Thursday, 29 September 2016

यह गजब की राजनीति है ------ विजय राजबली माथुर

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https://www.facebook.com/jagadishwar9/posts/1390625684299468






   



वस्तुतः यह गजब का दिमाग नहीं , गजब की राजनीति है जिसका पता 2019 के संसदीय चुनावों से चलेगा। जिनके दिमाग से यह केंद्र सरकार बनी है उनका दिमाग अब उसकी पुनर्वापिसी की ओर लग चुका है। ये चित्र यू पी की राजधानी लखनऊ के एक क्षेत्र मात्र के हैं, सम्पूर्ण देश में सर्वत्र यही स्थिति है । पढे- लिखे सुविधा- साधन सम्पन्न किन्तु मूरख लोग सभी जगहों पर भेड़ियाधसान मचाये हुये हैं। लोगों में होड मची हुई है वर्तमान कंपनी छोड़ कर मुफ्त वाली कंपनी के सिम लेने की जबकि फिलहाल यह दिसंबर तक के लिए ही मुफ्त घोषित स्कीम है। उसके बाद जब चार्ज लगेगा तब मुफ्त के फायदे - नुकसान सामने आएंगे। यह केवल आर्थिक बात है जिसे शायद अधिकांश लोग झेल ही लेंगे। मुफ्त सिम लेने वालों में मजदूर, रिक्शा - टेम्पो चालक , गरीब और मेहनतकश लोग नहीं हैं। अतः ज़्यादा चार्ज देकर भी लोग डटे रह सकते हैं। 

राजनीतिक पक्ष यह है कि, दूसरी संचार कंपनियाँ या तो बाज़ार से विलुप्त हो जाएंगी या फिर इसी मुफ्त वाली कंपनी की सहयोगी बन जाएंगी। तात्पर्य यह कि, एक ही कंपनी का संचार पर एकाधिकार हो जाएगा। प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया तो पहले ही इसके मालिकों के कब्जे में आ ही चुका है। केवल सोशल मीडिया से ही सरकार को चुनौती मिल रही थी। मुफ्त सिम की राजनीति से इन्टरनेट गतिविधियां एक ही कंपनी की कृपा - दृष्टि पर निर्भर हो जाएंगी। चुनाव के समय सर्वर की समस्या बता कर सोशल मीडिया पर गतिरोध होने के कारण सरकार विरोधी मुहिम को नियंत्रित कर लिया जाएगा। हवा में लट्ठ घुमाने वाला एथीस्ट संप्रदाय जो जनता से तो कटा हुआ है ही , पढे - लिखे तबके से भी कट जाएगा। एकतरफा प्रचार में वर्तमान सत्तारूढ़ पक्ष बाज़ी जीत लेगा और उसकी आसान पुनर्वापिसी हो जाएगी। इस ओर ध्यान देने के बजाए अपनी अलग डफली बजा कर  वामपंथ जाने - अनजाने फासिस्टों का मार्ग सुगम करता प्रतीत हो रहा है।  

 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश
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Wednesday, 21 September 2016

देशहित में युद्ध की संभावना से भी बचा जाना चाहिए ------ विजय राजबली माथुर

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हिंदुस्तान,20 सितंबर 2016 के अंक में प्रकाशित वर्तमान सेनाध्यक्ष  की तरफ से DGMO का यह बयान पूरी तरह से घोर अनुशासन हीनता का ज्वलंत उदाहरण है। भारतीय संविधान के अनुसार भारत का राष्ट्रपति भारतीय सेना का सर्वोच्च समादेष्टा (सुप्रीम कमांडर ) है , क्या सेनाध्यक्ष ने अपने सुप्रीम कमांडर से इजाजत लेकर यह बयान दिलवाया है? शायद नहीं और इसी कारण यह अनुशासन हीनता है। राष्ट्रपति को सुप्रीम कमांडर की हैसियत से इसके विरुद्ध कारवाई करनी चाहिए। 
इनके अतिरिक्त पूर्व सैन्य अधिकारी भी युद्ध के हक में बयान जारी करके जनता को भड़का रहे हैं। 

