडम्बना ही है कि आंतरिक रूप से अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता को कुचलने वालों को सम्मानित करने वाली पार्टी को आज फासिस्ट सरकार के विरुद्ध अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता की रक्षा के संघर्ष में साथ देना पड़ रहा है क्योंकि उसके अपने एक शीर्ष नेता कामरेड गोविंद पानसारे की हत्या फासिस्ट शक्तियों द्वारा की जा चुकी है। लेकिन उनके स्थान पर एक शीर्ष समिति में जिनको लिया गया है वह अश्लीलता व बाजारवाद के प्रबल समर्थक हैं जिनका दृष्टिकोण है कि, ओ बी सी व दलित वर्ग से आए कामरेड्स से सिर्फ काम लो लेकिन उनको कोई पद न दो इसी आधार पर उत्तर प्रदेश में वह दो-दो बार पार्टी को विभाजित भी करा चुके हैं। एक राष्ट्रीय सचिव के विरुद्ध दो-दो बार पार्टी छोडने की अफवाहें उड़वा चुके हैं । मीडिया में उनका सहायक पुत्र मुलायम सिंह जी से घनिष्ठ रूप से संबन्धित है (निम्न चित्र से स्पष्ट है )जो उनके इशारे पर वरिष्ठ पार्टी कामरेड्स के विरुद्ध जब-तब ऐसे कार्य  आसानी से सम्पन्न करवा देता है और किसी के विरुद्ध मुलायम जी के कान भी भर देता है। 


***ऐसा सिर्फ एक ही साम्यवादी दल में ही नहीं वरन प्रत्येक साम्यवादी दल या सम्पूर्ण वामपंथ में है कि उसका नेतृत्व 'ब्राह्मण' जाति में जन्में या 'ब्राह्मण वादियों' के हाथों में है। युवा कामरेड्स में इसके प्रति असंतोष भी है जिसका प्रमाण प्रस्तुत दो फोटो कापियों से मिल जाएगा। 
https://www.facebook.com/ashishkumaranshu/posts/10156310439200157?fref=nf&pnref=story&__mref=message


युद्ध एक कला भी है और विज्ञान भी। जब फासिस्ट /सांप्रदायिक/साम्राज्यवादी शक्तियों से लड़ना है तब उनका मुक़ाबला न करके अपनी ही पार्टी में घमासान  मचा देने का साफ मतलब यह है कि शत्रु को मजबूती प्रदान की जाये। शत्रु को  शक्ति  देने वाला व्यक्ति या संगठन शत्रु-कृपा से अपना अस्तित्व तो बचाए रख सकता है किन्तु विचार धारा नहीं। यही दुर्भाग्य साम्यवादी/वामपंथी खेमे को ग्रसित किए हुये है जिससे निकल कर ही प्रेमचंद जी एवं डॉ रामविलास शर्मा जी के दृष्टिकोण व चिंतन को मूर्त रूप प्रदान करते हुये अपने संगठन व विचार धारा को आज मजबूत किए जाने  व युवा वर्ग को आकर्षित किए जाने की महती आवश्यकता है। 
(विजय  राजबली माथुर)