Friday, 7 February 2014

जनता की बात जनता के लिए:मोहम्मद गनी----अशोक बंसल


मोहम्मद गनी-- दिहाड़ी मज़दूर से फिल्मकार बनने का सफर -

मोहम्मद गनी

February 7, 2014 at 8:41am


एक बेलदार से फोटोग्राफर और फिल्मकार का सफर तय करने वाले अड़तीस साल के मोहम्मद गनी मथुरा के ऐसे अकेले फ़िल्मकार हैं जिन्होंने अपने श्रम और लगन से बड़े परदे की एक फ़िल्म का निर्माण कर मथुरा ही नहीं दूसरे शहरों के सांस्कृतिक कमिर्यों को हैरत में डाल दिया है। कहानीकार ज्ञानप्रकाश की कहानी ''कैद '' पर आधारित यह फ़िल्म कोई बम्बइया शैली की तर्ज़ पर न होकर विशुध्द कलात्मक और मकसदशुदा फ़िल्म है । फ़िल्म 'कैद' का प्रदर्शन आजकल मथुरा में जगह जगह किया जा रहा है. इसके साथ ही गाणी इस फ़िल्म को फ़िल्म फेस्टिवल में भी भेजने की तैयारी में जुटे हैं. यह फ़िल्म एक बच्चे के साथ स्कूल और घर पर की गई उपेक्षा से उपजे दर्द की ददर्नाक कहानी है ।
मोहम्मद गनी के पिता नाज़र अली ने सपने में भी न सोचा था कि उनका अनपढ़ बेटा ईंट-गारे की कैद से मुक्त होकर पढ़े लिखों की जमात में शरीक होकर मुक्त गगन में विचरण करेगा । आर्ट फ़िल्म संसार में कुछ कर गुजरने की हसरत रखने वाले गनी ने बताया कि मुफलिसी का जीवन जीने वाले उनके पिता नाज़र अली एटा जनपद के गाँव दोर्रा से मथुरा में काम की तलाश में आये थे। तब मथुरा में श्री कृष्ण जन्म भूमि पर भागवत मंदिर का निर्माण चल रहा था। मज़दूरों की जरूरत थी सो फ़ौरन खप गए। परिवार में पत्नी के अलावा चार बच्चे थे । निर्माण स्थल पर ही अधबने मंदिर में एक मुस्लिम परिवार ने डेरा डालने में तनिक भी संकोच नहीं किया। नाज़र अली को चंग बजाकर आल्हा गाने में महारत हासिल थी । शाम को थके हारे परिवार में आते तो आल्हा गाकर थकान मिटाते। बच्चे पिता के कंठ से निकली स्वर लहरी में बह जाते । पूरा परिवार पेट में अन्न पहुंचाकर ही संतुष्ट था। गनी के स्कूल जाने का सवाल तो दूर' अ ब स' या 'अलिफ़ वे पे' से वाकिफ होने का अवसर न मिला । गनी के हाथो में ताकत आई तो वह भी अपने भाई हनीफ और सनीफ के साथ मेहनत -मजूरी करने लगा। धीरे धीरे मंदिर बन गया तो नाज़र परिवार को मंदिर परिसर से अपनी रिहाइश हटानी पड़ी । सभी लोग यमुना पार की गरीबों की बस्ती में जा बसे । पड़ौस में घनश्याम दरजी की दूकान थी ,पिता ने गनी को दर्जी की मिन्नतें कर कपडा सिलाई का काम सीखने में लगा दिया । तब गनी की उम्र १५ साल रही होगी .गनी ने बताया कि कपडे पर कैंची चलाना तो आ गया पर हर वक्त उसकी इच्छा कैमरे को छूने की होती थी। १९९० में वह स्वतन्त्र दरजी हो गया। पैसा बचाने लगा एक कैमरा खरीदने के लिए । हिंदी पढ़ना सीख लिया। पत्रिकाओं में बड़े बड़े फोटोग्राफरों के बारे में जानने की जिज्ञासा पैदा हुई । इसी वक्त गनी को अशोक मेहता ,बाबा आजमी ,लारेंस डिसूजा जैसे नामी गिरामी फोटोग्राफरों के बारे में जानने का अवसर मिला । गनी ने पढ़ा कि बाबा आजमी (कैफी आजमी के बेटे और शबाना आजमी के भाई ) ''इप्टा '' में काम करते हैं । मथुरा में ''इप्टा'' की शाखा थी । गनी ने इसके पदाधिकारिओं से संपर्क साधा और सदस्य बन गया। वह राम मंदिर आंदोलन का दौ.र था। मथुरा में गुरुशरण सिंह के नाटक ''अपहरण भाईचारे का'' मंचन हुआ। गनी को इस नाटक में काम करने का मौका मिला। गनी को उसकी अभिनय प्रतिभा देख सुशील कुमार सिंह के नाटक ''सिंहासन खाली करो ''में काम दिया गया लेकिन दरजी की दूकान में आमंदनी कम होने लगी । गनी को इप्टा वालों से मिलने शहर आना पड़ता था .अत; घर में ही ''प्रेरक थिएटर '' बना डाला । दिनभर काम और फिर बचे वक्त में गरीब बस्ती के बच्चों के साथ किसी नाटक का रिहर्सल। .गनी की संस्था में गति आ गई। गनी की समझ का विस्तार होने लगा। प्रगतिशील लोगों के संगठन ''जन सांस्कृतिक मंच ''ने गनी को हाथों हाथ लिया। गनी का जुड़ाव देश के वामपंथी आंदोलन से हुआ । वह एक आयोजन में दिल्ली जाकर कैफी आजमी ,फारूख शेख ,मुद्रा राक्षस ,शबाना आजमी ,हबीब तनबीर आदि से मिला। उसकी संस्था' प्रेरक' ने मलिन वस्तिओ में और ज्यादा शिद्दत से काम करना शुरू कर दिया।
पूरे परिवार ने मेहनत मशकत से जमा की कुछ रकम से जमीन का एक टुकड़ा ख़रीदा और बच्चों का स्कूल खोल दिया । गनी का पूरा परिवार स्कूल के काम में जुट गया . गनी ने बच्चों के अंदर नाट्य प्रतिभा को जगाना प्रारम् किया । परिसर में प्रेमचंद की कहानी'' कफ़न '' पर नाटक तैयार किया गया । हरिशंकर परसाई के कई व्यंग पर आधारित नाटक खेले गए। गनी ने दर्जीगिरी का काम फिर भी न छोड़ा ,पैसा इकठ्ठा जो करना था कैमरा खरीदने के लिए ।लगभग ५ वर्ष पूर्व गनी का वर्षों पुराना सपना पूरा हुआ। वह एक हैंडीकैम कैमरा खरीद लाया । शम्भूनाथ सिंह की एक कहानी पर इस छोटे कैमरे से ६ मिनट की फ़िल्म बना डाली । स्कूल चल निकला। आमंदनी होने लगी । सन २०१० में दूसरा कैमरा ख़रीदा और ज्ञान प्रकाश विवेक की अनुमति के बाद उनकी कहानी ''कैद'' का नाट्य रूपांतरण कर उसे फिल्माया गया । फ़िल्म में कई पात्रों का अ•िानय स्कूल के छात्र और शिक्षकों ने किया है । इस फ़िल्म में ''पान सिंह तोमर '' में अभिनय करने वाले अभिनेता व् निदेशक संदीपन विमलकांत(पटकथा लेखिका अचला नागर के बेटे ) ने भी काम किया है। गनी के इस बड़े व् प्रथम प्रयास को मथुरा --आगरा में सराहा जा रहा है।
गनी के सपनों में अब पंख लग गए हैं । उसे धन दौलत की दुनिया से परहेज है । वह जनता के दर्द को व्यक्त करने वाले साहित्य को अपनी फिल्मों में स्थान देना चाहता है । गनी ने बताया कि प्रसिध्द अभिनेता अमोल गुप्त ने उससे कहा है कि अगला सिनेमा छोटी छोटी जगहों -कस्बों से पैदा होगा ,जनता की बात जनता के लिए। गनी ने अपनी दूसरी फ़िल्म की तैयारी शुरू कर दी है . कहानीकार शुशांत सुप्रिय की कहानी ''मेरा जुर्म क्या है '' की पटकथा लेखन में जुट गए हैं --गनी और उसके भाई हनीफ ।
गनी और उसके परिवार का .नाटक और अच्छी फिल्मों के प्रति एक ईमानदार समर्पण देख मथुरा का साहित्यिक -सांस्कृतिक समुदाय उनके प्रति श्रद्धानत है।