1971 जैसी भड़काऊ नीतियाँ केंद्र सरकार के इशारे पर चलाई जा रही हैं जिससे निकट भविष्य में सीमित युद्ध करके फिर मध्यावधि चुनावों में उसी प्रकार जीत हासिल की जाये जैसी इन्दिरा जी ने 1971 युद्ध के बाद 1972 में हासिल की थी और संसद की अवधि छह वर्ष करके एमर्जेंसी थोप दी थी। तब निकसन के 7 वां बेड़े की चुनौती को रूस की मदद से मुक़ाबला किया गया था। लेकिन अब तो ओबामा प्रशासन से सहयोग चल रहा है ।अब रूस का भी पाकिस्तान से सहयोग चल रहा है और चीन व यू एस ए का तो है ही। आज शत्रु से नहीं मित्र से ज़्यादा खतरा है। देश की जनता को यह समझना चाहिए और भावावेश में नहीं बहना चाहिए। कश्मीर स्थित जोजीला दर्रे के नीचे छिपा 'प्लेटिनम' यू एस ए को 'यूरेनियम ' निर्माण हेतु चाहिए जो एटम बम के निर्माण में सहायक होता है। अपने सामरिक-आर्थिक हितों की रक्षा के लिए यू एस ए के फायदे के लिए कश्मीर में हिंसा को बढ़ावा दिया जा रहा है जिससे युद्ध का बहाना मिल जाये। भारत और पाकिस्तान दोनों देशों की जनता के लिए ऐसा युद्ध विनाशक होगा जबकि यू एस ए के लिए लाभदायक । देशहित में युद्ध की संभावना से भी बचा जाना चाहिए।


    संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Thursday, 8 September 2016

चिता पर अपनी रोटी पका कर खाता है - वो है कर्मकांडी ब्राह्मण ------ मंजुल भारद्वाज

भारतीय मानस की ब्राह्मणवादी कृति का घिनौना रूप है कर्मकाण्ड ।
- मंजुल भारद्वाज ( विश्वविख्यात रंगचिंतक एवं दार्शनिक )

एक व्यापार
जन्म और मृत्यु का ,
निरा और निरा अमानवीय कृत्य
ईश्वर के नाम पर एक ढोंग , 
भारतीय संस्कृति के किसी भी सार्वभौमिक तत्त्व की कब्र खोदता , 
बखियां उधेड़ने का कृत्य है कर्मकाण्ड ।
ना आत्मा के तर्क पर टिकता है 
ना परमात्मा के तर्क पर टिकता है  ,
अनुवांशिक रूप 'भय' से पीड़ित भारतीय मानस की ब्राह्मणवादी कृति का घिनौना रूप है कर्मकाण्ड ।

आत्मा अजर है ,
अमर है आत्मा
जब शरीर धारण करती है उसको जन्म और शरीर त्यागती है उसको मृत्यु कहते हैं 
जन्म से मृत्यु की यात्रा यानि जीवन ।
किसी भी वेद  में कर्मकाण्ड की व्याख्या, अनिवार्यता और संदर्भ उद्धर्त नहीं है ।

यह ब्राह्मणवाद क्या है - यह वो मनोवृति है जो मनुष्य की चिता पर अपनी रोटीयां सेक कर खाती है , जीवन के हर मोड़ पर "ईश्वरीय" भय का विकराल रूप दिखा कर ठगती , लुटती और शोषित करती है मानवता को ।
शरीर छोड़ जाने पर आत्मा का शरीर से कोई रिश्ता नहीं है उसी तरह बाकी  जीवित देहों  के साथ कोई सम्बन्ध नहीं होता। पर ब्राह्मण का खेल देखिये मोक्ष,स्वर्ग लोक का मोह जाल देखिये, कितना शातिर खेल है यह - आत्मा की शांति का ।
जिसका कोई प्रमाण नहीं है झूठे  मन्त्रों के उच्चार एक एक अभिशाप है मानवता पर , और ईश्वर की शक्ति को धिक्कारता है । जब ईश्वर ही सब करता कर्ता है , तो मनुष्य उसकी सत्ता को क्यों चुनौती देकर भगवान बनना चाहता है ?