साभार जगदीश्वर चतुर्वेदी जी :
https://www.facebook.com/notes/jagadishwar-chaturvedi/

Saturday, 1 February 2014

जैसे दिल्ली को मुर्ख बनाया वैसे ही अब सारे भारत को बनाना है........आकाश दीप

 मेरे प्यारे केजरी भैय्या
नमस्कार
उम्मीद ही नहीं बल्कि पूर्ण विश्वास है कि आप और आपकी आप टीम मज़े में है,शुक्रगुजार है आपकी टीम आपका और भौचक है जनता..क्या दिमाग (जिसमे सिर्फ खुराफातें भरी है ) पाया है आपने,कैसे उल्लू बना लेते हो आप जनता को ?? क्या आप गं
गा हो ?? जिसमे कही कि गन्दगी आती है तो वो पवित्र हो जाती है..कितना मीठा बोलते हो आप,झूठ को सच बनाने में तो आपका जवाब नहीं..कैसे कर लेते हो आप ये चीज़े ?? बात करते हो दुनिया भर के भ्रष्टाचार कि पर अपना घर और अपने को नहीं देखते हो...इनकम टैक्स कि नौकरी में रहकर 9 लाख का लोन लिया और बिना चुकाए नौकरी छोड़ दी,क्या ये भ्रष्टाचार नहीं था??आपके मंत्री सोमनाथ 150 करोड़ कि आसामी को बचाने में झूठे सबूत कोर्ट में देते है,क्या ये भ्रष्टाचार नहीं??आपके स्वम्भू राष्ट्र कवि विश्वास जी,शज़िआ इल्मी,खुले आम पैसे के लेनदेन कि स्टिंग में फसते है,और बिना किसी जांच के आप उसे गलत बता देते हो,क्या ये भ्रष्टाचार नहीं??दिल्ली हाई कोर्ट के मांगने पर भी विदेशी चंदे का स्रोत नहीं बताते,क्या ये भ्रष्टाचार नहीं??बिहार के आपके मुखिया कुंदन जी (दर्ज़नो अपराध में लिप्त और वांटेड ) खुले आम धन उगाही करते है,ये भ्रष्टाचार नहीं???
बात करते हो सादगी कि,तो आपके दिल्ली के 70 प्रत्यासियो में 41 कि संपत्ति 5 करोड़ से ऊपर,क्या ये सादगी है??आप और आपके सारे लोग हवाई जहाज़ में सफ़र करते है ये सादगी है ??रामलीला मैदान में शपथ लेकर सरकारी खजाने को सिर्फ 2 करोड़ का चुना लगाया,जबकि यही काम राज भवन में सिर्फ 1 लाख में हो जाता,क्या ये सादगी है??आपके कवि महोदय विश्वास जी 35 महंगी गाडियो के काफिले के साथ अमेठी जाते है,क्या यही सादगी है??
बात करते हो वादे निभाने की..बिजली बिल तकनिकी रूप से सब्सिडी देकर आधा किया,और पब्लिक को मुर्ख बनाया,यही वादा निभाया??पानी मुफ्त किया उसके लिए जिसके घर में मीटर है,पर दिल्ली कि 68 प्रतिशत घरो में मीटर ही नहीं,यही वादा निभाया ?? धरने पर बैठ गए ये कह कर कि मेरे हाथ में कुछ नहीं,अब से कुछ हो जाये तो मुझे मत कुछ कहना ,यही तो शीला दीक्षित भी कहती थी,यही वादा निभाया??आज से बिजली के दाम भी बढ़ गए,क्या यही वादा निभा रहे है आप ??
बात करते हो राजनितिक सुचिता कि,पुलिस को नौकरी छोड़ कर आने कि,सिस्टम बदलने कि,कानून नहीं मानने की,कश्मीर में जनमत संग्रह करवाने कि,नक्सलियो के समर्थन की,खाप पंचायतो को समर्थन की.....आप कहा ले जा रहे हो देश को???
दुनिया भ्रष्ट सिर्फ आप सही,बिना सबूत के आरोप लगाओ....
करना धरना कुछ नहीं है आपको,आपको अब सपने में पागलो कि तरह प्रधानमंत्री कि कुर्सी दिख रही है,सोचा कि जैसे दिल्ली को मुर्ख बनाया वैसे ही अब सारे भारत को बनाना है...
पर भैय्या केजरीवाल भारत दिल्ली नहीं है....आप अति महत्वकाँक्षी हो,और अति हर बात कि बुरी होती है,कही खुद पे झाड़ू ना फिर जाये ....पहले जो जिम्मेदारी मिली है उसको तो ठीक से निभा ले,कही कुछ दिनों के बाद ये ना कहना पड़े- ना खुदा ही मिला ना विशाले सनम,ना इधर के रहे ना उधर के हम.....

आपका अपना
सच का आम आदमी



https://www.facebook.com/photo.php?fbid=248107398699597&set=a.102895023220836.5483.100005010153473&type=1&theater


National Vice President · 2011 to present

Wednesday, 22 January 2014

जनतंत्र में जिद की हदें---जगदीश्वर चतुर्वेदी

   जनतंत्र में हदें नहीं होतीं ,विवेक होता है:  
   जनतंत्र में हदें नहीं होतीं ,विवेक होता है।जनतंत्र का सारा ताना-बाना हदों के पार जाने के रेशों से बुना हुआ है। कलाओं से लेकर राजनीति तक,साधारणमनुष्य से लेकर नेता तक सभी आए दिन हद तोड़ते हैं। लोकतंत्र के सवाल हमेशा हदों सेटकराते हैं और हदों से लोकतंत्र बाहर निकलकर फैलता है।
लोकतंत्र की हदों के विस्तार का प्रश्न लोकतांत्रिक विवेक से जुड़ा है। इसकी उपेक्षा किसी भी नेता को, जो लोकतंत्र की आंधी पर सवार हो या भीड़ के समर्थन या जनसमर्थन पर सवार हो, अराजक या लोकतंत्रविरोधी बना सकती है।लोकतंत्र के विवेक का संबंध संविधान के विवेक और संवैधानिक संस्थाओं की परंपराओं से है।
   फिलहाल उपरोक्त परिप्रेक्ष्य में रेलभवन पर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्दकेजरीवाल के अनिश्चितकालीन धरने और उससे जुड़े सवालों पर गंभीरता से विचार करें।
   दिल्लीमें पुलिस प्रशासन बेहद खराब अवस्था में है। पुलिस का हर स्तर पर भ्रष्टाचार,मनमानापन और अकर्मण्यता नजर आते हैं। इसके कारण पुलिस के खिलाफ व्यापक असंतोष है।केजरीवाल इस असंतोष को राजनीतिक जामा पहनाकर अपने कानूनमंत्री या कार्यकर्ताओं केअ-लोकतांत्रिक आचरण पर से आम लोगों का ध्यान हटाना चाहते हैं ।
    केजरीवालकी मांग है दोषी 3 पुलिसकर्मियों को सस्पेंड किया जाय।दिल्ली को राज्य का दर्जा दिया जाय और पुलिस को दिल्ली प्रशासन के मातहत किया। उनकी यह मांग वैध रुप में असर दिखाए इसके लिए वैध कदम उठाने जरुरी हैं । नया प्रशासन दिल्ली विधानसभा से पूर्णराज्य का दर्जा दिए जाने का प्रस्ताव पास कराकर केन्द्र के पास भेजे और बाकी दलोंको संसद में संविधान संशोधन करने के लिए राजी करे। जाहिर है यह प्रक्रिया लंबी और थकानेवाली है । साथ ही उपराज्यपाल द्वारा बनायी जांच  कमेटी के आधार पर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई हो।
     आमआदमी पार्टी के सभी नेताओं को कल मैंने दिनभर टीवी से लेकर रेलभवन के अहाते मेंटीवी के जरिए सुना।अनेक मित्रों का फेसबुक पर लिखा भी देखा।
     सबसेपहले मुझे जेएनयूएसयू के पूर्व महामंत्री और अपने जमाने के धाकड़ एसएफआई नेता औरइन दिनों एनजीओ आंदोलन के अग्रणी कतारों में काम करने वाले सबसे सुलझे हुए मित्रअनिल चौधरी की आलोचना याद आ रही है। अनिल चौधरी ने फेसबुक पर लिखा 'yavestha ke charmerane se itna ghabrate kyuonho yaar! itna yatasthitivadi hone ki umeed nahi thi. ' यह सचहै  व्यवस्था चरमरा रही है, यह भी सचहै  मध्यवर्ग के हमारे जैसे लोग घबडाए हुएहैं, लेकिन उससे भी बड़ा सच यह है कि इस सवाल को उठाने के पीछे व्यवस्था परिवर्तनका लक्ष्य काम नहीं कर रहा ।
     अरविंद केजरीवाल ने बार बार कहा है हमने कांग्रेस से समर्थन नहीं मांगा, वे चाहें तो समर्थन वापस ले लें। इस पर टाइम्स नाउटीवी चैनल में एनसीपी के महासचिव और जेएनयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष देवीप्रसाद त्रिपाठी ने कहा  केजरीवाल राजनैतिकतौर पर अनैतिक बयान दे रहे हैं । केजरीवाल में यदि नैतिक साहस है तो कहें हमें कांग्रेस का समर्थन नहीं चाहिए। हम इतना जोड़ना चाहेंगे कि केजरीवाल को ऐसी सरकार नहीं बनानी चाहिए जिसको कांग्रेस या भाजपा का समर्थन हो। वे तुरंत इस्तीफा देकर जनता में आ सकते हैं। उनकी 18मांगों का कांग्रेस ने समर्थन किया है, कांग्रेस का समर्थन उन तमाम हरकतों के लिए नहीं है जो कानून और संविधान के दायरे के बाहर हैं। 
 असल मामला क्या है?:
 असल मामला क्या है जिससे यह आग भड़की है।'नवभारतटाइम्स'(20जनवरी2014) के अनुसार ' पूर्व डीजीपी और दिल्ली पुलिस में डीसीपी रह चुके आमोद कंठ ने दावा किया है कि उन्होंने पीड़ितों से मुलाकात कर उनकी शिकायत रेकॉर्ड की है। आरोप है कि मुताबिक कंपाला स्टेलर मोंटगानो (36) और शीलाएमनबोबाजी (30) के साथ कानून मंत्री और उनके समर्थकों ने मारपीट की। उन्हें धक्कादेकर हाथ ऊपर उठाने को कहा। ऐसा न करने की सूरत में गोली मारने की धमकी दी। आमोदकंठ का आरोप है कि एक महिला को खुद कानून मंत्री ने मारा। आमोद कंठ कहते हैं कि यह गैरकानूनी कार्रवाई है। कंपाला की स्टेलर शादीशुदा हैं और उनके तीन बच्चे भी हैं।दिल्ली में रहकर वह टेक्सटाइल का कारोबार करती हैं।
आमोद कंठका दावा है कि उन्होंने ने युगांडा की चार महिलाओं की शिकायतें रिकॉर्ड की हैं।उनका आरोप है कि इन महिलाओं को तकरीबन दो घंटे बंधक बनाए रखा गया। एम्स में जांचके लिए पुलिसवालों पर दबाव बनाया गया। जबरन उनका यूरीन सैंपल लिया गया और कैविटी सर्च भी हुआ। आमोद के मुताबिक बिना किसी इजाजत के ये सारी कार्रवाई गैरकानूनी हैं।यह तालिबानी राज का ही एक रूप है।
आमोद कंठ 'प्रयास' नाम की एक सामाजिक संस्था चलाते हैं और उन्होंने साउथ दिल्ली के आला पुलिसअफसरों से भी मुलाकात की। उनका दावा है कि डीसीपी वी. एस. जायसवाल ने उन्हें बताया कि उन्होंने हादसे की एक रात पहले खुद जाकर इलाके का मुआयना किया था लेकिन कुछ नहीं मिला। आमोद बताते हैं कि बिना वारंट के किसी के घर में रेड सिर्फ स्पेशलपुलिस ऑफिसर और ट्रैफिकिंग पुलिस अफसर ही कर सकते हैं लेकिन कानून मंत्री कीअगुवाई में भीड़ ने जिस तरह रेड डाली, वह गैरकानूनी है।' इस पर अदालत में मामला गया और अदालतके तुरंत एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया।
   'नभाटा' (19जनवरी 2014) के अनुसार विदेशी महिलाओं के साथ कथित बदतमीजी के मामले में कोर्ट के आदेश पर पुलिस ने अज्ञात लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली है।'गौरतलब है कि कानून मंत्री भारती और उनके समर्थकों पर कुछ नाइजीरियाई और युगांडाईमहिलाओं ने जबरन रोक कर रखने, बदतमीजी करने और प्रताड़ित करने के आरोप लगाए थे। भारतीऔर समर्थक इन महिलाओं पर वेश्यावृत्ति और ड्रग्स स्मगलिंग के आरोप लगा रहे थे। इसकथित छापे के दौरान दिल्ली पुलिस और सोमनाथ भारती के बीच जमकर तू-तू, मैं-मैं भी हुई थी।