आत्मा ईश्वर के अधिकार क्षेत्र में आती है तो क्या ईश्वरीय मिलन भी उसको शांत नहीं करता । उसके लिए पृथ्वी पर या मृत्युलोक पर छुट गए लोगों का बिलखना , ब्राह्मण के माया जाल में लूटना जरुरी है । कोई तर्क नहीं क्योंकि सत्य तो यही है । जहाँ तर्क नहीं होता वहीँ से भगवान जन्मता है  और तर्क आस्था में और  आस्था अन्धविश्वास , अंधविश्वास कर्मकाण्ड में बदल जाता है और चिता पर रोटियां सेकने वाला ब्राह्मण फलता फूलता है ।
और श्रद्धा  के मायाजाल में फंसे रिश्तेदार , आंसू बहा बहा कर झूठ के फरेब में पिसते हैं  । ब्राह्मण उसको नए ढकोसलों की व्याख्या से उलझाता रहता है। शरीर और आत्मा का घालमेल कर मनुष्यों को ऐसा जमाल गोटा पिलाता है - एक वीभत्स रचना करता है जिसमें आत्मा भी शरीर के रूप में रिश्ते नाते धारण कर लेती है । इसका ही खेल है पितर !
ये पितर का खेल ब्राह्मण का जन्मों जन्मों का इन्शुरन्स है - कर्मकाण्ड जो देश , उसकी संस्कृति , मानवीय मूल्यों और स्वयं ईश्वर को ठगता है । बस एक प्राणी जिन्दा है और चिता पर अपनी रोटी पका कर खाता है - वो है कर्मकांडी ब्राह्मण ।


        




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संक्षिप्त परिचय -

“थिएटर ऑफ रेलेवेंस” नाट्य सिद्धांत के सर्जक व प्रयोगकर्त्ता मंजुल भारद्वाज वह थिएटर शख्सियत हैं, जो राष्ट्रीय चुनौतियों को न सिर्फ स्वीकार करते हैं, बल्कि अपने रंग विचार "थिएटर आफ रेलेवेंस" के माध्यम से वह राष्ट्रीय एजेंडा भी तय करते हैं।



एक अभिनेता के रूप में उन्होंने 16000 से ज्यादा बार मंच से पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है।लेखक-निर्देशक के तौर पर 28 से अधिक नाटकों का लेखन और निर्देशन किया है। फेसिलिटेटर के तौर पर इन्होंने राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर थियेटर ऑफ रेलेवेंस सिद्धांत के तहत 1000 से अधिक नाट्य कार्यशालाओं का संचालन किया है। वे रंगकर्म को जीवन की चुनौतियों के खिलाफ लड़ने वाला हथियार मानते हैं। मंजुल मुंबई में रहते हैं। उन्हें 09820391859 पर संपर्क किया जा सकता है।


संपर्क - मंजुल भारद्वाज .

373/ 18 , जलतरंग ,सेक्टर 3 , चारकोप ,कांदिवली (पश्चिम)  मुंबई -400067.

फोन : 9820391859
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09-092016 



Saturday, 3 September 2016

उत्तर प्रदेश में तबादला उद्योग फल फूल रहा है ------ एस आर दारापुरी

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http://indiavoice.tv/m/detail.php?url=hindi-news-IAS-says-70-lacs-is-rate-for-dm-in-up

S.r. Darapuri
सपा/बसपा दोनों सरकारों में ट्रांसफर /पोस्टिंग में पैसा लिया जाता रहा है। मायावती के पिछले शासन काल में तो राज्यपाल महोदय ने खुले आम कहा था कि उत्तर प्रदेश में तबादला उद्योग फल फूल रहा है।
जब अधिकारी पैसा देकर पोस्टिंग लेगा तो फिर वह व्याज समेत पैसा वसूलेगा भी।

डॉ. आंबेडकर ने कहा था, "और कुछ न सही, जनता को स्वच्छ प्रशासन तो दिया जा सकता है।" परंतु इसमें मुलायम और मायावती दोनों नाकाम रहे हैं। उत्तर प्रदेश लंबे समय से चिंताजनक दृष्टि से भ्रष्ट राज्य चला आ रहा है जिसके लिए सपा और बसपा पूरी तरह से ज़िम्मेदार हैं।
https://www.facebook.com/permalink.php?story_fbid=10154541914336554&id=749021553

 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Tuesday, 9 August 2016

क्या ऐसा होगा? ------ विजय राजबली माथुर

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 क्या ऐसा होगा?
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अयोध्या के बाबरी प्रकरण के बाद उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा गठबंधन की सरकार का अस्तित्व आया था। काशीराम जी को अपने गृह जनपद इटावा से मुलायम सिंह जी ने सांसद तक बनवाया था। यदि यह गठबंधन कायम रहता तो सदा-सर्वदा के लिए उत्तर प्रदेश से भाजपा का अस्तित्व समाप्त हो जाता। अतः संघप्रिय गौतम के माध्यम से मायावती जी को मुलायम सिंह जी के विरुद्ध करके वह सरकार गिरा दी गई। भाजपा के समर्थन से कई बार मायावती जी मुख्यमंत्री बनीं किन्तु उनकी सरकार भाजपा द्वारा ही हर बार गिरा दी गई। इसके बावजूद गुजरात नर-संहार के बाद 2002 में मायावती जी ने अटल व मोदी के साथ भाजपा का वहाँ प्रचार किया था।