इससे पहले कोर्ट ने इस मामले में मालवीयनगर थाने में एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया। विदेशी महिलाओं ने सोमनाथभारती और उनके समर्थकों के खिलाफ मालवीय नगर थाने में पहले ही कंप्लेंट दी है।पुलिस के मुताबिक,इन आरोपों में आईपीसी की धारा 342, 509 औरअन्य कई धाराओं के तहत जबरन बंद करने और महिला की मर्यादा भंग करने का मामला बनताहै।
गौरतलब है सोमनाथ भारती अपने कुछ समर्थकों के साथ 15 जनवरी की आधी रात दिल्ली स्थित खिड़की गांव गए थे, जहां एक घर पर छापा मारने से इनकार करने के बाद दिल्ली पुलिस के एसीपी से उनकी बहस हो गई। सोमनाथभारती का आरोप था कि उस इमारत से वेश्यावृत्ति और ड्रग्स की तस्करी का रैकेट चलताहै। इसके बाद भारती अपने समर्थकों के साथ उस महिला के घर में जबरन घुस गए। मंत्रीपुलिस के साथ चारों महिलाओं को एम्स भी ले गए थे, जहां उनका मेडिकल चेकअप कराया गया था। सूत्रों से जानकारी मिली है कि मेडिकल चेकअप मेंड्रग्स के सेवन की पुष्टि नहीं हुई। इसके बाद लड़कियों ने मंत्री के खिलाफ पुलिसकंप्लेंट दी। महिलाओं ने आरोप लगाया है कि मंत्री और उनके साथ मौजूद लोगों ने नसिर्फ उनके साथ मारपीट की बल्कि उन्हें जबरदस्ती गाड़ी में घुमाते रहे।'
    आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं और मंत्रियों की इस तरह की हरकतें किसी तर्क से स्वीकार्य नहीं हैं । विदेशी महिलाओं ने अपने साथ हुए दुर्व्यवहार की अपनेराजदूतों से शिकायत की और संबंधित दूतावासों ने भारत के विदेश मंत्रालय को भी शिकायती पत्र लिखकर तुरंत कार्रवाई की मांग की है।
   आम आदमी पार्टी का मानना है 'खिचड़ी' इलाके में नशीले पदार्थों औरजिस्मफरोशी का धंधा बडे पैमाने पर लंबे समय से चल रहा है और स्थानीय लोग  इससे परेशान होकर कई बार शिकायतें हर स्तर पर करचुके हैं लेकिन पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की। इसके कारण मंत्री को मजबूरी में हस्तक्षेप करना पड़ा ।
    इस प्रसंग में मंत्री का हस्तक्षेप समझ में आता है,स्थानीय लोगों का गुस्साभी समझ में आता है लेकिन यह भी तो संभव है कि जिसे ड्रग और जिस्मफरोशी कहा जा रहाहो, वहां पर कोई ऐसी चीज ही न हो और महज शंका के आधार पर आरोप लगाए जा रहे हों ।इस समूची समस्या  का समाधान यह नहीं है किसभी कानूनों को धता बताकर तालिबानी न्याय कर दिया जाय ।
  उल्लेखनीय है  'खिचडी' इलाके से मंत्री द्वारा जबरिया पकड़कर एम्स अस्पताल ड्रग टेस्ट के लिए ले जायी गयी लड़कियों के टेस्टमें कोई गड़बड़ी नहीं मिली और नहीं किसी ड्रग के संकेत मिले। ऐसे में 'खिचडी'इलाके के लोगों के संबंधित विदेशी महिलाओं के बारे में लगाए आरोप बेबुनियाद साबितहुए हैं। ऐसी स्थिति में आम आदमी पार्टी और 'खिचडी' इलाके की जनता के ड्रग औरजिस्मफरोशी के बारे में लगाए आरोपों पर सहज ही विश्वास नहीं किया जा सकता।
    रेल भवन पर मुख्यमंत्री केजरीवाल और उनके मंत्रियों का धरना कई मायनों में अ-लोकतांत्रिक और संविधान केप्रावधानों का उल्लंघन है । आम आदमी पार्टी के आंदोलन के प्रसंग में सबसे  बड़ी समस्या है इनके आंदोलन स्थल का फैसला ।
    समूची दिल्ली में कहीं पर भी आंदोलन किया जासकता था लेकिन ये  लोग अन्ना आंदोलन से लेकरआज तक जान बूझ कर बार बार केन्द्रीय मंत्रालय,राजपथ,वोट क्लब,संसद केअहाते,राष्ट्रपति भवन के आसपास के इलाकों को ही आंदोलन स्थली के रुप में चुनते रहे हैं । इससे सरकारी कामकाज,मेट्रो यातायात,राजकीय अतिथियों के आवागमन और राजकीय समारोह प्रभावितहोते रहे हैं। यह विवेक का निषेध है। इस समस्या का दूसरा पहलू संवैधानिक है जिसकीओर संविधान विशेषज्ञों ने ध्यान खींचा है। 
 संवैधानिक पहलू:
संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप का कहनाहै  सीएम और मिनिस्टरों ने पद और गोपनीयताकी शपथ ली है। इसके तहत संविधान के दायरे में काम करने की बात है। संविधान के तहतदिल्ली पूर्ण राज्य नहीं है और पुलिस केंद्र सरकार के पास है। ऐसे में इसको लेकर सड़कों पर इस तरह से टकराव नहीं हो सकता। पुलिस को निर्देश देना राज्य सरकार का काम नहीं है। मंत्री अगर पुलिस को निर्देश दे रहे थे तो यह भी पुलिस के कामकाज में दखल है और यह नियम के खिलाफ है। राज्य सरकार को संविधान के तहत जो दायित्व दिया गया है , उन्हें उसका निर्वाह करना चाहिए। पुलिस के कामकाज में वह दखल नहीं दे सकते।
   सुप्रीम कोर्ट के सीनियर ऐडवोकेट एम . एल . लाहोटी बताते हैं कि दिल्ली पूर्ण राज्य नहीं है। इसी कारण यहां की पुलिस राज्य सरकार के भीतर नहीं है। पुलिस को राज्य सरकार के अधीन लाने और दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने की मांग पहले भी उठती रही है। इस बार दिल्ली के कानून मंत्री व एक और मंत्री ने पुलिस को कार्रवाई का आदेश दिया और उसे पुलिस ने नहीं माना। इसके बाद उन पुलिस कर्मियों कोसस्पेंड कराने के लिए यह धरना हो रहा है। देखा जाए तो दिल्ली के सीएम अपनी लाचारी भी दिखा रहे हैं कि आखिर सरकार करे तो क्या करे , जब पुलिस उसके कहे के अनुसार काम नहीं करती।
सीनियर ऐडवोकेट के . टी . एस . तुलसी बताते हैं कि यह अनोखा मामला है , जब राज्य के सीएम इस तरह धरना दे रहे हैं। पुलिस को पूरी तरह स्वतंत्र होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस रिफॉर्म के लिए कई डायरेक्शन भीदिए हैं। पुलिस डिपार्टमेंट के महत्वपूर्ण पदों पर लोगों की पोस्टिंग के लिए बोर्डके गठन की बात कही गई है। कई राज्यों ने इसे लागू भी किया है। पुलिस के खिलाफ कार्रवाई या उसे अपने अधीन लाने की कवायद समझ से परे है।
   आम आदमी पार्टी का दिल्ली में सत्ता में आने के बाद से समूचा नजरिया मीडिया इवेंट निर्मित करने का है। केजरीवाल सरकार की धुरी भीअन्ना आंदोलन की तरह ही ''मैं सही और सब गलत'' की धारणा है । वे इस नजरिए से सबकोदबाव में लाकर काम करना चाहते हैं। ये लोग अन्ना आंदोलन के दौरान भी अहंकार कीभाषा बोल रहे थे, सरकार में आने के बाद भी अहंकार की भाषा बोल रहे हैं । वे लोकतंत्र को 'मैं' के आधार पर चलाना चाहते हैं जबकि लोकतंत्र 'हम' के आधार पर चलताहै । वे लोकतंत्र में विवेक की कम भीड़ की अविवेकपूर्ण भाषा का ज्यादा इस्तेमाल कररहे हैं । केजरीवाल की प्रशासनिक पद्धति 'पेंडुलम इफेक्ट' के दृष्टिकोण से संचालित है।  यह मूलतः अधिनायकवादी नजरिया है। इसपद्धति का लक्ष्य है 'चट मंगनी पट ब्याह।'
 अरविंद केजरीवाल के नए कारनामों पर 'मीर' का एक शेर याद आ रहा है- ''खुदाजाने क्या होगा अंजाम इसका। मैं वेसब्र इतना हूँ,वोह तुन्दखू है।'' (तुन्दखू यानीउग्र स्वभावी)