2014 के लोकसभा चुनावों से काफी पहले  व्हाईट हाउस में बराक हुसैन ओबामा द्वारा एक अंतर्राष्ट्रीय गोपनीय बैठक की गई थी जिसमें भारत से भी कई दलित कहे जाने वाले चिंतक शामिल हुये थे जिनमें से एक लखनऊ के विद्वान भी थे। वहीं पर मुस्लिमों के विरुद्ध विश्व व्यापी मुहिम चलाये जाने और उसमें प्रत्येक देश के दलित माने जाने वाले लोगों का सहयोग लेने की रूप रेखा तय की गई थी। उसी अनुसार 2014 के लोकसभा चुनावों में समस्त दलित कहे जाने वाले वर्ग का वोट बसपा के बजाए भाजपा को गया था और बसपा का एक भी सांसद न जीत सका था। उसी मुहिम का परिणाम है बसपा से हाल ही में हुई टूटन। मायावती जी को उनके खास लोगों ने उसी अंदाज़ में उनको झटका दिया है जिस अंदाज़ में 1995 में उन्होने खुद मुलायम सिंह जी को झटका दिया था तब उनको भी भाजपा का समर्थन हासिल था जिस प्रकार अब उनको झटका देने वालों को हासिल हुआ है।
2017 के आसन्न चुनावों में यदि बसपा-सपा गठबंधन बना कर चुनाव लड़ा जाये तो अब भी भाजपा के मंसूबों को ध्वस्त किया जा सकता है वरना अभी तो भाजपा बसपा को ध्वस्त करने के लिए गोपनीय समर्थन देकर सपा सरकार फिर से बनवा देगी लेकिन उसके बाद सपा को उसी प्रकार तोड़ेगी जिस प्रकार अभी बसपा को तोड़ा है। मायावती जी व मुलायम सिंह जी दूरदर्शिता का परिचय दें तो दीर्घकालीन मजबूत गठबंधन बना कर न केवल उत्तर प्रदेश में वरन सम्पूर्ण देश में भाजपा को परास्त कर सकते हैं। लेकिन क्या ऐसा होगा?
https://www.facebook.com/vijai.mathur/posts/1137504919644816
 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Sunday, 7 August 2016

हिंदी पत्रकारिता का 'तेज' : राजेंद्र माथुर ------ पंकज श्रीवास्तव


Pankaj Srivastava
आज राजेंद्र माथुर का जन्मदिन है। दिल्ली में नवभारत टाइम्स के संपादक रहे 1982 से 1991 तक। बमुश्किल 56 साल की उम्र पाई लेकिन हिंदी पत्रकारिता को ऐसा 'तेज' दिया कि तमाम नामी अंग्रेज़ी संपादक 'उपग्रह' नज़र आते थे। हाल यह था कि वे रज्जू बाबू के संपादकीय और लेख पढ़कर देश-दुनिया के तमाम विषयों पर अपनी समझ बढ़ाते थे.. राय बनाते थे। हाँ, घर नहीं बना पाए थे और जब उनके निधन पर तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर उनक फ़्लैट पर पहुँचे तो मकान मालिक जान पाया कि किरायेदार क्या हस्ती था !
बहरहाल, अब दिल्ली में तमाम फ़ार्म हाउस वाले संपादक हैं। दो-चाार फ़्लैट के मालिक संपादकों की तो गिनती ही नहीं। संपादक जी की कार की लंबाई उनके वास्तविक कद से मीलों ज़्यादा है, लेकिन वे यह नहीं जानते कि सार्क सम्मेलन में केवल अध्यक्ष के भाषण का प्रसारण होता है। बाक़ी कार्रवाई 'इन कैमरा' होती है। वे शान से राजनाथ सिंह के भाषण को प्रसारित न करने को भारत की बेइज्ज़ती करार देते हुए पाकिस्तान से जंग का आह्वान करते हैं। दूसरे दिन जब विदेश मंत्रालय का कोई बाबू प्रसारण रोकने की ख़बर का खंडन करता है तो कुछ 'सम्मानित' अख़बार दसवें पेज पर छोटी सी ख़बर छाप देते हैं। बाक़ी में इतनी भी शर्म नहीं.! चैनलों से तो उम्मीद करना ही क़ुफ़्र है ! सोचिये, क्या ही अच्छे दिन आये हैं.. संपादकों को सरकारी बाबू 'ज्ञान' पिला रहा है !
कई बार लगता है कि रज्जू बाबू का 1991 में मरना एक रूपक है। उदारीकरण की शुरुआत के साथ तमाम प्रतिभाओं को बौना बनाने का जो क़ामयाब उपक्रम चला, उसमें रज्जू बाबू कहाँ फिट होते। रोज़-रोज़ मरने से तो अच्छा था कि तभी मर गये।
हो सके तो माफ़ कर देना सर, हाँलाकि हम इस लायक़ नहीं हैं । 
https://www.facebook.com/photo.php?fbid=1141232722605286&set=a.238145616247339.57071.100001557065849&type=3