Sunday, 12 January 2014

मातृ भाषा में काम करने से बेहतर से बेहतर ख्याल अपने दिमाग में आएंगे---सुजेन टालहक

स्पष्ट रूप से पढ़ने के लिए इमेज पर डबल क्लिक करें (आप उसके बाद भी एक बार और क्लिक द्वारा ज़ूम करके पढ़ सकते हैं )






 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त माथुर

Saturday, 4 January 2014

"आप" और पूंजीपति वर्ग:अजय सिन्हा


 
भारत और पूरे विश्व में जो अंतहीन आर्थिक मंदी फैली है, उसने सभी देशों के पूंजीपति वर्ग को शासन के नए-नए रूपों और नए-नए मुखौटों की बेतहाशा से खोज करने के लिए प्रेरित और बाध्य किया है। पूरी दुनिया के पूंजीवादियों और साम्राज्यवादियों को भावी क्रांति के पदचाप सुनाई देने लगे हैं। वे रातों की नींद और दिन का चैन खो चुके हैं। वे किसी भी तरह से अपनी कब्र खोदने वाले मज़दूर वर्ग को जगने और उसकी विराट क्रांतिकारी ताकत के जाग उठने को रोकना चाहते है। लेकिन हाय रे भाग्य ! उनकी कोई भी कोशिश कामयाब होती नहीं दिख रही है।

भारत में आर्थिक मंदी के दिनों-दिन गहराते जाने की परिस्थिति ने जहां एक तरफ मज़दूरों के श्रम की भयंकर लूट को जन्म दिया और निम्नपूंजीवादी व मंझोले तबकों के भारी पैमाने पर सम्पतिहरण व स्वत्वहरण को जन्म दिया, वहीँ दूसरी तरफ इसने भारत के पूंजीपति वर्ग को नरेंद्र मोदी जैसे फासीवादी को भारत के भाग्यविधाता के रूप में पेश करने के लिए बाध्य किया है जो जनता को धर्म और छदम देशभक्ति के आधार पर बांटने का काम करने के साथ-साथ पूंजीपति वर्ग की भारी लूट को भी बदस्तूर जारी  रख सके …लेकिन इस choice में क्रांति के फूट पड़ने के अपने भारी खतरें हैं, जिससे पूंजीपति वर्ग वाकिफ है। दरअसल पूंजीपति वर्ग के बीच इस बात को लेकर भारी मतभेद दिखाई दे रहा हैं कि मोदी जैसे फासीवादी नेता को आगे बढ़ाकर किसी भी तरह से श्रम की भारी लूट के आधार पर सुपर मुनाफा को बनाए रखा जाए या फिर किसी moderate व्यक्ति, जिसकी छवि ठीक-ठाक हो, को आगे बढ़ाकर बीच का कोई रास्ता निकाला जाए। लेकिन दूसरे option की कल तक दिक्कत यह थी कि भारत में कल तक ऐसी कोई पार्टी और व्यक्ति नहीं था। कांग्रेस, सपा, बसपा, राजद, जद, टीएमसी … सभी जनता की नज़रों में पहले ही गिर चुकी थीं। इस मोड़ पर पूंजीपति वर्ग की सबसे बड़ी आफियत या सुविधा यह थी कि इस बीच मज़दूर वर्ग की ताकतें अत्यंत कमजोर ही बनी रहीं। 