Friday, 5 August 2016

प्रकृतिक नहीं मानवीय हैं विपदाएं ------ बद्रि नारायण

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संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Thursday, 4 August 2016

विश्व बंधुत्व की भावना का परित्याग भारत की मूल भावना की समाप्ती होगा ------ हरजिंदर

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 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Saturday, 23 July 2016

मीडिया मायावती को मोदी समझ रही:/सवर्ण और दलितों का अलगाव ------ अकील अहमद / लालाजी निर्मल

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****** जिसके एक आह्वान पर UP ही नहीं देश के दलित सड़क पर उतर आने को आतुर हो , उसी ताकतवर दलित महिला नेत्री के विरूद्ध आक्रमक तेवर में फरार दयाशंकर की पत्नी को उसके समकक्ष दिखाने का पर्यास जिसमे स्वाति सिंह कह रही है की भाजपा के सारे कार्यकर्ता मेरे साथ
.....क्या संदेश है ? ******
***उत्तर प्रदेश की राजनीती में सवर्ण और दलितों का अलगाव और अपने अपने खेमे में जुड़ाव साफ़ नजर आने लगा है | सोसल मिडिया में तो यह अलगाव शीशे की तरह साफ़ नजर आ रहा है | स्वाभाविक मित्रों को छोड़ कर वैचारिक विरोधियों के साथ दोस्ती और जातीय प्रबंधन निष्फल दिखने लगा है |***
***  दलितों - सवर्णों का यह अलगाव 'नास्तिकता'- एथीज़्म का दावा करने वाले साम्यवादी दल  के भीतर भी उतना ही मजबूत है जितना सोशल मीडिया और समाज में क्योंकि ये दल भी ब्राह्मण वादियों के ही नियंत्रण में हैं। बस फर्क सिर्फ इतना है कि, इन दलों में दलितों का समर्थन करने वाले मुखर लोग खुद दलित नहीं हैं बल्कि गैर ब्राह्मण और गैर प्रभावशाली कामरेड्स हैं । ब्राह्मण वादी /कार्पोरेटी/मोदीईस्ट कामरेड्स प्रभावशाली और दलित विरोधी मानसिकता के हैं जिनके लिए मार्क्स वाद सिर्फ सत्ता नियंत्रण का मंत्र भर है और वे अपनी कारगुजारियों से मार्क्स वाद को जनता से दूर रखने में निरंतर सफल रहे हैं । ***



Aquil Ahmed
मायावती v/s स्वाति 
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जैसे ही हजरतगंज थाने से मायावती जी सहित बसपा के दो अन्य नेतावो सतिस्चन्द्र मिश्र और नसीमुद्दीन सिद्दीकी और कर्य्कर्तावो के खिलाफ FIR दर्ज करा बाहर निकलते ही मीडियाकर्मियों से घिरी स्वाति सिंह (पत्नी भाजपा से निष्कासित नेता दयाशंकरसिंह) ने सहयोग के लिए कैमरे पर ही media का धन्यवाद दिया ,..........मुझे आजतक का वो समाचार याद आ गया मायावती जी के संसद में दयाशंकर जी के विरूद्ध प्रतिरोधस्वरूप उठाईगयी थी जिसमे उन्होंने कहा था ..'' मै देश की बेटी हू ,दया शंकर जी ने मुझ पर नहीं अपनी बेटी , बहन को ये शब्द कहे हैं"......सबसे पहले लोगो का ध्यानाकर्षित करते हुए ''आजतक'' नेकहा था मायावती जी का भी जुबान फिसल रही है .......अब जा कर यह समझ में आया की अहं से भरी स्वर्ण प्रभुत्व और मानसिकता वाली मीडिया को यह हजम न हो पा रहा था की एक दलित भी अपने मान सम्मान के लिए इतने आक्रामकता के साथ प्रतिरोध दर्ज करा सकती है ?____निचे दिए गए देश के दो प्रमुख चैनलों के है, जरा गौर कीजिये ....1, ABP न्यूज़ ....देश के सबसे ताकतवर दलित महिला के विरूद्ध अपराधिक टिपन्नी करने वाले फरार दयाशंकर सिंह की पत्नी का मीडिया से घिर bite देते 2, 'आजतक' की heading " मायावती v/s स्वाति" ____बिना इस बात की परवाह किये की जिसके एक आह्वान पर UP ही नहीं देश के दलित सड़क पर उतर आने को आतुर हो , उसी ताकतवर दलित महिला नेत्री के विरूद्ध आक्रमक तेवर में फरार दयाशंकर की पत्नी को उसके समकक्ष दिखाने का पर्यास जिसमे स्वाति सिंह कह रही है की भाजपा के सारे कार्यकर्ता मेरे साथ