"आप" पार्टी बड़े पूंजीपति वर्ग की सबसे चहेती पार्टी बनकर उभर रही है.…

इस घटनाक्रम के ठीक इसी मोड़ पर सुनियोजित या अप्रत्याशित तौर से "आप" पार्टी और क्षमतावान, आदर्शवादी और वैचारिक तौर पर सबसे कम खतरनाक तथा सुघड़ नेता श्री अरविन्द केजरीवाल के उदय ने पूंजीपति वर्ग के लिए दूसरे options को आज़माना आसान बना दिया है। अरविन्द केजरीवाल और मोदी भारत के बड़े पूंजीपति वर्ग के दो खेमों के प्रतिनिधि हैं, जिसमें अरविन्द केजरीवाल के आदर्शवादी चेहरे व कुछ नया प्रयोग करने वाले व्यक्तित्व और दिल्ली में मिली अपार सफलता से निखरी "आप" पार्टी बड़े पूंजीपति वर्ग की सबसे चहेती पार्टी बनकर उभर रही है.…… यह महज़ कोई संयोग नहीं है कि प्रायः सभी कॉर्पोरेट मीडिया घरानों में "आप" और केजरीवाल की धूम मची है और वे खुलकर "आप" को केंद्रीय सत्ता की असली हकदार बता रहे हैं

इस मोड़ पर मज़दूर वर्ग की ताकतों को सही मूल्यांकन और सही कार्यनीति अपनाने की सख्त जरूरत है...... आप सभी दोस्तों से हार्दिक अपील है कि इस बहस को गम्भीरता के साथ आगे बढ़ाया जाए …… .


  ‘आप’ में शामिल होने के लिए ‘खास’ में मची होड़:

 Ajay Sinha ‘आप’ में शामिल होने के लिए ‘खास’ में मची होड़
आईबीएन-7 | 03-Jan 10:26 AM

कॉरपोरेट जगत से जुड़े कई बड़े नाम पार्टी से जुड़े हैं। रॉयल बैंक ऑफ स्कॉटलैंड की पूर्व अध्यक्ष मीरा सान्याल लंबे अरसे से आम आदमी पार्टी से जुड़ी हैं। मीरा ने दक्षिण मुंबई से लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए आवेदन भी किया है। आदर्श, दुनिया की नाम कंपनियों में शुमार एप्पल के पश्चिमी भारत के सेल्स प्रमुख थे। आईटी कंपनी इन्फोसिस के बोर्ड मेंबर वी बालाकृष्णन भी बुधवार को आम आदमी पार्टी के सदस्य बन गए। बालाकृष्णन को इन्फोसिस के संभावित सीईओ के तौर पर देखा जा रहा था।
कॉरपोरेट जगत के अलावा दूसरी राजनीतिक पार्टियों के नेताओं में आप ज्वाइन करने की होड़ मची है। दिल्ली विश्वविद्यालय की अध्यक्ष रह चुकी अलका लांबा ने कांग्रेस से 20 साल पुराना नाता तोड़ आप का दामन थाम लिया है। लंबे अरसे तक समाजवादी पार्टी की लाल टोपी पहनने वाले कमाल फारुकी को भी आम आदमी की टोपी में नया सबक नजर आ रहा है। बीजेपी के पूर्व एमएलए कानू कलसारिया ने आम आदमी पार्टी का हाथ थाम लिया है।

https://www.facebook.com/ajay.sinha.9699/posts/762252950470960 


मज़दूर वर्ग के सापेक्ष "आप", कांग्रेस और भाजपा तीनों के बीच कहाँ कोई फर्क है ?

और अधिक जानकारी हेतु यहाँ क्लिक करें 






Wednesday, 1 January 2014

भारत वह स्थान नहीं,जो उसके सभी संस्थापकों ने सोचा था---गोपाल कृष्ण गांधी

स्पष्ट रूप से पढ़ने के लिए इमेज पर डबल क्लिक करें (आप उसके बाद भी एक बार और क्लिक द्वारा ज़ूम करके पढ़ सकते हैं )



विद्वान चिंतक और पूर्व राज्यपाल गोपाल कृष्ण गांधी जी भी दिल्ली में केजरीवाल/आप के उभार को शुभ लक्षण नहीं मानते हैं।
दिल्ली की आप सरकार द्वारा  जिनको पानी का कन्सेशन मिलेगा वे सभी समृद्ध लोग होंगे क्योंकि झुग्गी-झोपड़ियों तक तो पानी की पाईप लाईनेन ही नहीं बिछी हैं और बिजली कनेकशन  भी नहीं हैं वह लाभ भी मीटर वाले लोगों को ही मिलेगा गरीबों की बस्तियों में नहीं। 1947 में देश को सांप्रदायिक/साम्राज्यवादी आधार पर विभाजित करके पाकिस्तान की संरचना ब्रिटिश सरकार ने अमेरिकी साम्राज्यवाद के इशारे पर की थी। अमेरिका हमेशा पाकिस्तान की समप्रभुत्ता का उल्लंघन करता रहा है और अब हमारी बानिज्य राजनयिक देवयानी खोबरागड़े को गिरफ्तार व अपमानित करके भारत की सम्प्रभुत्ता को भी चुनौती दे रहा है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अमेरिकापरस्ती बेनकाब होने के बाद पहले मोदी को आगे किया गया था किन्तु उन पर सांप्रदायिक नर-संहार का ठप्पा लगा होने के कारण 'आप' व केजरीवाल को अमेरिकी साम्राज्यवाद की रक्षा के लिए आगे लाया गया है। अतः कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं एवं नेताओं का यह नैतिक दायित्व था कि इस खतरे से जनता को आगाह करते जिससे आसन्न लोकसभा चुनावों में जनता गुमराह न होती। किन्तु दुखद स्थिति यह है कि बड़े से बड़े कम्युनिस्ट नेता भी 'केजरीवाल/आप' के भ्रमजाल में बुरी तरह उलझ गायें हैं फिर जनता को कौन जाग्रत करेगा?ध्यान रखने की बात थी कि इन्दिरा कांग्रेस का मनमोहन गुट,भाजपा और आप तीनों ही RSS से प्रभावित हैं। अतः सभी कम्युनिस्टों को मिल कर इन शक्तियों का मुक़ाबला करना चाहिए था बजाए 'आप'/केजरीवाल के गुण गाँन करने के। यदि आज आप/केजरीवाल को आगे बढ़ाया गया तो निश्चय ही अर्द्ध-सैनिक तानाशाही स्थापित करने में RSS को सहयोग मिलेगा। 1980 के बाद से RSS के लोग अनेक दलों में घुस चुके हैं। जबकि कम्युनिस्ट बिखरे हुये हैं। उस स्थिति में 'हिंसक' आंदोलन की ही गुंजाईश बचेगी जो कि लोकतन्त्र के लिए कैसे शुभ रहेगा?



 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त माथुर

Saturday, 21 December 2013

मार्क्स वाद को सफल बनाना है तो अंबेडकर से कुछ सीखिए---बिजेन्द्र सिंह

न्यूयार्क और वाशिंगटन में तय नीति के अंतर्गत भाजपा में मोदी को आगे बढ़ा कर इन्दिरा कांग्रेस का मार्ग सुगम किया गया है। 'सांप्रदायिक ध्रुवीकरण'का लाभ सीधा-सीधा कांग्रेस को मिलेगा और जनता फिर वैसे ही लूटी जाएगी। यही समय है कि वामपंथियों को आगे आकर संसदीय राजनीति को मजबूत करना चाहिए। वरना तो 'चिड़ियाँ चुग गईं खेत'...ही होगा।

  • Seen by 2
  •  Sir, note karen, Bampanthi jab tak desh ki most oppressed classes- Dalit,Minorities and OBCs ko leadership tak nahi pahuchne dete, tab tak kabhi bhi in vargon ka biswas prapt nahi kar sakte. Marx oppressed classes ko leader dekhna chahate the, aap unko follower se aage nahi aane dete hen. Marxvad ko safal banana hai to Ambedkar se kuchh sikhiye. Shoshiton men Ab tak Ambedkar se unche kad ka kabil, samajhdar aur imandaar leader nahi hua.Apni soch me parivartan laiye. Aapki boddhik imandaari ka ye imtahan kaa samaya hai. Kripaya mujhe galat na samjha jaye. Meri sat pratishat bafadari Karl Marx aur desh ke sarvahara ke prati hai, Ismen Mujhe koi shak nahi hai.Is liye likha ki men bhi aapki tarah kranti ko safal dekhna chahate hun.
     
    ( सर, नोट करें, बामपंथि जब तक देश की मोस्ट अप्रेस्ड क्लासेज - दलित,माइनोरिटीज़ एंड  ओ बी सीज़  को लीडरशिप तक नही पहुचने देते, तब तक कभी भी इन वर्गों का विश्वास  प्राप्त नही कर सकते।  मार्क्स अप्रेस्ड क्लासेज़  को लीडर देखना चाहते थे, आप उनको फॉलोवर से आगे  नही आने देते हें।   मार्क्स वाद को सफल बनाना है तो अंबेडकर से कुछ सीखिए।  शोषितों में अब तक अंबेडकर से उँचे कद का काबिल, समझदार और ईमानदार लीडर नही हुआ। अपनी सोच मे परिवर्तन लाइए. आपकी बोद्धिक ईमानदारी का ये इम्तहान का समय है।  कृपया मुझे ग़लत ना समझा जाए।  मेरी शत प्रतिशत बफादारी कार्ल मार्क्स और देश के सर्वहारा के प्रति है, इसमें मुझे कोई शक नही है। इस लिए लिखा की में भी आपकी तरह क्रांति को सफल देखना चाहते हूँ। )
    ======================
    मैं भी बिजेन्द्र सिंह जी के दृष्टिकोण से शतशः सहमत हूँ  किन्तु एक नज़र खुद को दलित वर्ग का विद्वान बताने वालों के परस्पर विवाद पर भी नज़र दाल लें: 
    डॉ लालजी निर्मल
जाति के वर्तमान स्वरुप के रहते आप हजरत गंज या रामपुर के मुख्य चौराहे पर बाल्मीकि चाट भंडार खोल लीजिये , शुरू करिए दुसाध कांटिनेंटल रेस्टोरेंट ,इतना ही नहीं पासवान मिस्ठान भंडार की स्वीकार्यता भी देख लीजिये । निजी क्षेत्र में दलित की स्वीकार्यता ६ माह भी नहीं हो पाएगी । मिडिया और न्याय पालिका में वंचितों की उपस्थिति आपसे छिपी नहीं है । जमीनों में अपनी भागीदारी जग जाहिर है, ले दे कर आरक्षण के कारण हम सब आज कंप्यूटर चलाने की स्थिति में हो पाए है | जाति की प्रासंगिकता देखिये, सामान्य निर्वाचन क्षेत्रो से कोई दलित आज भी निर्वाचित हो कर नहीं आ सकता ।मन्दिरो में पड़ा लाखो टन सोना एक जाति विशेष की संपत्ति बनी हुई है । जाति को कमजोर करके ही विभिन्न क्षेत्रो में भागीदारी मिल सकती है । जाति की कट्टर उपस्थिति के बीच दलितों की आर्थिक स्वावलंबन की कल्पना दिवा स्वप्न ही तो है |

डा. निर्मल जी के सन्दर्भ में ---
जाति के विनाश के बिना कुछ नहीं हो सकता, यह सही है. पर जाति हमने नहीं बनाई, इसलिए इसको मिटाने में हम अपनी उर्जा-शक्ति क्यों नष्ट करें? हम अपने आर्थिक विकास पर धयान क्यों नहीं दें .
 https://www.facebook.com/nitendra.adarsh/posts/536508573077790

Parmanand Arya:
 समाजशास्त्र में एक सिध्दान्त होता हे, संस्कृतिकरण का सिद्धान्त इसके मुताबिक जो शोषित और दलित जातियां या व्यक्ति अपने वर्गीयचिन्तन और सरोकारों से मुक्त होते हैं ऐसे लोग सामाजिक और आर्थिक तरक्की करने के बाद अपने रीति-रिवाजों,ऐतिहासिक परम्पराओं से पिन्ड छुडाना चाहते हैं,अर्थात सांस्कृतिक तौर पर उसी चिन्तनधारा का अनुकरण करते हें जिससे वह अभी तक सताए और दबाए जा रहे थे. यही है--सांस्कृतिक अनुकरण जिसके कारण हम पाते हैं कि आज दलितों और वंचितों का उतना उत्पीडन ब्राह्मण जातियां नहीं करतीं जितना कि पिछडे वर्गों द्वारा किया जा रहा है..... धर्म-परम्पराएं, ब्राह्मणवाद.. इसी प्रवर्ति को प्रोत्साहित और प्रेरित करता है और अपने फायदे के लिेए उन्हे इस्तमाल करता है...... इसी के तहत गुजरात के दंगों में दलित के खिलाफ दलित ( मुसलमानों के खिलाफ आदिवासी जातियों ) का इस्तमाल किया गया था.... यही प्रवत्ति आप बहुएं जलाने, व उत्पीडन के मामलों में भी देख सकते हैं जहां बहुएं जलाने या उनके उत्पीडन में ससुराल में सास.ननद आदि महिलाओं की भूमिका अपने पुरुष सहयोगियों से कहीं ज्यादा बढ चढ कर होती है....
“समाज का वंचित वर्ग अंतिम कतार से निकल कर मुख्यधारा से जुड़ना चाहता है लेकिन आज भी दलित-पिछड़ों के साथ किसी न किसी रूप में भेदभाव बरकरार है। दलित अधिकारी के सरकारी कार्यालय से सेवानिवृत्ति होने ओर उस कुर्सी पर बैठने वाला अधिकारी कमरे को गंगा जल से पवित्र करवाता है। शिक्षा संस्थान भी जाति प्रेम से अछूते नहीं है। लखनऊ यूनीवर्सिटी इसका अदाहरण बना है।“