.....क्या संदेश है ?........ऐसे ऐसे मायावती के मुकाबले कोई गुमनाम स्वर्ण स्वाति भी भारी है?
https://www.facebook.com/aquil.ahmed.7927/posts/668679363286163




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Lalajee Nirmal
सवर्ण और दलितों का अलगाव  :
देश की सबसे ताकतवर महिला दलित सुप्रीमो बहन जी पर आज बड़ा सामंती हमला हुआ |उनके विरूद्ध भारतीय दंड संहिता की धारा 504 ,506 ,509 ,153ए और 120बी के तहत मुकदमा दर्ज कराया गया है |नसीमुद्दीन सिद्दीकी,राम अचल राजभर और मेवालाल गौतम सहित अज्ञात लोगों को भी इसमें आरोपी बनाया गया है |इसी के साथ उत्तर प्रदेश की राजनीती में सवर्ण और दलितों का अलगाव और अपने अपने खेमे में जुड़ाव साफ़ नजर आने लगा है | सोसल मिडिया में तो यह अलगाव शीशे की तरह साफ़ नजर आ रहा है | स्वाभाविक मित्रों को छोड़ कर वैचारिक विरोधियों के साथ दोस्ती और जातीय प्रबंधन निष्फल दिखने लगा है |बड़ी मजबूती के साथ फिर कह रहा हूँ भारत के सामंती कोढ़ की शल्य चिकित्सा केवल और केवल बहुजन अवधारणा से ही संभव है |

https://www.facebook.com/lalajee.nirmal/posts/1122617821131866

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उपरोक्त टिप्पणियों से साफ नज़र आता है कि, दलितों - सवर्णों का यह अलगाव 'नास्तिकता'- एथीज़्म का दावा करने वाले साम्यवादी दल  के भीतर भी उतना ही मजबूत है जितना सोशल मीडिया और समाज में क्योंकि ये दल भी ब्राह्मण वादियों के ही नियंत्रण में हैं। बस फर्क सिर्फ इतना है कि, इन दलों में दलितों का समर्थन करने वाले मुखर लोग खुद दलित नहीं हैं बल्कि गैर ब्राह्मण और गैर प्रभावशाली कामरेड्स हैं । ब्राह्मण वादी /कार्पोरेटी/मोदीईस्ट कामरेड्स प्रभावशाली और दलित विरोधी मानसिकता के हैं जिनके लिए मार्क्स वाद सिर्फ सत्ता नियंत्रण का मंत्र भर है और वे अपनी कारगुजारियों से मार्क्स वाद को जनता से दूर रखने में निरंतर सफल रहे हैं । इसी लिए 1964 में टूट कर CPM का गठन किया गया था। यू पी में पिछले बाईस वर्षों में दो बार पार्टी विभाजन भी ब्राह्मण वाद और ब्राह्मणों के वर्चस्व का  ही परिणाम था। CPM से टूटे नकसल पंथी गुटों ने कार्पोरेटी शक्तियों को मजदूरों - किसानों का दमन करने का स्वर्णिम अवसर प्रदान कर दिया है। आज का जातीय विभाजन और टकराव और कुछ नहीं सिर्फ शोषणवादी शक्तियों को ही मजबूत करेगा जो कि, सत्तारूढ़ सरकारों की गहरी कूटनीतिक चाल है। इसकी पुष्टि  BBC के इस वीडियो से भी होती है 
( विजय राजबली माथुर )