=====================================================
(यह वाक्यांश बताता है कि समाज में धड़ल्ले से संविधान विरोधी/गैर कानूनी कार्य चलते हैं जिनको तथाकथित वैज्ञानिक/प्रगतिशील लोगों के संरक्षण की ठोस प्राप्ति भी होती है। समाज की मुख्य धारा में जुड़ना चाहने का मतलब गलत बातों को अपनाना कतई नहीं होना चाहिए किन्तु पढे-लिखे ओहदेदार लोग भी ऐसा ही कर रहे हैं जिसकी ही परिणति हैं ऐसे निंदनीय कृत्य। 

एक सरकारी निगम में कार्यरत परिचित अधिशासी अभियंता महोदय जो खुद को दलित भी मानते हैं और पोंगा-पंथियों के दीवाने भी बने हुये हैं क्यों ढ़ोंगी ब्रहमनवाद के पीछे भागते हैं मैं समझ न सका?आगरा में वह तब मेरे संपर्क में आए थे जब इन ब्रहमन वादियों द्वारा ही उत्पीड़न का शिकार चल रहे थे। मैंने उनका ज्योतिषयात्मक समाधान ‘वेदिक विधि’से करवाया और उनको पोंगा-पंथी ब्राहमनवाद से बचने का लगातार परामर्श दिया। किन्तु वह समाधान मुझसे प्राप्त करते हुये भी लगातार ब्राह्मण वादियों के इशारे पर भी चलते आ रहे हैं इसका खुलासा 23 जनवरी 2013 को तब हुआ जब उन्होने अपने नए घर मे ‘गृह-प्रवेश’ के अवसर पर मुझसे ‘वास्तु-हवन’ के साथ-साथ ‘सत्यनारायन कथा’ भी करवा देने को कहा। मैंने उनको स्पष्ट कह दिया कि वह किसी दूसरे से हवन करवा लें मुझसे ढोंग नहीं हो सकता। चूंकि यह बात उन्होने ऐन दिन के दिन काही थी अतः बिना ‘सत्यनारायन कथा’ करवाए मुझसे हवन तो करवा लिया किन्तु उनके रिश्तेदार व परिवारीजन कथा न होने से ‘रुष्ट’ रहे। वे लोग ढ़ोंगी मूर्ती पूजा भी करते हैं पंडितों के फेर में भी फंसे रहते हैं। क्या यही है समाज की मुख्य धारा में शामिल होने का मतलब?यदि उस गलत को समर्थन देंगे जो आधारित ही है शोषण और उत्पीड़न पर तो फिर कसूर किसका है?
यदि शोषण-उत्पीड़न का विरोध करना है तो सबसे पहले ढोंग-वाद पर प्रहार करना होगा,बताना होगा जो सदियों से चल रहा है वह गलत है न कि खुद उसी में शामिल होकर खुश होना चाहिए।---विजय राजबली माथुर)



Friday, 20 December 2013

देवयानी विवाद पर जैसे को तैसा व्यवहार होना चाहिए---विजय राजबली माथुर

स्पष्ट रूप से पढ़ने के लिए इमेज पर डबल क्लिक करें (आप उसके बाद भी एक बार और क्लिक द्वारा ज़ूम करके पढ़ सकते हैं )





जिस प्रकार के समाचार प्रकाशित हो रहे हैं उनसे ऐसा लगता है कि केंद्र सरकार यह दिखाना चाहती है कि वह अमेरिका के विरुद्ध सख्त कदम उठा रही है। किन्तु यह सिर्फ जनता को धोखा देने वाली बात है क्योंकि एक तबका खुद देवयानी खोबरगड़े को दोषी ठहरा रहा है तभी अमेरिकी विदेश विभाग की प्रवक्ता ने बड़ी बुलंदगी से कह दिया है कि अमेरिका न तो केस वापिस लेगा और न ही माफी माँगेगा। 

एक समय भारतीय प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी की तुलना अमेरिकी राष्ट्रपति जानसन ने 'लेडीबर्ड' सम्बोधन से अपनी पत्नी के साथ की थी। लेकिन बाद में इन्दिरा जी ने अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निकसन द्वारा भेजे 7वां बेड़ा के बंगाल की खाड़ी में पहुँचने से पहले ही 'बांगला देश' को आज़ाद करवा लिया था। सोवियत रूस से 20 वर्षीय 'शांति एवं मैत्री संधि' की थी। अब न वह सोवियत रूस है और न ही वैसा भारतीय नेतृत्व। 

होना तो यह चाहिए था कि कोलकाता व मुंबई स्थित अमेरिकी बाणिज्य दूतों को गिरफ्तार करके पालम हवाई अड्डे से वापिस अमेरिका भेज दिया जाता और देवयानी खोबरगड़े को वापिस भारत बुलवा लिया जाता। देवयानी को वापिस न भेजने पर अमेरिका से राजनयिक संबंध तोड़ लेने की बात भारत सरकार को कहनी चाहिए थी। वर्ल्ड बैंक के पूर्व कारिंदा पी एम साहब क्या इतनी हिम्मत दिखा सकेंगे?अन्यथा क्या यह भी आगामी लोकसभा चुनावों में इन्दिरा कांग्रेस को कमजोर करने की उनकी कोई दूरगामी चाल है?
 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त माथुर

Saturday, 7 December 2013

ईमानदारी की कहानी प्रवीण कुमार सिंह जी की जुबानी

स्पष्ट रूप से पढ़ने के लिए इमेज पर डबल क्लिक करें (आप उसके बाद भी एक बार और क्लिक द्वारा ज़ूम करके पढ़ सकते हैं )








संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त माथुर